दिसम्बर 2017

कुलपति उवाच 

03   शब्द और कर्म

     के.एम. मुनशी

अध्यक्षीय

04   अपने आप पर नियंत्रण रखो

     सुरेंद्रलाल जी. मेहता

पहली सीढ़ी

11   अबकी बार लौटा तो

     कुंवर नारायण

व्यंग्य

118  राजा के आंसू

     शशिकांत सिंह `शशि’

शब्द-सम्पदा

134  कभी नाव पर (भाग-2)

     विद्यानिवास मिश्र

आवरण-कथा

12   अधिकार मनुष्य का

     सम्पादकीय

14   सवाल मानव की प्रतिष्ठा का है

     कैलाश चंद्र पंत

21   संस्कृति, परम्परा और मानव अधिकार

     इंद्रनाथ चौधुरी

30   ऐसी दुनिया चाहिए, जहां गैर बराबरी…

     गोविंद सिंह

34   हमारे अधिकार, हमारे कर्त्तव्य

     सोली जे. सोराबजी

37   मानव अधिकारों के तीन सिपाही 

     विमल मिश्र

आलेख 

44   किसानी का संकट और मीडिया

     पी. साईनाथ 

64   देश का चेहरा धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए 

     कृष्णा सोबती

67   धर्म-निरपेक्षता के दर्जे

     सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन `अज्ञेय’

72   साहित्य का अंतिम फल

     वासुदेव शरण अग्रवाल

75   समुद्र तट की स्मृतियां

     प्रयाग शुक्ल

80   `हमसे नज़रिया काहे फेर ली?’

     होमी दस्तूर

82   रे बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए…

     विश्वनाथ गोकर्ण

95   साहित्य में जीवित ऐतिहासिक रूप-कथाएं

     शरद पगारे

101  एक विकल मन और क्लासिक अनुशासन

     विजय कुमार

116  शिक्षा हर नागरिक की ज़िम्मेदारी हैं

     सद्गुरु जग्गी वासुदेवन

126  `मैंने क्या पढ़ा और सीखा’

     प्रेमचंद

130  इबादत

     जयंत माडगावकर

132  किताबें

कथा

56   जननी

     मालती जोशी

85   मैं क्लीव नहीं हूं!

     रेणुका अस्थाना

104  खिड़कियां

     दामोदर खड़से

कविताएं

71   दीने-आदमीयत

     जोश मलीहाबादी

74   तीन ग़ज़लें 

     विज्ञान व्रत 

94   ये हवाएं

     रश्मि धवन

127  गांव क्यों छोड़ा 

     सूर्यभानु गुप्त 

समाचार

136  भवन समाचार

144  संस्कृति समाचार

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