तीन कविताएं

     ♦  नरेश सक्सेना   >   

मढ़ी प्राइमरी स्कूल के बच्चे

उनमें आदमियों का नहीं
एक जंगल का बचपन है
जंगल जो हरियाली से काट दिये गये हैं
और अब सिर्फ़
आग ही हो सकते हैं
नहीं
बच्चे फूल नहीं होते
फूल स्कूल नहीं जाते
स्कूल जलते हुए जंगल नहीं होते.

शिशु

शिशु लोरी के शब्द नहीं
संगीत समझता है
बाद में सीखेगा भाषा
अभी वह अर्थ समझता है
समझता है सबकी मुस्कान
सभी को अल्ले ले ले ले
तुम्हारे वेद पुराण कुरान
अभी वह व्यर्थ समझता है
अभी वह अर्थ समझता है
समझने में उसको, तुम हो
कितने असमर्थ, समझता है
बाद में सीखेगा भाषा
उसी से है, जो है आशा.

अच्छे बच्चे

कुछ बच्चे बहुत अच्छे होते हैं
वे गेंद और गुब्बारे नहीं मांगते
मिठाई नहीं मांगते ज़िद नहीं करते
और मचलते तो हैं ही नहीं
बड़ों का कहना मानते हैं
वे छोटों का भी कहना मानते हैं
इतने अच्छे होते हैं
इतने अच्छे बच्चों की तलाश में
रहते हैं हम
और मिलते ही
उन्हें ले आते हैं घर
अक्सर
तीस रुपये महीने और खाने पर.

                         (जनवरी 2014)

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