ड्राइंगरूम में मनीप्लांट – शरद जोशी

व्यंग्य

 

आज मनीप्लांट की डाल गमले में बोयी है. बहुत दिन से कह रही थी कि ड्राइंगरूम में मनीप्लांट लगाना है. आज लग गया है. वह खुश है. हम अपने अगले कमरे को ड्राइंगरूम कहते हैं. एक तखत बिछा है, दो एक चौकियां पड़ी हैं और टेबल पर किताबों-पत्रिकाओं का ढेर. दीवारें सब गंदी हैं. मोहल्ले के बच्चों ने तस्वीरें बना रखी हैं. कभी-कभी जोश आता है तो इस कमरे को सजाने-संवारने की सोचते हैं. तीन-चार दिन तक मूड रहता है. सब किताबें ठीक से रख दी जाती हैं, पर धीरे-धीरे फिर वही सब हो जाता है. मध्यम वर्ग के आदमी की सारी ज़िंदगी अपने तीन कमरों की समस्या सुलझाने में गुजरती है. ड्राइंगरूम के लिए कुर्सियां खरीदेगा तो रसोईघर में कोयला, आटा कम पड़ जाएगा. वह न हुआ तो चादरें फट जाएंगी. चादरें खरीदकर लाया तो बिजली का बिल चुकाना रह गया समझो. हंसी आती है और क्रोध भी. इसलिए अब घर को ड्राइंगरूम, किचन और बेडरूम में बांटने का विचार छोड़, पूरे घर को घर पुकारने लगा हूं. यही मुझ जैसे सभी व्यक्ति करते हैं. वे सब जो तुलसी का पौधा बोते हैं, पड़ोसी के घर से फूल चुरा अपने भगवान पूजते हैं, पतलून खूंटी पर टांगकर अण्डरवियर पहन घूमते हैं और अपने गणित का सारा ज्ञान वेतन का खर्च जमाने में लगाते हैं. वे सब जो सिर्फ वस्त्र कम होने के संकोच में असामाजिक प्राणी हो गये. वे सब जो सड़क से गुज़रता जुलूस उत्साह से देखते हैं पर घर पर आया अतिथि टालते हैं. मैं उन सबमें से ही एक हूं. मनीप्लांट की डाल बोना मेरी हिमाकत है. यह पौधा मेरे यहां पनप पायेगा या नहीं इसमें मुझे संदेह है. पैसे का पौधा हमारे घर क्यों पनपने लगा?

पर अब पौधा लग ही गया है तो इसे बराबर पानी देना होगा. घर में अतिथि आ ही जाए तो खिलाना ही पड़ता है. मैंने सजाकर रख दिया है. इसके पत्ते बड़े चिकने हैं. मुझे कुछ दया आ गयी है. क्या लेता है आखिर? पानी ही तो पीता है मात्र. हम खूब पानी देंगे. इस मामले में तो मैं किसी भी बंगले वाले से होड़ ले सकता हूं. अगर इस पौधे को बजाय पानी के दूध देना पड़ता तो शायद मैं हार जाता. इसकी वही दुर्दशा होती जो बंगले वाले बच्चों की तुलना में एक मध्यम वर्गीय बच्चे की होती है. पर पानी पीकर तो मैं पनप गया हूं, यह
भी पनपेगा.

मित्र आते हैं तो मेरे मनीप्लांट को गौर से देखते हैं. कोई तारीफ भी कर बैठता है. यानी रौब पड़ता है. मनी शब्द की ही महिमा है. यहां पौधे के आगे ही मनी लगा है तो सब रौब खाते हैं. मेरे पास मनीआर्डर आये तो मेरे ठाठ बढ़ें, पर लगता है इस मनीप्लांट से भी कुछ तो बढ़ ही सकते हैं ठाठ. मैं हंस देता हूं. पत्ते फूट रहे हैं. कोमल छोटे पत्ते. फूल एक भी नहीं होता. सुगंध नाम को भी नहीं. पैसे की भी यही प्रकृति है. सोचता हूं इस पौधे का बीज भी होता है या नहीं. लोग पौधे की एक डाल काटकर ले जाते हैं और दूसरी जगह बो देते हैं. वहीं पनप जाता है. जैसे बैंक की शाखाएं खुलें या किसी कम्पनी ने नयी कम्पनी डाली हो. नये सिरे से श्रम नहीं करना पड़ता. अर्थशास्त्र और पौधाशास्त्र के नियमों में मनीप्लांट के मामले में एक ही नियम लगता है. सेठ साहब ने एक धंधा पनपाया. रुपया पत्तों की तरह फूट घर आया. कई डालियां हैं जिन पर पैसा लगा है और वे सब उनके कब्जे में हैं. एक डाल है उनके अपने श्रम की, उनकी पूंजी और सूझ की. मनीप्लांट में नयी जड़ें फूटती हैं. ब्लैक मनी, इनकम टैक्स नहीं चुकाया, बोनस दाब गये, वेतन कम दिया, गलत खाते भरे, नकली खर्चा दिखाया, घाटा शो कर दिया, ओवर इनवाइस, अंडर इनवाइस, पूंजी बांट ली, नकली शेयर होल्डर रावण के सिर की तरह बढ़ाये- यह सब एक ही मनीप्लांट की डालें हैं. इन सबमें पत्ते फूटते हैं और मालिक की शोभा और शान बढ़ती है. बची हुई रकम एक और व्यवसाय में डाल दी. मनीप्लांट की डाल यहां से वहां गयी और पनप उठी. उसे पनपना ही है. बिना बीज के भी वह पनप सकती है. पानीनुमा पसीना खूब-सा मिल जाता है, सस्ते दामों खरीद लो और अपने गमले में, कारखाने में, धंधे में डालो और सींचो, देखो कैसे पत्ते लहलहाते हैं. अर्थशास्त्र के नियम का प्रकृति से कैसा सम्बंध है. हमारी मिट्टी को डालियां भी स्वीकार हैं. जहां कारखाना डलता है खानदेश से लेकर पंजाब तक का पसीना उसे सींचने और पनपाने आ जाता है. नये पत्ते फूटते हैं. नयी डालियां फूटती हैं. एक और कारखाने की भूमिका बनती है. इसी कारण तो अर्थशास्त्राr कहते हैं कि हमारी मिट्टी में समाजवाद नहीं पनप सकता है. समझदार लोग हैं वे सब. समाजवाद कैक्टस की तरह खड़ा हुआ है. पानी नहीं, सहारा नहीं पर फिर भी खड़ा है. आपकी लापरवाहियों से उसका कुछ बनता-बिगड़ता नहीं. वह हवा से नमी सोख लेता है और जीता है. मुझे तो इस मनीप्लांट का बड़ा ध्यान रखना पड़ता है. दिन में दो बार पानी देता हूं.

पर मनीप्लांट तो शुद्ध प्राइवेट सेक्टर है. उसका अपना गमला है, पानी पर उसका अधिकार है. जनता को इससे फल-फूल न प्राप्त हों पर उसके अपने पत्ते तो खूब फूटते हैं. डालियां फैलती हैं और जड़ जमती है. कमरे की शोभा इसी में है. इसी में देश की शोभा है. व्यक्तिगत स्वाधीनता के गमलों में पनपता पूंजी का वृक्ष और असहयोग के मरुस्थल पर उगता हुआ कैक्टस-सा समाजवाद.

मैंने मनीप्लांट को शुद्ध हवा मिल सके इसलिए खिड़की के पास रख दिया है. हवा के झोंकों से पत्ते धीरे-धीरे हिलते हैं जैसे बड़ा अखबार हाथ में लेकर हवा करने से किसी सुंदरी की लटें हिल रही हैं. कैक्टस पर हवा आती है, नहीं भी आती. वह हवा के आश्वासन पर ही जी लेता है. अपनी प्राणशक्ति का भरपूर सदुपयोग करता है और पानी के इंतज़ार में वक्त गुजार देता.

मेरा एक मित्र समझा रहा था- कैक्टस को पानी नहीं दिया करो ज़्यादा, जड़ें सड़ जाएंगी. उनके आसपास सूखी रेत डालो. यह निष्ठुरता मुझसे नहीं होती, मैं रोज़ कैक्टस में पानी देता हूं. बढ़ रहा है. तेज़ी से उसकी डालियां फूल रही हैं वह हरा-भरा दिखता है. यद्यपि कंटीला है. मनीप्लांट की वैश्य प्रकृति है. उसमें स्निग्धता है, लोच है, यहां वहां मुड़ जाने की आदत है, जैसा मौका हो वैसा निभा लेता है बशर्ते उसे बराबर पानी मिले यानी पूंजी का सरकूलेशन बना रहे. कैक्टस को पानी नहीं मिलता तो उसमें लोच नहीं है, वह ऐसे तना खड़ा है, क्रोध में घूरता कि जैसे मज़दूरी नहीं मिलने पर बदतमीज कुली तने हुए देखता है. यह आक्रोश, यह कांटे, यह चिड़चिड़ाहट सब स्वाभाविक है पर उसी के कारण बदनाम भी है बेचारा. मेरा मित्र कहता है इसे पानी न दो. पब्लिक सेक्टर में एक कारखाना डालो तो हज़ार गालियां सुनो. मित्र अलग-अलग सलाहें देते हैं. इस कमरे के शुभचिंतक कैक्टस का अशुभ सोचना ही फ़र्ज मानते हैं. क्या होगा पब्लिक सेक्टर का, क्या होगा समाजवाद का?

मैं तो राष्ट्रीय नीति पर चल रहा हूं. दोनों लगा रखे हैं. मनीप्लांट भी, कैक्टस भी. कमरे की शोभा बढ़ रही है. मेरी आर्थिक स्थिति खस्ता भी हो पर कमरा सजा हुआ लगे तो भ्रम बना रहता है. सब समझते हैं सुख से कटती है. मैं खुद को समझाता हूं आज मनीप्लांट पनपा है तो कल मनी भी आयेगा. कल यह पौधा ही कल्पवृक्ष में बदल जाए. इसमें बजाय हरे पत्तों के नये प्रकार के पत्ते उगने लगें यानी नोट दस-दस के. एक पत्ता तोड़ लूं और भाजी खरीदने चला जाऊं. मनीप्लांट नाम सार्थक हो जाएगा. रोज़ सुबह उठ इसी उम्मीद में पानी डालता हूं. पर लगता है यहां भी निराशा ही हाथ लगेगी. मेरी लाइन ही दूसरी है. यहां पानी डालने से भी जड़ सड़ती है. कुछ नहीं मिलता.

मात्र शोभा बढ़ती है, कमरे की, देश की, साहित्य की, संस्कृति की.

फरवरी 2016

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