डर  –  डॉ. रश्मि शील

कहानी

मानसी अभी बिस्तर पर ही थी कि उसका मोबाइल बज उठा. उसने सवालिया नज़रों से

मोबाइल की ओर देखा जैसे जान लेना चाहती हो कि सुबहसुबह किसे, क्या तकलीफ है! ‘कॉल बैक करना पड़े इसलिए उसने झट से मोबाइल उठा लिया. बटन दबाकर कान से लगाया और धीमे से कहा– ‘हॅलो.’ दूसरी ओर की आवाज़ सुनकर वह चहककर उठ बैठी. मोबाइल सीधे हाथ से पकड़कर कहा– ‘अरे मॉम आप! आज सुबहसुबह! सब खैरियत तो है!’

उसने मोबाइल का लाउडस्पीकर ऑनकर दिया ताकि धीमे बोलने वाली मां की बातों का एकएक शब्द सुन सके.

उधर से मां की स्नेहिल फटकार रही थी– ‘आठ कब के बज चुके हैं और तूने अभी तक बिस्तर नहीं छोड़ा है!’

मॉम, आप तो डांटने का कोई अवसर नहीं चूकतीं. हुआ यह…’

‘…कि तू रात में काफी देर तक पढ़कर क्लास के लिए नोट्स तैयार करती रही, इसलिए देर से सोयी…’ मां ने वाक्य पूरा किया.

‘…और देर से सोने वाले को देर तक सोने का हक होता है. है मॉम.’

उसकी निश्छल हंसी समाप्त होने के बाद मां मुद्दे की बात पर आयी– ‘सुन मनु, तुझे आज शाम को घर आना है.’

लेकिन सन्डे तो अभी दो दिन बाद है. कोई बात है क्या!’

हां, बात तो है. तेरे भैया ने एक जगह तेरे रिश्ते की बात चलायी है.’

ओह! मॉम.’

अरी सुन तो सही. वर पक्ष चाहता है कि लड़कालड़की एक दूसरे को देखसुन लें; पसंद कर लें, तो बात आगे बढ़े. लड़का आज ही रहा है, शाम तक. बस, तू यह मत कहना कि अभीअभी नौकरी शुरू की है, अभी जल्दी क्या है! लड़का और उसका परिवार वाले सभी अच्छे हैं. बस, तू देख ले, उसके बाद तेरी मर्जी. हम तेरे ऊपर कोई फैसला नहीं थोपेंगे.’

बस, बस! मॉम, मुझे इतना मत चढ़ाओ. अपने आंचल की छाया में ही बना रहने दो. आप जो कहोगी करूंगी. पापा को भी बोल देना…’

क्या?’

अरे यही, कि मैं शाम को घर रही हूं.’

बस स्टॉप पर खड़ी मानसी ने अपनी बांहें सीने पर कसते हुए आसमान की ओर देखा. ऊपर हल्की बदली छायी हुई थी. त़ेज हवा ने ठंड कुछ और बढ़ा दी थी. आजकल मौसम कितना अनसर्टनहो गया है. उसकी सोच की ताकीद करने के लिए ऊपर से बूंदें गिरने लगीं. उसने इधरउधर देखा, तभी, जैसे उसे असहाय पाकर, कृपा करके बूंदें रुक गयीं.

उसे स्टॉप पर खड़े देर हो चुकी थी पर बस का कहीं पता नहीं था. उसने उड़तीसी नज़र वहां खड़ी सवारियों पर डाली. उसे संतोष हुआ कि वह अकेली नहीं है. वह उसी ओर देख रही थी जिधर से बस को आना था. कुछ देर बाद एक बस आती दिखाई दी. ओफ्फ! वह कैसे चढ़ पायेगी, इस बस में. इसके दोनों गेटों तक पर सवारियां लटकी हुई हैं. बस आकर खड़ी हुई. ओवरलोड थी. दो सवारियां उतरीं, चार चढ़ गयीं. बस चली गयी, वह खड़ी रह गयी. भीड़ से उसे शुरू से डर लगता था.

हताशनिराश मानसी वहीं खड़ी रह गयी. बूंदें फिर पड़ने लगीं. पानी से बचने के लिए वह सड़क के किनारे छायादार पेड़ के नीचे स्थापित चाय की गुमटी के पास जाकर खड़ी हो गयी.

चायवाला अक्सर मानसी को आते जाते देखता था इसलिए उसे पहचानता था. देखा तो बोला– ‘का घरै जाय रही हौ? आजु तो बस की बड़ी मारामारी है.’

क्यों?’ प्रश्न करते हुए मानसी ने सोचा कि लगता है दूसरी कोई बस नहीं आयेगी.

चायवाला सूचना प्रसारित करने लगा, ‘आजु प्राइमरी स्कूलों मा पढ़ावें वाले शिक्षामित्तरों की रैली है ; सो ज़्यादातर बसैं रेली मा लगी हैं.’

चायवाले की बातों ने मानसी की चिंता बढ़ा दी. उसे खुद पर गुस्सा आया कि कल अखबार में पढ़ी रैली वाली बात वह भूल कैसे गयी! हर रैली में लोग प्राइवेट बसें हायर कर लेते हैं. याद रहता तो मां को आज आने के लिए मना कर देती. पर अब मना कैसे करें, वे महाशय तो निकल पड़े होंगे. अनिश्चितता में डोलती वहीं खड़ी रहकर अगली बस का इंतज़ार करने लगी. शायद उसके भाग्य से दूसरी बस जाये और ओवरलोड हो.

मानसी रायबरेलीलखनऊ रोड पर मोहनलालगंज में स्थित अंबालिका इंजीनियरिंग एण्ड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में प्रबंधनपढ़ाती थी. इसी सत्र के प्रारम्भ में उसकी नौकरी लगी थी. वह इंस्टीट्यूट कैम्पस में बने गर्ल्स हॉस्टल में रहती थी. वैसे तो हर शनिवार की शाम को घर जाती ही थी और सोमवार को सुबह लौट आती थी. मां से सुबह हुई बातों के सिलसिले में आज बुधवार को ही घर जा रही थी.

कॉलेज करके वहां से निकलते ही उसकी सहकर्मी रुचि मिल गयी. उसे अचानक घर जाने का कारण बताया तो उसने चुटकी ली– ‘ हो! तो मैडम अपने उससे मिलने जा रही हैं. जाओ भाई, जाओ, मेरी शुभकामनाएं.’

अभी से शुभकामनाएं! क्या पता वह मुझे पसंद करे, करे.’ यह कहते हुए मानसी के दिल में एक लहरसी उठी.

वह तो तुम्हें देखते ही फिदा हो जायेगा मेरी जान.’

और यदि मैं फिदा हुई तो!’ मानसी ने चुटकी ली.

गारंटी करती हूं कि फिदा हो जाओगीलड़का अगर सुंदर और स्मार्ट होता तो उसके पैरेंट्स उसे भेजकर खुद देखने आते.’

यार तेरा मनोविज्ञान बड़ा तगड़ा है. चल ठीक है तेरी शुभकामनाएं लीं, और मैं चली, बाय…’

बूंदाबांदी अब भी जारी थी. मानसी ने मोबाइल में समय देखा, आठ बजे थे.

इंतज़ार करते आधा घंटा और बीत चुका था, पर बस का कहीं अतापता नहीं था. अगर बस आयी तो! उसका मन दुचित्ता हो गया. क्या अभी और इंतज़ार करे या हॉस्टल लौट जाये. यह सोचते ही वह कांपनेसी लगीहॉस्टल लगभग दो किलोमीटर दूर था; वहां तक पहुंचने का छोटा रास्ता खेतों की मेड़ से होकर जाता था. अगर ज़रूरत पड़े तो भाग भी सके. और ऊपर से मौसम की मार और उसे झेलता अंधेरा.

उसका दिमाग भन्नाने लगा. बुरे विचार स्मृति पर दस्तक देने लगे. अभी कुछ दिन पहले की बात है आशियाना क्षेत्र के एक सुनसान इलाके से बदमाशों ने दिन दहाड़े एक लड़की को अगवा कर लिया. उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म करने के बाद उस पर तेज़ाब फेंककर भाग गये. मुंह जलेगा तो उसे दिखाने काबिल नहीं रहेगी और आत्मविश्वास टूटेगा से अलग. छह महीने बाद बयान देने के काबिल हो पायी. पुलिस को बयान देना, यानी खानापूरी. सुना नहीं कि कोई पकड़ा गयाहंसा दीदी की किस्मत अच्छी थी कि सामूहिक दुष्कर्म झेल पाने के कारण दम तोड़ दिया. यह उसके लिए कोई समाचार नहीं था, उसने दीदी का शव देखा था. उनका चेहरा पीड़ा से विकृत बना रह गया था, वह खून के तालाब में पड़ी थीं. तब उसका भीत किशोर मन हंसा के मुख पर व्यथाकथा अंकित देखकर अनावश्यक आशंका से भर उठा था. उसे हर बाहरी पुरुष एक दुर्दांत भेड़िया लगता और उसकी अनपेक्षित उपस्थिति से वह शिथिल पड़ जाती. वह नहीं जानती थी कि कौनसा अनजाना भय उसमें समाया रहता. और फिर भय से संशय, संशय से वितृष्णा, वितृष्णा से मानसिक टूटन, टूटन से ज्ञानबोध का शून्यबोध में परिवर्तन, शून्य बोध यानी संज्ञाहीनता चिंतन, चेतन… 

एक काली वैगनआर के रुकते ही उसकी विचारशृंखला टूट गयी. उसने देखा एक युवक कार से उतरकर चायवाले की ओर आया, उससे चाय देने को कहा. उसने केतली से प्लास्टिक कप में चाय डाल कर युवक को दी.

युवक ने चाय लेकर एक बार अपनी कार की ओर देखा फिर सिप लेकर पूछा– ‘यहां से शहर कितनी दूर होगा, बाबा?’

यही कोई बीस मील होई. का पहली बार आये हो?’

हां,’ युवक ने संक्षिप्त उत्तर दिया.

चायवाले ने मानसी की ओर देखकर कहा– ‘बिटिया, आप चाहो तो यहिन के साथ सहर तक चली जाओ, हुवां कउनो टेक्सी, टेम्पू मिल जाई. पानी अबहिनो टिपटिपाय रहा है. बस का कउनो ठिकाना नहीं! हमहूं अपन दुकान बढावै जाय रहन है.’

मानसी दुविधा में पड़ गयी.

युवक ने कहा– ‘चलिए मैं आपको छोड़ देता हूं. आप साथ रहेंगी तो रास्ता बताने में मेरी मदद ही करेंगी.’

एक क्षण उसने मानसी के चलने की प्रतीक्षा की, फिर कार की ओर चल पड़ा.

आशंकाओं में डूबी उतराती मानसी अपने आपको धक्का मारकर कार तक ले गयी. युवक ने पिछला दरवाज़ा खोलकर मानसी को बैठने के लिए प्रेरित किया. मानसी बैठ गयी, दरवाज़ा बंद हो गया तो उसे लगा कि चूहा स्वयं चलकर मार्जार (बिलाव) के पास गया है.

युवक ड्राइविंग सीट पर जा बैठा. इगनिशन में चाबी डाली, घुमाने से पहले बाईं ओर देखकर बोला– ‘राकेश, उठ! बहुत सो लिया.

अबे साले…’

युवक ने मुंह पर उंगली रखकर कहा, ‘इश्श्श्पीछे एक महिला बैठी हैं. गाली नहीं.’

सीट पर पसरा हुआ राकेश उठकर बैठ गया. उसने एक नज़र पीछे डाली और अपने साथी से कहा– ‘सॉरी.’

मानसी घबरा उठी. तो यहां एक आदमी और बैठा था. बैठा क्या, छिपा था. उसने बताया भी नहीं कि एक आदमी और है कार में. वैसे तो यह बताने की बात भी थी. क्या करे, उतर जाय! लेकिन कार तो चल रही है. दरवाज़े ऑटो लॉक से बंद हो चुके हैं.

मानसी संदेहों से घिरी बैठी थी. संदेह जिन सूक्ष्मतम प्रमाणों पर आधारित होते हैं उन्हें तो किसी को दिखाया जा सकता है और खुद देखे जा सकते हैं. मानसी हर भोक्ता स्त्राr के स्थान पर स्वयं को रख लेती थी. इस समय उसके जेहन में वह युवती घूम रही थी जो इंदिरा बैराज से किसी कार में लिफ्ट लेकर चढ़ी थी. कार चालक और उसके साथी ने

उसने अपना सिर झटका और अपने को कोसने लगी कि इस कार में बैठने से पहले उसने देख क्यों लिया! और वह सालाभी सीट में ऐसा पसरा था कि पीछे से उसे कोई देख भी सके.

कार में चल रहे म्यूजिक सिस्टम की तेज़ आवाज़ से उसकी विचार शृंखला भंग हुई. ‘रेपम्यूजिक था. ओह रेप’! कितना घिनौना है यह शब्द. वे दोनों भी गा रहे थे. क्या दुष्टों के शौक भी एक से होते हैं. निर्भया हादसे को अंजाम देने वाले लोग भी नाचगा रहे थे. निर्भया और उसका दोस्त दोनों चिल्लाते रहे पर दिल्ली जैसे शहर में किसी ने उनकी मदद की

मानसी अतीत की भावुकता से अपने को मुक्त नहीं कर पायी थी तभी संदेह का कछुआ बारबार अपना सिर बाहर निकालने लगा. उसे याद आया कि निर्भया कांड के बाद सरकार ने एक वूमन्स हेल्प नंबर जारी किया था. उसने पर्स खोलकर अपना मोबाइल निकाला और क्रीन पर 1090 टाइप कर लिया जिससे आवश्यकता पड़ने पर उस नम्बर पर तुरंत सम्पर्क किया जा सके. ‘ईश्वर करे मुझे इस नम्बर की कभी ज़रूरत पड़े.’ वह सोच ही रही थी कि मोबाइल उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर गया. पता नहीं किस कोण से गिरा कि कार में मैट बिछी होने पर भी उसका पीछे का कवर खुल गया और बैटरी निकल गयी. उसने बैटरी ढूंढ़ने की नाकाम कोशिश की. उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि युवक से अंदर की लाइट जलाने के लिए कहे. उसने मोबाइल बैग में डाल लिया.

विचारों से बाहर आकर उसने सुना कि संगीत वैसे ही ज़ोरशोर से चल रहा था. राहत पाने के लिए उसने थोड़ीसी खिड़की खोल दी. हवा का तेज़ झोंका अंदर आया तो उसके भय के भाव कुछ कम हुआ.

मैडम, प्लीज खिड़की बंद कर दें हवा बहुत तेज़ है.’ युवक के स्वर में अनुरोध था.

वास्तव में भय और संदेह के भाव एक साथ संक्रमित होने के कारण उसके सिर में दर्द होने लगा था. सोचा ताज़ी हवा से कुछ आराम मिलेगा. शीशा ऊपर चढ़ाते हुए कहा– ‘प्लीज, यह म्यूजिक बंद कर दीजिए. मेरे सिर में दर्द हो रहा है.’

म्यूजिक तत्काल बंद हो गया. सोचा, अब मुसीबत के समय चिल्लाने पर कोई सुन तो सकेगा. इस विचार से उसे थोड़ी राहत मिली.

युवक ने कार में रखे फर्स्ट एड बॉक्स से निकालकर एक टेबलेट उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा– ‘लीजिए यह दवा ले लीजिए. पानी की बोतल पीछे कवर बैग में है.’

मानसी ने सोचा– ‘अच्छा ये चालें चल रहा है, मुझे बेहोश करके

प्रकट में कहा– ‘सिरदर्द में मैं दवाई नहीं लेती.’

कहीं चाय या काफी के लिए रोकूं!’

नहीं, नहीं, इसकी ज़रूरत नहीं है.’ उसने शीघ्रता से कहा.

कुछ देर तक चुप्पी छायी रही. युवक से नहीं रहा गया, पूछा– ‘बुरा मानें तो पूछूं…. उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना पूछा– ‘उतने वीराने में आप क्या करने गयी थीं?’

जी, मैं अपनी सहेली से मिलने गयी थी. लौटने में देर हो गयी. बातों में समय का पता ही नहीं चला.’

युवक समझ गया कि लड़की झूठ बोल रही है. अगर सहेली के यहां गयी होती तो कोई कोई बस स्टैंड तक पहुंचाने ज़रूर आता. लेकिन ये तो वहां अकेली खड़ी थी. कोई ऐसीवैसी लड़की हो, जो गले पड़ जाये.

इंडीकेटर बता रहा था कि पेट्रोल खत्म होने वाला है. युवक ने लड़की से पूछा– ‘गाड़ी का पेट्रोल खत्म होने वाला है. क्या आसपास कोई पेट्रोल पंप है?’

बात साधारणसी थी पर भयभीत मन अनावश्यक आशंका से भर उठता है. मानसी ने सोचा– ‘इसके इरादे ठीक नहीं हैं, तभी पेट्रोल खत्म होने की भूमिका बांध रहा है. कहीं सन्नाटे में गाड़ी खड़ी कर देगा और कह देगा कि पेट्रोल खत्म हो गया.’ इसी बहाने दोनों नीचे उतर आयेंगे. सफर पर निकलने से पहले लोग गाड़ी का टैंक फुल करा लेते हैं. क्या पता पेट्रोल पंप पर इसके एक दो साथी हों! ऐसी कितनी घटनाएं आए दिन घटती रहती हैं जिनमें अपराधी अलगअलग स्थानों पर जुटते हैं और घटना को अंजाम देकर जुदा
हो जाते हैं. पुलिस ढूंढ़ती रह जाती है. और इसके साथी अगर पेट्रोल पंप पर हुए तो वह उन्हें पीछे ही बिठा लेगा, मेरे पास. ओफ्फ!’

उसने अपना आई कार्ड कार में गिरा दिया. किसी हादसे की यह छोटीसी गवाही होगी. उसे थोड़ी तसल्ली हुई. तभी यह विचार कौंधा कि घटना होने पर पुलिस को शिकार मिलेगा, शिकारी तो गाड़ी लेकर उड़न छू हो चुकेंगे. उसे खीझ हो आयीआखिर बचने का कोई तो रास्ता होगा जो उसके दिमाग में नहीं रहा है. क्यों नहीं रहा है, क्या मेरा दिमाग कुंद है!

उसने गाड़ी को पेट्रोल पंप की ओर मुड़ते देखा तो आंखें बंद कर लीं. किसी संतुष्टि के कारण नहीं बल्कि भय के कारण. उसे लगा अनहोनी कभी भी घट सकती है. कटु कठोर अनुभव के बाद एक दर्दनाक मौत! मौत भी हो तो एक अपावन या अपाहिज जीवन को लेकर वह क्या करेगी! कैसे जायेगी घर! कौनसा चेहरा लेकर समाज में निकलेगी! जो समाज बेटी बचाओका नारा लगाता है वही उसे जीने नहीं देगा. ताने मारमार कर मार डालेगा. उसने मन ही मन ईश्वर को, मां, बाबूजी और भाई को याद किया. भाईमुझसे उम्र में बड़े होकर भी  इसलिए अपनी शादी नहीं कर रहें हैं कि पहले मेरे हाथ पीले करना चाहते हैं. आज सुबह मां कितनी खुश थी. कहा था– ‘जल्दी घर जाना नहीं तो लड़के को बुरा लगेगा.’ जब नहीं पहुंचूंगी तबतबउसकी आंखों से आंसू बह रहे थे. स्पष्ट देखने के लिए आंखों को हथेलियों से पोंछकर बाहर देखने लगी.

गाड़ी एसजीपीआईआर पार कर रही थी. मानसी ने एक गहरी सांस ली. लखनऊ का वह मेडिकल रिसर्च सेंटर, जो दूरदूर तक मशहूर था, अब पीछे छूट रहा था. यहां भी इस वक्त सन्नाटा था. लेकिन ये दोनों लड़के क्यों सन्नाटा खींचे बैठे हैं. आपस में बात कर रहे हैं, उससे. बात करने से मन का भेद जो खुलता है!

उसे युवक की आवाज़ सुनाई दी. वह धीरेधीरे मोबाइल पर किसी से बात कर रहा था– ‘हां, पी.जी.आई. निकल चुका है. मैंने बोर्ड देखा थाक्या कहायहां से सीधे बढ़ना हैहां, ठीक हैनहीं वह अकेला नहीं है. वो साथ है. ठीक है, आपके बताये ठिकाने पर पहुंचता हूं.’ बात खत्म हो गयी. उसने मोबाइल डैश बोर्ड पर डाल दिया.

भय की एक दूसरी लहर मानसी के अंतर में उतर गयी. ओह! तो यह अपने किसी साथी से बात कर रहा था. रास्ता मुझसे भी तो पूछ सकता था. लेकिन उन्हें भी तो सूचित करना था जो इंतज़ार कर रहे थे. उन्हें बता रहा था कि अकेला नहीं है यानी शिकार साथ में है. भाग्य ने कहां फंसा दिया! लगता है कल वह भी एक खबर बन जायेगी. लूट और रेप के बाद हत्या की खबर. एक बिफरी हुई पशुता के आक्रोश का परिणाम! इस बार उसके आंसू पलकों पर ही रुक गये, शायद उसकी तरह वे भी डर गये थे.

रूमाल निकालने के लिए उसने बैग में हाथ डाला. रूमाल के साथ एक पेन भी खिंचा चला आया. पेन वहीं छोड़ा पर उसकी स्मृतियां बाहर आकर लिपटने लगीं. भाई ने दिल्ली से लौटने के बाद यह सुनहरा पेन दिया था. कई साल पहले की बात है. बोले थे– ‘मनु, इसी पेन से परीक्षा देना. देखना टॉप करेगी.’ तब उसने हंसते हुए, पूछा था– ‘अच्छा, क्या इसमें जादू कर दिया है?’ बोले थे– ‘हां, जादू, भाई के निश्छल प्रेम का जादू.’

यह पेन उसके लिए लकी साबित हुआ. उस दिन की वह हंसी आज भी याद है, स़िर्फ यह याद नहीं कि फिर कब हंसी थी. उसने भावुकता में भर कर पेन को कसकर पकड़ लिया. उसे लगा यह पेन उसका सहारा है. उसके ब्याह का सारा भार भाई पर ही तो है. वह उसे दुल्हन के रूप में देख भी पायेंगे या नहीं!… मेरी मति मारी गयी थी जो इन दरिंदों के साथ हो ली.

कार तेज़ी से भाग रही थी. सड़क के एक ओर कांसीराम पार्क का विस्तार था तो दूसरी ओर दोहरी ऊंची दीवार थी. दोनों दीवारों के बीच बहते नाले को पाटकर चौड़ा फुटपाथ बना था. मखमली घास पेड़पौधे लगाकर उसे दर्शनीय बना दिया गया था. उसी रास्ते पर आगे अम्बेडकर, बुद्ध, कांसीराम पूर्व मुख्यमंत्री की भव्य मूर्तियां स्थापित थीं. एक विशाल रमाबाई अम्बेडकर द्वार भी बना हुआ था. इस द्वार को पार करते ही आलमबाग का भीड़ वाला इलाका शुरू हो जायेगा. भीड़ में होने की अनुभूति ने उसे राहत दी.

गाड़ी जैसे ही बड़ा चौराहा पार कर बाईं ओर मुड़ी, भय के सैकड़ों सर्प फन फैलाकर उसके सामने खड़े हो गये. ऐसा सन्नाटा और एक के बाद एक लगातार ओवरब्रिज. कुछ भी हो सकता है और उसके चिह्न तक मिटाये जा सकते हैं. मानव मन बड़ा शंकालु होता है. वह प्राय बुरे की ओर भागता है, और वैसे ही विचार बनते हैं. तनावग्रस्त मानसी की मनस्थिति भी कुछ वैसी ही थी. अंधकार में नष्ट हुई प्रभा की तरह, बुझी हुई अग्निशिखा की तरह, सूखी हुई सरिता की तरह मानसी का आत्मविश्वास अनावश्यक आशंकाओं के कारण शून्य की कोटि में पहुंच गया था. उसकी हताशा ने संघर्ष क्षमता को चाट लिया था. पंजे में फंसे शिकार की तरह उसने शिकारी युवक को निरीहता से देखा. वह मोबाइल पर किसी से बात कर रहा था. हर बार फोन उसके पास आये थे उसने अपनी ओर से नहीं मिलाया था. फोन के दूसरी ओर कौन बेचैन प्राणी था!

गाड़ी की गति कम होते देख वह लगभग चीखकर बोली– ‘कार धीमी क्यों कर दी है?’ उसे लगता कोई आयेगा और धीमी गाड़ी का दरवाज़ा खोल कर पीछे बैठ जायेगा.

अरे! वो सामने जाम लगा है. मुझे बायीं ओर मुड़ना है.’ युवक का स्वर थोड़ा असहज हो आया.

थोड़ी ही देर में रास्ता स़ाफ हो गया और गाड़ी ने रफ़्तार पकड़ ली.

मानसी एक बार फिर संदेहों के भंवर में डूबनेउतराने लगी. सोचा– ‘क्या यह युवक झूठ बोल रहा कि लखनऊ पहली बार आया है! जब से वह कार में बैठी है तब से उसने एक बार भी उससे या कार रोकर किसी से रास्ता नहीं पूछा है. उसे अच्छी तरह मालूम होगा कि इस सड़क से बायीं ओर कर्बला पड़ता है. इसके फोन वाले साथी उसी सुनसान जगह पर प्रतीक्षा कर रहे होंगे. उसने फोन पर कहा था कि साथ में है.’ तो यह उन्हें यह बता रहा था कि लड़की साथ में है.

जैसे ही कार बायीं ओर मुड़ने को हुई मानसी ने तेज़ी से कहा– ‘बस, बस! गाड़ी यहीं रोक दीजिए. मुझे दायीं ओर जाना है. वह सामने मंदिर दिख रहा है उससे थोड़ा आगे मेरा घर है.’ मानसी सोच रही थी कि यहां मंदिर में काफी भीड़ है. अगर इसने गाड़ी रोकने में आनाकानी की, तो वह शोर मचा देगी.

युवक ने शालीनता से कहा– ‘चलिए, मैं आपको घर छोड़ देता हूं.’

नहीं, नहीं. मैं आपको घर नहीं ले जा सकती. मेरे घर के लोग परम्परावादी हैं. इतनी रात को गैर मर्द के साथ देखकर शायद उन्हें अच्छा लगे.’

युवक ने कार रोक दी. ‘आप परिवार की भावनाओं का इतना ख्याल रखती हैं, नयी पीढ़ी यह गुण दुर्लभ है.’

युवक शीघ्रता से गाड़ी से उतरा और पीछे का दरवाज़ा खोल दिया. मानसी ने बाहर आकर एक गहरी सांस ली जैसे जीवन में पहली बार खुली हवा मिल रही हो.

बिना औपचारिक आभार प्रकट किये हुए ही वह आगे बढ़ गयी. युवक ने ज़ोर से दरवाज़ा बंद किया और जाकर कार में बैठ गया. कार बायीं दिशा में दौड़ पड़ी. मानसी के घर का वही रास्ता था.

गाड़ी के आंख से ओझल होने पर मानसी ने रिक्शा किया और बायीं ओर चल दी. बीस मिनट बाद घर पहुंची तो देखा उसके घर का ड्रॉइंग रूम खुला है. पर्याप्त रोशनी है. भाई बेचैनी से बाहर की ओर देख रहा था. मानसी को आता देखकर खुश हो उठा. लपककर उसके पास आया और उसे साथ लेकर अंदर पहुंचा. इस बार वह आश्चर्य से जड़ीभूत हो गयी जब उसने देखा कि वही कार वाला युवक सोफे पर बैठा है और एक किशोर बालक उसके पास बैठा आंखें झपका रहा है.

मानसी ने बाहर झांका तो पाया कि कार सड़क के दूसरी ओर पार्क की गयी थी.                             

मई 2016

1 comment for “डर  –  डॉ. रश्मि शील

  1. Nitish kumar
    August 9, 2018 at 10:08 pm

    Very nice god bless you

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