ज्ञान-धारा

बोधकथा

 

 

एक बार भगवान बुद्ध से उनके शिष्य आनंद ने पूछा- ‘भगवन्! जब आप प्रवचन देते हैं तो सुनने वाले नीचे बैठते हैं और आप ऊंचे आसन पर बैठते हैं, ऐसा क्यों?’ भगवान बुद्ध बोले- ‘ये बताओ कि पानी झरने के ऊपर खड़े होकर पिया जाता है या नीचे जाकर?’ आनंद ने उत्तर दिया- ‘झरने का पानी ऊंचाई से गिरता है. अतः उसके नीचे जाकर ही पानी पिया जा सकता है.’ भगवान बुद्ध ने कहा- ‘तो फिर यदि प्यासे को संतुष्ट करना है तो झरने को ऊंचाई से ही बहना होगा न?’ आनंद ने ‘हां में उत्तर दिया.’ यह सुनकर भगवान बुद्ध बोले- ‘आनंद! ठीक इसी तरह यदि तुम्हें किसी से कुछ पाना है तो स्वयं को नीचे लाकर ही प्राप्त कर सकते हो और तुम्हें देने के लिए दाता को भी ऊपर खड़ा होना होगा. यदि तुम समर्पण के लिए तैयार हो तो तुम एक ऐसे सागर में बदल जाओगे, जो ज्ञान की सभी धाराओं को अपने में समेट लेता है.’

मार्च 2016

2 comments for “ज्ञान-धारा

  1. राजदीप सिंह
    October 30, 2018 at 11:33 am

    बहुत ही प्रेरणादायक कहानी है । इस कहानी ने मेरा मन मोह लिए है और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है ।

  2. rajesh kumar jafarganj fatehpur up
    November 18, 2018 at 10:14 pm

    bahut hi sundar katha hai aise kathakaar ka yugh yugantar tak log yaad rakhenge

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