जब रेणु ने सम्मान लौटाया था…

प्रिय राष्ट्रपति महोदय,

21 अप्रैल, 1970 को तत्कालीन राष्ट्रपति वाराहगिरि वेंकटगिरि ने व्यक्तिगत गुणों के लिए सम्मानार्थ मुझे ‘पद्मश्री’ प्रदान किया था.

तब से लेकर आज तक संशय में रहा हूं कि भारत के राष्ट्रपति की दृष्टि में अर्थात् भारत सरकार की दृष्टि में वह कौन-सा व्यक्तिगत गुण है, जिसके लिए मुझे पद्मश्री से अलंकृत किया गया. 1970 और 1974 के बीच देश में ढेर सारी घटनाएं घटित हुई हैं. उन घटनाओं में, मेरी समझ से बिहार आंदोलन अभूतपूर्व है. 4 नवंबर को पटना में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में प्रदर्शित लोक-इच्छा के दमन के लिए लोक और लोकनायक के ऊपर नियोजित लाठी प्रहार झूठ और दमन की चरम पराकाष्ठा थी.

आप जिस सरकार के राष्ट्रपति हैं, वह कब तक लोक-इच्छा को, झूठ, दमन और राज्य की हिंसा के बल पर दबाने का प्रयास करती रहेगी? ऐसी स्थिति में मुझे लगता है कि ‘पद्मश्री’ का सम्मान अब मेरे लिए ‘पापश्री’ बन गया है. साभार यह सम्मान वापस करता हूं. धन्यवाद.

भवदीय

फणीश्वरनाथ रेणु

 

राज्यपाल, बिहार के नाम

प्रिय राज्यपाल महोदय,

बिहार सरकार द्वारा स्थापित एवं निदेशक, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना द्वारा प्रचालित साहित्यकार, कलाकार कल्याण-कोष परिषद द्वारा मुझे आजीवन 300 रुपये प्रतिमाह आर्थिक वृत्ति दी जाती है. अप्रैल, 1972 से अक्टूबर, 1974 तक यह वृत्ति लेता रहा हूं.

परंतु, अब उस सरकार से, जिसने जनता का विश्वास खो दिया है, जो जन-आकांक्षा को राज्य की हिंसा के बल पर दबाने का प्रयास कर रही है, उससे किसी प्रकार की वृत्ति को लेना अपमान समझता हूं.

कृपया इस वृत्ति को अब बंद कर दें.

भवदीय

फणीश्वरनाथ रेणु

(जनवरी 2016)

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