जंगल का संगीत –  सुदर्शन वशिष्ठ

कहानी

जादूगर जंगल

पेड़  कुदरत का करिश्मा है. अजूबा है पहाड़ पर पेड़. ऊंचा, सीधा, समाधि में लीन योगी-सा. जो जितना ऊंचा है, उतना ही शांत है. जितना पुष्ट उतना ही अहिंसक… देखो, टेढ़ी पहाड़ी पर सीधा खड़ा रहता है, झंडे-सा. हरी वर्दी पहने पेड़ लगता है पहरेदार, कभी लगता है झबरीला भालू, कभी तिलस्मी एय्यार. कभी लगता है पेड़ रामायण की चौपायी, जो हनुमान ने गायी. कभी ऊपर चांद से बातें करता, हवा से हाथ मिलाता… सच बच्चो! एक अजूबा है पहाड़ पर पेड़…’ बाबा कहा करते.

हरे भरे जंगल में शाम की धूप की लाली चमक रही होती. सभी पेड़, पहाड़ एक ओर से सुनहरी होकर चमक रहे होते. इस समय पक्षी पूरे ज़ोर से शोर मचाते. इस कलरव में हवा के साथ जंगल का संगीत बज उठता.

बाबा की बातें सुनते हुए बच्चों के बीच वसुंधरा की आंखें अनायास जंगल की ओर घूम जातीं. जंगल उसे जादूगर-सा लगता जिसकी पोटली में न जाने क्या-क्या छिपा है.

‘पेड़ में भी हमारी तरह जान है. पेड़ में भी नसें हैं, हड्डियां हैं, लहू है. पेड़ सांस भी लेता है. अपने ऊपर वार पर वार सहता है, फिर भी कुछ नहीं कहता. जानता है पेड़ यह भी कि लोहे की कुल्हाड़ी हो या दांतों वाला आरा, उसकी टहनी के बिना लोहे का टुकड़ा भर है, ठंडा और बेजान. उसकी टहनी लगने पर ही कुल्हाड़ी वार करती है, आरा चलता है. उसे काटती है अपनी ही टहनी. वार सहते हुए न बोलता है, न सिसकता है. बस गिर जाने पर एक बार चिंघाड़ता है.’

बच्चों के चेहरे पर इस बात से मायूसी छा जाती… पेड़ मरता भी है बाबा…, कोई बच्चा पूछ बैठता.

‘हां, पेड़ भी मरता है. पेड़ के मर जाने पर भी जड़ को पता नहीं चलता. जड़ें उतनी ही तेज़ी से पेड़ को ताकत देती हैं. जड़ें ज़िंदा रहती हैं धरती के गर्भ में सालों. ठंड में उगती हैं कोंपलें हर साल, बस तना दोबारा नहीं उगता.’

‘पेड़ों को कौन मारता है बाबा!’ वसुंधरा पूछती.

‘हैं कुछ लोग, जो पैसा कमाना चाहते हैं. चोरी से पेड़ों को काटते हैं.’

‘आप तो जंगल के राखा हैं बाबा. आप तो ऐसा नहीं होने देते.’ कोई बच्चा बोल उठता.

‘हां, मेरे सामने कोई पेड़ नहीं काट सकता… पेड़ परमात्मा ने आदमी से भी पहले बनाये. आदमी बाद में बनाया गया. और पेड़ बड़े धैर्य से, आराम से, फुरसत के समय बनाये. बिना किसी आदमी की सहायता के पेड़ जन्म लेते हैं, खुद बड़े होते हैं, खुद फूल देते हैं, फल देते हैं. कोई लेने वाला न हो तो धरती पर टपका देते हैं, जिसकी मर्जी आये, खा ले. इसलिए जंगल में तो पेड़ होते ही हैं, जहां देवता का मंदिर होगा, वहां पेड़ होंगे. ये सामने जंगल देख रहे हो न, यह देवता का जंगल है, इसे कोई नहीं काट सकता. एक भी पेड़ काटना हो तो देवता की इजाज़त लेनी होगी. देवता मना करे तो कोई पत्ता नहीं तोड़ सकता.’

सभी बच्चे जंगल की ओर देखने लगे जहां ऊंचे-ऊंचे देवदारों के बीच देवता का मंदिर था.

अंधेरा घिरने को आता तो पक्षी अपने-अपने घोंसलों की ओर शोर मचाते भागते. गांव के मंदिर में घंटियों के स्वर गूंजते. बच्चे शोर मचाते हुए अपने-अपने घरों की ओर भागते.

महकमा जंगलात

ऊंचे-ऊंचे पेड़ों से घिरा था जंगलात का दफ्तर. यह जैसे जंगल की सीमा थी. ऊपर जंगल शुरू हो जाता था, नीचे कस्बा. लगता था, जंगल यहीं से उगा है. आज भी कभी कभार शाम के बाद बाघ या दूसरे जानवर यहां तक आ जाते थे. नीचे की ओर दूर-दूर तक ऊंची पहाड़ियां, ऊपर बर्फ से ढके पर्वत. पहाड़ों में महकमा जंगलात सबसे पुराना है, अंग्रेज़ों के समय का. लकड़ी से बनी दफ्तर की बिल्डिंग भी उतनी ही पुरानी थी जिसके कमरों की छतें ऊंची जहां दोनों ओर बड़े-बड़े रोशनदान जिनकी डोरियां नीचे झूलतीं.

…फारेस्ट आफिस पेड़ों से घिरा होना चाहिए, दूर से पता चल जाए कि यह फारेस्ट ऑफिस है… सीनियर अफसर ने कहा था जिसकी जगह उसकी पोस्टिंग हुई थी.

ऑफिसर के बाहर दूर से ही चकले पत्थरों का रास्ता शुरू हो गया था. दोनों ओर एक बड़ा-सा लॉन था जिसमें मखमली घास उगी हुई थी. दोनों ओर फूलों की क्यारियां थीं. ऑफिस का पूरा एरिया कहीं कंटीली तार तो कहीं दीवार से बंद किया हुआ था.

ऑफिस के साथ ही दो कमरों का छोटा-सा रेस्ट हाउस था जहां उसके रहने की व्यवस्था कर दी थी.

ऑफिस के बाहर बरामदा था जिसमें एक ओर लगे लकड़ी के बेंच पर चपरासी बैठा बीड़ी पी रहा था. उसने अफसरों को आते देख अनमने से बीड़ी दीवार पर रगड़ कर बुझा दी और सलाम बजाया. नये अफसर के आने की खबर से रेंज ऑफिसर खुद ही आ गया था.

‘अब आप यहां बैठिए मैडम…, यह कुर्सी अब आप के हवाले, आसपास जितने जंगल नज़र की सीमा तक दिख रहे हैं, ये आप के हवाले. एक पूरी की पूरी सल्तनत है अब आपके अधिकार में’ -सीनियर ऑफिसर ने फीकी हंसी के साथ कहा.

‘नहीं-नहीं, अभी आप ही बैठें. मैं कल से… आज शाम तक सब आपका रहा.’ वह कुर्सी देख सकुचाई.

सामने एक बड़ी-सी घूमने वाली कुर्सी थी, हालांकि उस पर लगाये सफेद कवर काले पड़ गये थे. आगे एक बड़ी-सी टेबुल जिसमें अंदर की ओर दराज थे. कमरे में जंगली जानवरों के पुराने चित्र टंगे थे. एक किनारे पुरानी पुस्तकों से भरी अलमारी.

‘मैंने तो अब छोड़ दी.’ कहकर वह भी सामने सोफे पर बैठ गया. रेंज ऑफिसर चाय के प्रबंध में लग गया.

चार्ज लेने-देने में कुछ नहीं होता, यह उसे यहां आकर पता चला. बस कागज़ साइन कर हेड क्वार्टर भेजने होते हैं. हेड क्लर्क कागज़ ले आया जो उसने तुरंत साइन कर दिये. बस साइन करने से वह यहां की अफसर थी.

रेंज ऑफिसर ने सब को चाय के साथ मिठाई बांटी. उसने पर्स से पैसे देने चाहे, जो बहुत ज़ोर जबरदस्ती करने पर भी नहीं लिये गये. जलपान के बाद सीनियर ऑफिसर उसी समय हेड क्वार्टर चला गया जहां उसकी पोस्टिंग हुई थी.

दो कमरों के छोटे-से रेस्ट हाउस में भी सीढ़ियां चढ़ने के बाद बाहर बरामदा था जिसमें दफ्तर की तरह एक बेंच रखा था. बरामदे से नीचे छोटा-सा बाज़ार, कस्बा और बीच में चौगान दीखता था. सामने एक पर्वताकार बड़ी पहाड़ी थी. नीचे दरिया बहता था जो यहां से दिखाई नहीं दे रहा था. हां, बहुत गहरी-सी आवाज़ आ रही थी.

भीतरी एक छोटे कमरे में बड़ा-सा सोफा था, दूसरे में डबल बेड जिसके गद्दे बहुत मोटे थे. शुक्र था कि दीवारों पर जानवरों के न होकर जंगल, पहाड़ों, झरनों के पुराने आकर्षक चित्र टंगे थे. बाथरूम में नयी-नयी टाइलें लगी थीं, शायद हाल ही में इसे रिनोवेट किया गया था.

गांव से दूर के रिश्ते की बहन साथ आयी थी जिसने अब तक सामान सलीके से सजा दिया था. ट्रांसफर हुए अधिकारी का परिवार अभी यहीं था, इसलिए  सरकारी मकान मिलने में वक्त लग सकता था. सेटल होने के बाद बहन को गांव भेज देगी.

दफ्तर की अलमारी से लायी एक किताब पलटने पर पता लगा यह इस क्षेत्र के एक दुर्गम गांव के बारे में किसी यूरोपियन का संस्मरण था जिसमें बहुत-सी उपयोगी जानकारी दी गयी थी. वह यूरोपियन यहां दरिया के किनारे चांदी की खोज करने आया था.

चौकीदार दौड़कर सेवा में जुट गया. रात को बढ़िया धुली मूंग की दाल और गोभी बनायी थी जो बहुत स्वादिष्ट थी. किचन पीछे की ओर होते हुए भी वह गर्मागर्म चपाती पहुंचाता रहा.

पक्षियों के कलरव ने तड़के ही जगा दिया. बाहर उजाला था. वह बेंच पर बैठ गयी. ‘सामने की पहाड़ी के कारन सूरज देर से निकला है’, चौकीदार ने चाय पकड़ाते हुए बताया. उसके बच्चे उठ गये थे जो किचन से छिप-छिप कर झांकते हुए उसे देख रहे थे. भीतर से बिस्कुट का पैकेट लाकर चौकीदार को दिया.

सुबह दस से पहले ही वह कुर्सी पर बैठ गयी. बैठने से पहले ही उसने कुर्सी के मैले कवर चौकीदार से निकलवा दिये थे. उस समय दफ्तर में कोई नहीं था. बस चौकीदार ही उसके साथ नीचे आया था. उसी के पास दफ्तर की चाबी थी.

चौकीदार ने आते ही बाहर नेम प्लेट लटका दी- वसुंधरा चौधरी वनमंडलाधिकारी.

घूमने वाली कुर्सी पर बैठते ही उसका मन बुरा बुरा-सा हो गया. बाबा इसी महकमे में फॉरेस्ट गार्ड थे. उस वक्त उन्हें राखा कहते थे. राखा होने पर भी गांव के चौकीदार, लम्बरदार थे. उनकी पूरे इलाके में बड़ी इज़्ज़त थी. हर ब्याह शादी, मरण कर्म में वही चीड़ के पेड़ पर निशान लगाकर अलॉट करते थे. उम्र भर जंगलों में भटकते रहे. कितना लगाव था उन्हें अपनी ड्यूटी से. जंगलों की खातिर ही उन्हें एक दिन  अपनी जान देनी पड़ी. तब वह कितनी छोटी थी. उस समय ऐसा सपने में भी नहीं सोचा था कि वह उसी महकमे में बड़ी अफसर बनेगी. पूरे कुनबे में और इलाके में इस तरह की पहली अफसर होगी.

स्टाफ के आने से पहले उसने साथ लायी अगरबत्ती जलाकर आंखें बंद कर लीं. हाथ जोड़कर देवी का ध्यान किया और कमरे का जायजा लिया कि यहां क्या क्या चेंजेज़ की जा सकती हैं.

इतने में रेंज ऑफिसर गुड मॉर्निंग करता हुआ भीतर आ गया. शायद वह रात यहीं ठहरा था… चाय मंगवाऊं मैडम… उसने भीतर आते ही पूछा.

‘हां हां, मंगवाते हैं…,’ कहते हुए उसने घंटी बजायी. एक चपरासी भीतर आया और खड़ा होकर बेवकूफों की तरह उसे देखने लगा.

‘चाय लाओ भई… मैडम के आते ही बिना कहे चाय आ जानी चाहिए.’ रेंज ऑफिसर ने रौब से कहा तो वह सिर हिलाता चला गया.

‘यह इलाका पेड़ काटुओं के लिए बदनाम है मैडम. एक पूरी गैंग, पूरा माफिया इस काम में लगा हुआ है. आप देखेंगी, कई पहाड़ियां नंगी हो गयी हैं. जंगलों में टीडी में एक पेड़ अलॉट होता है तो पांच काट लिये जाते हैं. यहां की लकड़ी मैदानों में पहुंच गयी, कोई पकड़ नहीं पाया. कोई डी. एफ.ओ. यहां साल से ज़्यादा नहीं टिक पाता.’ रेंज ऑफिसर ने बताना शुरू किया.

…अब कोई नहीं बचेगा, सोचा वसुंधरा ने, कहा कुछ नहीं… पेड़ पौधों को, हरे भरे जंगलों को, जंगली पशु-पक्षियों को बचाना है उसने. यही तो उसके जीवन का लक्ष्य है अब.

‘मैडम! कुछ ज़रूरी फाइलें हैं…’ नाक पर ऐनक रखे अधेड़ हेड क्लर्क ने प्रवेश किया और ऐनक के बीच से उसे घूरा. वह चुप रही.

‘ये हेड क्लर्क हैं मैडम! बहुत मेहनती और ईमानदार…’ रेंज ऑफिसर ने परिचय दिया. वे महाशय एक बार और झुके और मुस्काते हुए फाइलें रखते हुए बोले. ‘धीरे-धीरे सब जान जाएंगी मैडम, अभी नयी हैं न.’ वह चुप रही, बस सिर हिलाया.

हेड क्लर्क के जाने पर रेंज ऑफिसर ने फिर बात छेड़ी. ‘यहां गांव से दूर बहुत ही घने जंगल हैं जहां तक हम लोग भी नहीं पहुंच पाते. फॉरेस्ट गार्ड लोकल हैं जो लोगों से मिले रहते हैं. ये सामने की पहाड़ी तो खाली है, पीछे की ओर जंगल ही जंगल हैं जहां दिन में भी जाने से डर लगता है. बाघ, रीछ, भालू सर्दियों में नीचे उतर आते हैं. वैसे जंगली जानवर तो यहां कम हैं, आदमी ही जानवर बने हुए हैं.’

‘चेक पोस्ट तो सब जगह होगी…’ उसने कहा.

‘सो तो हैं… वहां भी तो लोकल आदमी लगे हैं. फिर बहुत-सी लकड़ी दरिया के रास्ते जाती है. काटन के बाद स्लीपरों को दरिया में लुढ़का दिया जाता है जहां से वे दूसरे जिले में पहुंच जाते हैं.’

चाय के बाद रेंज ऑफिसर ने विदा ले ली तो वह पुनः सयंत हो बैठ गयी.

ऑफिस में अराजकता का माहौल था, इस बात का पता उसे एक दिन में ही लग गया. बाहर पूरी सल्तनत थी, इसमें कोई संदेह नहीं. पिछले डी.एफ.ओ. ज़्यादातर दौरे पर रहते थे. शिकार और पार्टियों के शौकीन. वैसे भी वे सीधे आई.एफ.एस. थे, बिहार के रहने वाले. वह तो बी.एस.सी. फॉरेस्टरी कर के प्रदेश कॉडर से चयनित हुई थी.

…ये लेडीज क्या करेंगी. यहां तो फील्ड वर्क है. जंगलों में रहना पड़ेगा, जंगली जानवरों के बीच. पता नहीं कैसे इस आफिस में आ गयी… अरे! इसे तो हेड क्लार्क में ही रहना चाहिए था. वहां टेबल वर्क करती. यहां जंगल माफिया के बीच… अकेली लड़की… राम! राम! ये तो स्टाफ को भी कंट्रोल नहीं कर पायेगी. कई तरह की बातें उसके कानों तक पहुंचने लगीं. रात को छोटे से रेस्ट हाउस के ऊपर जंगल में जब गीदड़ एक साथ बोलते तो उसे भय भी लगता.

वह सुबह पौने दस आ बैठती थी और दूसरे दिन ही सारे स्टाफ को समय पर आने का मेमो जारी कर दिया. बिना चिट दिये किसी भी बाहरी व्यक्ति के कमरे में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया. अब किसी भी आदमी की उसकी ओर आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं होती.

जंगल की पुकार

बरसात में जंगल बहुत दारुण आवाज़ में बोलता है. चारों ओर टिड्डियों, झींगुरों की आवाज़ें वातावरण को बोझिल बना देती हैं. सभी पेड़ भीगकर जैसे सिसकते हैं. उनके चारों ओर लिपटी बेलें उन्हें एकदम कस देती हैं. जिससे सांस लेना भी कठिन हो जाए. ज़मीन पर हर जगह गीला-गीला एहसास. घने पौधों और झाड़ियों के बीच न जाने क्या छिपा बैठा होगा, कौन जाने!

बरसात में जंगल की आवाज़ों से उसका मन कभी-कभी घबरा जाता है. ऐसे ही भयावह वातावरण में एक दिन उसके बाबा को मार डाला था.

बड़ी उदास शाम थी वह. ऐसे ही कीट पतंगों की सांय-सांय, झांय-झांय से जंगल गूंज रहा था. लोक-कथा की तरह लोग सुनाते हैं, टकटक की आवाज़ें सुनते हुए बाबा जंगल के बीच में पहुंच गये. अचानक फॉरेस्ट रोड पर एक ट्रक चिंघाड़ता हुआ रुका. ट्रक ड्राइवर से उन्होंने जंगल के बीच ट्रक लाने का कारण पूछा तो वह हंसा. उन्होंने ट्रक का दरवाज़ा पकड़ लिया. ड्राइवर नीचे उतरा. पीछे से तीन आदमी और उतर आये. देर तक उनमें कहा-सुनी होती रही. एक तगड़े आदमी ने बाबा को धक्का दिया. बाबा ने उसका कालर पकड़ लिया. उस सांड-से आदमी ने बाबा को धक्का मार नीचे गिरा दिया. काफी देर छीना झपटी के बाद हैंडल जैसी लोहे की छड़ से बाबा के सिर पर किसी ने वार किया जिससे वे ज़मीन पर गिर गये. ट्रक ड्राइवर और सभी आदमी ट्रक भगाकर ले गये. बेहोशी की हालत में बाबा को किसी ने दूसरे दिन वहां गिरे देखा. उठाकर घर लाने के बाद वे सात दिन बेहोशी की हालत में पड़े रहे और धीरे-धीरे शांत हो गये. उनके जंगल में गिरने और मिलने की कहानी कई तरह से गांव में कई दिन तक बखानी जाती रही. कोई कहता, पांव फिसल कर गिरे, कोई कहता किसी जानवर ने हमला कर गिरा दिया.

आज भी उसे बाबा की सुनाई एक कहानी नहीं भूलती- “जंगल में एक पेड़ था. बहुत ऊंचा, लम्बा, तगड़ा, हरा-भरा. एक बच्चा उसका दोस्त था. वह कभी उसके तने पर आ बैठता, कभी शाख पर. कभी फल तोड़ता, कभी फल खाता. पेड़ को उसका नन्हा-नन्हा स्पर्श बड़ा सुखद लगता. बच्चा बड़ा हुआ तो एक दिन मायूसी से पेड़ से बोला कि वह अब पढ़ना चाहता है, उसके साथी स्कूल जाते हैं किंतु उसके पास फीस और किताबें नहीं हैं. पेड़ ने कहा, कमाल हो गया. देखो, मेरी शाखाओं में कितने फल लगे हैं, इन्हें तोड़कर बाज़ार में बेचो और किताबें ले लो. बच्चे ने वैसा ही किया और किताबें खरीद रोज़ स्कूल जाने लगा. कुछ दिनों बाद वह युवक बन गया और स्कूल के बाद आगे पढ़ने की इच्छा लेकर पेड़ के पास आया. पेड़ ने कहा, वाह! दोस्त! ये क्या बात हुई, मेरी टहनियां काटकर  बेचो और पैसे इकट्ठे कर लो. उसने पेड़ की मोटी-मोटी टहनियां काट कर बेचीं और बाहर पढ़ने चला गया. जब अगली पढ़ाई हुई तो उसकी इच्छा सात समुद्र पार जाने की हुई. पेड़ ने उसे अपना मोटा तना भी दे दिया और वह नौका बना समुद्र पार चला गया. पेड़ का ठूंठ कई दिन तक आंखें गड़ाये इंतज़ार करता रहा कि मेरा दोस्त वापस लौटेगा. दोस्त नहीं लौटा. ठूंठ में हर साल कोंपलें आतीं तो वह सिर उठाकर समुद्र की ओर देखता. साथी पेड़ उसे समझाते, वह नहीं आयेगा. पेड़ कहता, वह अवश्य लौटेगा. आखिर एक दिन वह लौटा तो उसके साथ और भी बहुत-से लोग थे. उन सब के हाथों में पेड़ काटने की मशीनें थीं.’’

ऑफिस में नये अफसर के आने पर कुछ कर्मचारी वफादार बनते हुए उसके करीब आने की कोशिश करते हैं. ऐसे ही एक रेंजर उसका विश्वासपात्र-सा बन गया था. रातों-रात लकड़ी के स्लीपरों के कई ट्रक नाके से पार हो जाते हैं, उसने बताया था. एक शाम उसने उसकी सीमा में एक चेक पोस्ट से लकड़ी के ट्रक जाने की सूचना दी. पहले तो विश्वास नहीं हुआ कि क्या सूचना सही है भी या नहीं. क्या पता उसे बेवकूफ ही बनाया जा रहा हो. फिर भी उसने चुपके से नाकाबंदी कर दी भरोसे के आदमियों को साथ रखकर पास के रेस्ट हाउस में ठिकाना बना लिया.

उस इलाके में तो शाम छः के बाद कोई नज़र नहीं आता था. वैसे भी यह चेक पोस्ट जंगल के निकास पर एक सुनसान जगह में थी.

रात दस बजे के करीब एक ट्रक आया. चेक पोस्ट में लम्बा डंडा लगा हुआ था. ड्राइवर ने इंजन बंद किये बगैर खिड़की से मुंह निकाला और चिल्लाया- ‘खोल दे ओए पुत्तर! ट्रक खाली है.’ चेक पोस्ट से दो आदमी टार्चें लेकर आगे बढ़े. ड्राइवर को कुछ खटका हुआ. दूसरी ओर से एक मोटा आदमी उतरा- ‘लालाजी का ट्रक है भाई. पता नहीं आपको. ऊपर से संदेश नहीं आया क्या!’

चेक पोस्ट वालों ने हल्ला कर उन्हें नीचे उतारा. उतने में रेस्ट हाउस से पूरी फोर्स आ पहुंची. स्थिति बिगड़ती देख ड्राइवर और मोटा आदमी अंधेरे में गुम हो गये. एस.एच.ओ. भी साथ था अतः उसी समय ट्रक को लाकर पास के थाने में लगा दिया गया.

रात के ग्यारह बजे वसुंधरा घर पहुंची तो फोन की घंटी घनघना उठी. डिप्टी कमिश्नर का फोन थाः ‘मैडम! आप को रात में डिस्टर्ब किया. अभी-अभी मुझे किसी ने बताया है कि आपके महकमे ने लकड़ी का एक ट्रक पकड़ लिया है.’

‘अच्छा! कहां!’ एकदम अनजान बन गयी वसुंधरा.

‘यहीं, किसी पास के नाके पर. उसे रिलीज कर दीजिए. आपको पता नहीं वह किसका है.’ 

‘अच्छा!… यदि पकड़ा गया है तो किसी का भी हो, छूटना मुश्किल है.’ उसने दृढ़ता से कहा.

‘देखिए, आप नयी-नयी हैं सर्विस में. अभी आप को पता नहीं है. ये लालाजी का माल है. लालाजी यहां के मंत्रीजी
के करीबी हैं. वे फॉरेस्ट सेक्रेटरी के भी करीबी हैं. उनका फोन भी आपको आने वाला होगा.’

‘चलो, फोन आयेगा तो देख लेंगे.’ कहकर वसुंधरा ने फोन काट दिया.

फोन का चोंगा उठाकर नीचे रख दिया. रात करवटें बदलते काटी. बार-बार लग रहा था लगातार घंटी बजती जा रही है.

उसे खटका हुआ, कहीं दबाव में आकर ट्रक छोड़ना न पड़े. ऑफिस पहुंचते ही उसने एक खबर बनायी और अखबारों को दे दी. शाम तक कई पत्रकारों के फोन आ गये. अगले दिन अखबारों में मोटे हेडिंग लगाकर यह खबर छापी- ‘वसुंधरा चेकपोस्ट पर लकड़ी के स्लीपरों से भरा ट्रक पकड़ा गया. मौके से ड्राइवर तथा मालिक फरार. ट्रक पुलिस के कब्जे में रखा गया है. यह ट्रक इलाके के किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति का माना जा रहा है किंतु अभी तक किसी ने भी इस पर अपना क्लेम नहीं जताया है. इस घटना से इतना तो सिद्ध होता है कि इस इलाके में जंगल माफिया सक्रिय है. वनमंडलाधिकारी वसुंधरा चौधरी ने बताया इस तरह लकड़ी की तस्करी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और सभी नाकों पर दिन-रात चेकिंग को और कड़ा कर दिया जाएगा.’

अगले दिन जिलाधीश की अध्यक्षता में होने वाली मासिक शिकायत समिति की बैठक के लिए चौगान से गुजरी तो सभी उसे देख रहे थे. मीटिंग में उसके आने पर जिले के अफसर खुसर-फुसर करने लगे. बैठक में स्थानीय विधायक भी आये हुए थे. किसी ने भी उस घटना का ज़िक्र नहीं किया. विधायक ने उसकी उपस्थिति का नोटिस ही नहीं लिया.

जब्त किया ट्रक कई दिन तक पुलिस थाने खड़ा रहा. अंत में लकड़ी की नीलामी कर दी गयी. एक रात ट्रक वहां से गायब हो गया.

बहुत जल्दी यथास्थिति कायम हो गयी. जैसे कुछ हुआ ही नहीं.

फरवरी 2016

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