गीतों के आंसू

⇐  अहमद हमीद  ⇒

    चौथी की दुल्हन नहलायी जा रही थी. ढोलक की ढांय-ढांय दिमाग पर घूंसे लगा रही थी. बच्चों की उछल-कूद देखकर मालूम होता था कि आसमान के बहुत-से मासूम फरिश्ते अब शैतान बनकर इस घर की चहारदीवारी में उतर आये हैं. मैं सोच रहा था अपने जलवों में कितने हंगामों को लेकर भाभी की नयी जवानी अपनी रसभरी उमंगों को निचोड़ने मैका छोड़कर ससुराल आयी है.

    क्या पता इस वक्त भाई के दिल में क्या गुजर रही होगी. सुना तो मैंने भी है कि इस क्षण लड़कियों की पलकें आंसुओं से बोझिल हो जाती हैं. लेकिन दिल की छिपी हुई रंगों से कहकहे की पिचकारियां छूटती रहती हैं. क्या भाभी के मश्मरी (नाजुक) जिल्दों (त्वाचा) के नीचे भी गुदगुदाहट-सी हो रही होगी? मैं ऊपरी मंजिल के आंगन की तरफ खुलने वाली खिड़की पर इस्मत चुगताई की ‘चोटें’ अपने हाथ में लिए बैठा था और दिमाग के खुले पृष्ठ पर बड़े खूबसूरत रंगों की लकीरें खींची जा रही थीं. लाल, हरी, गुलाबी, कासनी- जैसे किसी रंगरेज की दुकान पर रंगी हुई ओढ़नियां हवा में लहरा रही हों.

    लेकिन यह ढोलक की ढांय-ढांय, बच्चों का शोर, प्रौढ़ स्त्रियों का भारी-भारी आवाज़ों में बातें करना, मेरे विचारों के चित्रपट पर रह-रहकर जैसे काली रोशनाई का गहरा-सा धब्बा छोड़ रहा था. मेरी इच्छा होती थी कि उन सभी चित्रों पर झुंझलाकर गहरे काले रंग का ब्रश फेर दूं और हाथ में ली हुई किताब का एक-एक पृष्ठ नोच डालूं. लेकिन फिर बाबुल की एक पीढ़ी झुंझलाहट, पाजेब के घुंघरुओं का लहराता हुआ एक गीत वातावरण में तैरने लगता और मैं नजर दौड़ा-दौड़ाकर इधर-उधर मोहल्ले-भर की जवान लड़कियों की झम-झम का तमाशा देखने लगता था. आज तो वह ढेंढस जैसी काली सरीरा भी प्यार किये जाने की सीमा तक खूबसूरत लग रही थी. हर तरफ इतराता हुआ शरीर, थिरकती जवानी. मेरी आंखें शराब पीने लगती थीं और मैं खिड़की के पास और सरककर बैठ जाता था.

    दुल्हन के शायद बाल संवारे जा रहे थे. लड़कियां कंघी, रिबन और तेल की बोतल वगैरह लेकर भागती दिखाई दीं. पाजेबों और पायलों में अचानक ऐसी झंकार पैदा हुई, जैसे बहुत-सी सारंगियों के तार एक साथ ही झनझनाकर टूट गये हो. ढोलक पर थाप पड़ने लगी और मेरे दिमाग पर एक बार फिर हल्के-हल्के घूंसे पड़ते हुए महसूस हुए. लड़कियां दुल्हन के पास कमरे में जाकर आंखों से ओझल थीं और मैं सोच ही रहा था कि अब खिड़की से अलग होकर ‘चोटें’ के शेष पृष्ठ भी समाप्त कर दूं कि अचानक अम्मा के चीख-चीखकर बोलने की अवाज़ आयी.

    वे कह रही थीं- ‘अरी लड़कियों, यह तुम लोग क्या नखरे लेकर बैठ गयी हो! यह कम्बख्त मीरासिनें कहा मर गयीं? वह कुलसुम, वह हसीना, वह बकरीदन, ये सब गायब हो गयीं आखिर? और यह नसिबन- यह नसीबन तो आज दिखाई ही नहीं दी. कमीनी ने कल तक के पैसे ऐंठ लिये और आज ठीक समय पर ही नहीं आयी. दुल्हन के बाल संवारे जा रहे हैं और न गीत, न रीत! मुई नसीबन की तो चुटिया उतरवा लुंगी. क्या सोचा है उसने. भला किसी के घर ऐसी सुहाग-भाग की घड़ियां रोज़ आती हैं कि आज नहीं, तो कल सही. अरे तंबोलन ज़रा उस मोटी चुड़ैल नसीबन के घर…’

    अम्मा की चीख-पुकार जारी थी. और मीरासिनें बड़े दरवाजे की तरफ से पान की पीक फेंकती हुई दुल्हन के कमरे की तरफ बढ़ रही थीं. लेकिन अम्मा एक बार फिर चीखीं.

    इन मीरासिनों में नसीबन नहीं! नसीबन जो मीरासिनों की गुरु समझी जाती थी और जिसके बिना सोहाग-भाग के यह खेल बिलकुल फीके रहते थे. मुहल्ले की सभी औरतें उसे सबसे अच्छी मीरासिन मान चुकी थीं. बड़ी-बूढ़ियां कहतीं, नसीबन के गले में जादू भर दिया है अल्लाह ने!  ढोलक तो ऐसी बजाती है कि क्या किसी तवायफ का तबलची तबला बजायेगा. लेकिन इन सभी गुणों के रहते आज नसीबन नहीं आयी थी और अम्मा की नयी-नवेली बहू का सोहाग-भाग उसके बिना बेरंगा था. गुस्से पर गुस्से की बात तो यह थी कि उस चुड़ैल ने रात ही अपने हिस्से के सभी पैसे जोड़-जाड़कर वसूल कर लिये थे और अम्मा से वादा कर गयी थी कि सुबह तड़के ही आ जायेगी. फिर भी वह नहीं आयी. अम्मा का चेहरा क्रोध से तमतमा रहा था. मीरासिनें गाने-बजाने लगीं. मेरे कदमों के नीचे छत की इंटों से ढोलक की आवाज टकरा-टकराकर सारी छत में एक झुरझुरी-सी पैदा कर रही थी.

    ‘… मेरी दुल्हन की काली लटें-

          जैसे रेशम के गच्छे!’

    ढोलक पर मीरासिन के गीत की यह कड़ी बार-बार गर्म तानों का मुंह चिढ़ा रही थी. आज मुझे भी कुछ ऐसा ही लग रहा था. सचमुच नसीबन उन सबसे अच्छा गाती है. उसकी आवाज़ में एक मीठा-सा दर्द रहता है, एक मीठी-सी कसक होती है, और कभी-कभी तो उसके गीतों के बोल से एक बड़े खूबसूरत अंधेरे का महीन-सा पर्दा लिपटा हुआ दिखाई पड़ता है. मैं कई बार उसके गाने सुन चुका हूं.

    भाभी के आने के पहले न जाने कितनी रातें मेरे यहां गा-गाकर गुजार चुकी थी. मैं देर तक अपने बिस्तर पर पड़ा उसकी आवाज की तरफ कान लगाये रहता. लेकिन आज वह नहीं आयी थी. समझ नहीं सका, नसीबन आज चौथी के दिन चंद घंटों के जलसे में शामिल होने से कैसे रह गयी थी? इस पर मुझे स्वयं आश्चर्य हो रहा था. मैंने खिड़की बंद कर दी और बिस्तर की तरफ आ रहा था कि अचानक बच्चे चिल्लाये- ‘नसीबन आ गयी…नसीबन!’ और अम्मा की गालियां और सलवातें मेरे कानों में आने लगीं.

    अम्मा कह रही थीं- ‘अरी हर्राफा, तेरी अब सुबह हुई है. रात पैसे लेकर चलती बनी और आज अब आ रही है. खड़ी-खड़ी मुहल्ले से निकलवा दूंगी, अगर मेरे साथ ऐसे हरजाईपन के पैंतरे बदले तूने समझी!’ और नसीबन- ‘नहीं, बीबीजी! नहीं, बीबीजी!’ कह-कहकर दुहरी हुई जा रही थी. मैंने खिड़की खोलकर उसे आंगन में नज़र नीची किये खड़ी देखा. उसके माथे पर शिकनें पड़ी  थीं और वह आज सफेद साड़ी पहनकर आयी थी. मुझे ऐसा मालूम हुआ, जैसे वह रोना चाहती है, लेकिन रो नहीं सकती.

    उसका चेहरा इतना पीला था, जैसे पिसी हुई हल्दी. पाउडर समझकर मुंह पर हल्दी पोत ली हो जैसे. कुछ क्षण रुककर वह दुल्हन के कमरे की ओर बढ़ी. उसके कदम कुछ इस तरह उठ रहे थे, जैसे वह अपने शरीर का सारा बोझ अपनी टांगों पर डालकर उसे घसीटने की कोशिश कर रही हो. एक मीरासिन की आवाज़ आयी- ‘ओ बी नसीबन, आज तुम्हारे लिए हम बेचारियों ने गालियां सुन ली. अब ढोलक सम्भालों और सारा क्रोध दूर कर दो बीबीजी का.’

    नसिबन शायद अपनी जगह पर बैठ चुकी थी. लेकिन मैं उसे देख नहीं सकता था. क्योंकि दुल्हन का कमरा, जहां सोहाग-भाग की महफिल जमी थी, खिड़की के उलटी तरफ था. मैंने खिड़की खुली छोड़ दी और समीप रखी आराम-कुर्सी पर बैठा गया और सोचने लगा कि आज इस नसीबन को क्या हो गया है, जो वह इतनी उदास दिखाई दे रही है.

    मुझे इन दिनों जब से बीमार रहने लगा हूं, कुछ-न-कुछ सोचते रहने की आदत-सी पड़ गयी है. भले ही उस बात का मुझसे सम्बंध हो या नहीं. लेकिन जब भी हो मेरे सामने आती हैं सोचने ज़रूर लगता हूं. और कभी-कभी तो सोचते-सोचते मेरा सिर दर्द करने लगता है.

    नसीबत गीत गा रही थी, वह गीत जो उसका पेटेंट था. ‘मेरे साजन को लग गयी चोट मुआ कंगना उतारो सखी.’ गीत अत्यंत रूमानी था. मैं कई बार नसीबन से इसी गीत को सुन चुका था. उसके इस गीत में बड़ी मिठास हुआ करती थी. लेकिन आज न जाने क्यों मालूम हो रहा था, जैसे किसी घिसे हुए ग्रामोफोन के रेकार्ड को बजाने की कोशिश की जा रही हो.

    नसीबन की आवाज़ में न आज वह गर्मी थी, न मिठास. यह लगता ही नहीं था कि वह कोई गीत गा रही है. फटी हुई आवाज़ उलझी-उलझी-सी तानें, जैसे गीत के एक-एक शब्द, एक-एक बोल उसके कंठ में फंस-फंसकर बाहर निकल रहे हों. मुझे कुछ मतली-सी आने लगी. और मैंने सोचा, अगर मैं इस वक्त उलटी करने बैठ जाऊं तो शायद इसी तरह का स्वर मेरे गले से भी निकले. लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया और सिरहाने पड़े हुए बटुए में से इलायची निकाल ली.

    रात बड़ी देर से भोजन परोसा गया. स्वादिष्ट व्यंजनों की ऐसी भरमार थी कि भोजन की खुराक और बढ़ गयी. फिर नींद का प्रभाव भी शरीर को बोझिल कर रहा था. मैंने सोचा कि निश्ंिचत होकर सो जाऊं. इतने में नीचे से बड़ी बी के चिल्लाने का स्वर सुन पड़ा. वे कह रही थीं- ‘अरी नसीबन तुझे आज क्या हो गया है, जो तू इतनी देर बाद मरने आयी है? तिस पर गा भी रही है, तो तेरी गला चुराकर. जैसे कोई गर्दन दबा रहा हो तेरी. सुहेल की अम्मा ने ज़रा झिड़क क्या दिया, तेवर ही बदल गये तेरे!  बड़ी आयी मिजाज वाली. गाना हो, तो जी खोलकर गा, नहीं तो चल दूर हो यहां से. खरा पैसा, तो नखरा क्या?’

    ढोलक की आवाज़ रुक गयी थी. नसीबन बोली- ‘नहीं अम्मा बीबी, मैं गला तो नहीं चुरा रही हूं. आज मेरे सिर में दर्द है, इसलिए जोर-जोर से गाने में कनपटियां कचकने लगती हैं, और कोई बात नहीं है.’ कोई आवाज़ उठी- ‘लाओ बहन ढोलक मुझे दे दो, तुम मेरी आवाज़ का साथ नहीं दे पातीं.’ और ढोलक फिर बजने लगा.

    नसीबन फिर गाने लगी. बहुत-सी मीरासिनें मिलकर गा रहीं थी, लेकिन नसीबन की स्वर-लहरी की वह मधुरिमा न जाने कहां दफन थी. नसीबन को मैं बहुत दिनों से जानता था- मुहल्ले वाले भी जानते थे और बहुत-से लोग उसके सम्बंध में अनेकानेक कल्पनाएं किया करते थे.

    लगभग दस वर्ष से कुछ अधिक ही हुआ होगा, वह इस मुहल्ले में न जाने कहां से आयी थी और तब से यहीं बसी हुई है। चांद खां की दरगाह के पास एक खंडहर जैसे कमरे में अपने पति के साथ जिंदगी गुज़ार रही थी. उसका पति पागल-सा है. दिनभर बाज़ारों में इधर-उधर घूमा करता है- चलते-चलते यदि कहीं मिर्गी के दौर पड़ने लगते हैं, तो घंटे-घंटे के बाद खुद ही होश में आकर उठ बैठता और लड़खड़ाता हुआ घर पहुंच जाता है.

    पर यदि दौरा अधिक तेज़ पड़ा, तो कोई परिचित उसे लाद-फांदकर घर तक पहुंचा देता है, या कभी खबर मिल जाने पर बुर्के में लिपटी आती है नसीबन और जैसे भी होता, उसे घर ले जाती है.

    सोचता हूं, नसीबन की दुनिया न जाने कितनी अंधेरी है. गत दो वर्षों से देख रहा हूं कि इसी तरह गा-बजाकर वह अपने पति की जिवित लाश ढोये जा रही है. मुहल्ले वालों के अनुसार वह उत्तर प्रदेश के किसी गांव की रहने वाली है और हनीफ के साथ अपने घर से निकल भागी. कुछ दिनों हनीफ के साथ इधर-उधर रहकर जवानी के खेल-तमाशे में मगन घुमती रही. लेकिन इस बीच हनीफ को मिर्गी का मर्ज हो गया और जीवित रहने के लिए नसीबत को मीरासिन बन जाना पड़ा.

    किसी का कहना है नसीबन जयपुर की है. उसकी मां वहीं की एक प्रसिद्ध तवायफ थी. नसीबन चूंकि इस पेशे से नफरत करती थी. इसलिए वह अपनी नथिया टूटने से पहले ही अपने उस्ताद हनीफ के साथ निकल ही भागी. हनीफ पहले स्वस्थ और सुंदर युवक था. मिर्गी के दौरे तो हाल से ही पड़ने शूरू हुए हैं. पर कौन जाने सच क्या था. नसीबन के चारों ओर मुझे झूठ-ही-झूठ लिपटा दिखाई देता था. समाज का झूठ, धर्म का झूठ और सबसे बड़ा जिंदगी का झूठ. उसने खुद अब तक किसी को नहीं बताया था कि वह कौन है और कहां से आयी है.

        एक सच जरूर था उसकी जिंदगी में, और वह था कि उसकी जिंदगी को हनीफ की मिर्गी ने दबोच लिया था. मुहल्ले के पुरुष अपनी झगड़ालू स्त्रियों को नसीबन के निश्छल प्रेम की मिसाल देते थे और नसीबन का यह प्यार, जबर्दस्ती के ठहाकों और आंसुओं के थेपड़ों में फंसा उसकी जिंदगीं के माथे पर व्यंग्य बनकर चिपक गया था.

    मैं अपनी आदत के अनुसार नसीबन के बारे में न जाने क्या-क्या सोचता रहा कि अचानक मुझे ऐसा लगा, जैसे मेरे चारों तरफ असंख्य कुत्ते भौंकने लगे हों! नीचे से बुहत-सी औरतों की मिली-जुली आवाज़ें आ रही थी, अम्मा की आवाज़ उन सबमें ऊंची थी और यह सब आवाज़ एक साथ मिलकर नसीबन के विरुद्ध उठ रही थी. एक आवाज़ आयी- ‘खुदा की मार! भला यह भी कोई बात है कि सुहाग-भाग की खुशियों के दिन विदाई के दर्दीले गीत गाये जायें. नसीबन तेरे कंठ को सांप डस ले.’

    दूसरी आवाज आयी- ‘नसीबन आज तू भंग चढ़ाकर तो नहीं आयी थी? भला आज के दिन विदाई का गीत गाया जाता है- बड़ी आयी दुल्हन के मैके का गीत गाने वाली…’

    तीसरी आवाज़ आयी. इस बार अम्मा बोल रही थीं- ‘मुई की चुटिया पकड़कर निकाल बाहर करो. अब हरामजादी मेरे दरवाजे पर चढ़ी, तो सात चुड़ैलों की जूतियां मारूंगी मुंह पर, जा दूर हो हर्राफा मेरे सामने से, एक धेला नहीं दूंगी तुझको.’

    नसीबन बिलकुल खामोश खड़ी थी, जैसे सांप सूंघ गया हो उसे. कुछ देर तो वह यों ही खड़ी रही और सबका मुंह ताकती रही. एक बार फिर जब अम्मा के मुंह से एक बड़ी-सी गाली निकली, तो वह चुपचाप अपना बुर्का ओढ़कर आंसू पोंछती हुई दरवाजे से बाहर निकल गयी. अब अम्मा का गुस्सा दूसरी मीरासिनों पर उतर रहा था. उन्होंने यह कहकर उन सबको निकाल दिया कि जाओ चुड़ैलों, आज मेरे काज का आखिरी दिन था ऐसे तो मेरे घर की बहू-बेटियां तुससे अच्छा गा-बजाकर यह मौका गुजार देंगी. ओह, अम्मा का गुस्सा…खुदा की पनाह!

    शाम हो चली थी. अतः जूते पहनकर नीचे उतरा. बरामदे से होता हुआ बाहर निकल गया. पोलो ग्राउंड को जो सड़क जाती थी, उसी के मोड़ पर दायें हाथ वाली गली में प्रवेश करते ही चांद खां की दरगाह और उससे मिली वे कोठरियां थी, जिनमें से एक में नसीबन और हनीफ रहते थे.

    मैं सोचता जा रहा था कि आज अम्मा ने नसीबन का जो हक मारा है, वह कहां तक उचित है. वास्तव में मां की ईमानदारी पर मुझे इसलिए विश्वास था कि वह मेरी मां थी. मां, जिसके चरणों में स्वर्ग होता है. मीरासिन मिल गयी. वह अपने कंधे पर ढोलक लटकाये बड़ी हैरान-परेशान, तेज़ कदम उठाती मेरी बगल से गुज़रने वाली थी, लेकिन मुझे देखते ही ठिठक गयी. मुझे भी रुकना पड़ा.

    ‘बड़ा गजब हो गया छोटे मियां. मेरा तो कलेजा मुंह को आ रहा है- हाय री दुनिया ….’ कुलसुम बोली.

    ‘क्या गजब हो गया कुलसुम? खैर तो है? आखिर तुम इतनी घबरायी हुई कहां जा रही हो?’ मैंने बात काटकर पूछा.  

    ‘… क्या कहूं, छोटे मियां… वह करमजली नसीबन न जाने किस दिल से आज आपके यहां गाने गयी थी… उसका पति सुबह ही खुदा का प्यारा हो गया…और वह उसकी लाश को घर में छोड़कर दरवाज़े में कुंडी चढ़ाकर आपके यहां पहुंची थी. अभी आपकी मां के झिड़ककर निकाल देने पर जब वह अपने घर को जाने लगी, तो उसके यहां रात अपना पैसा लाने चली गयी. पहुंचते ही मेरे तो जैसे होश ही उड़ गये. बेचारा हनीफ मुर्दा पड़ा था और मांगोजली नसीबन उसकी पाटी से लगी आंसुओं से डूबी जा रही थी.’

    ‘मुझे देखते ही आंसू-वांसू पोंछकर ऐसी बन गयी, जैसे कुछ हुआ ही न हो. कहने लगी- ‘आओ कुलसुम, तुम्हारे पैसे रात मैंने नहीं दिये, और जिस वजह से नहीं दिये, वह वजह भी आज मेरी दुनिया से चल बसा. रात के ग्यारह बजे हकीमजी के यहां से दवा लायी, उसको पीकर जो मेरा पागला सोया, तो बस सो ही गया. घर में कफन-दफन के दाम नहीं थे. इसलिए जी दाबकर मलिक जी के यहां चली गयी कि चौथी की विदाई के कुछ रुपये मिल जायेंगे, तो जिस भोले राजा को जीते-जी मैंने अपने कंठ और फेफड़ों की कमाई खिलायी, उसके कफन-दफन के लिए भीख मांगने या चंदा लेने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. लेकिन जब किसी के भाग्य में मरने के बाद भीख और चंदा ही लिखा हो, तो मैं क्या कर सकती थी.’

    ‘और नसीबन की आंखों से फिर आंसू टपकने लगे. छोटे मियां, मैं तो उस औरत की हिम्मत पर दंग हूं कि वह सिर्फ आंसू बहा रही है और वह भी रुक-रुककर…’

    कुलसुम कहे जा रही थी और मेरी आंखों में ऐसा लग रहा था, जैसे कोई जलने वाली दवा टपकायी जा रही हो, कानों में छोटे-छोटे दहकते हुए अंगारे ठूंसे जा रहे हों.

( फरवरी 1971 )

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