खूंटा बदल गया

पुरु की अम्मा हर जाड़े में आटे के लड्डू बनाती थीं. उस रात भी उन्होंने लालटेन की रोशनी में, चूल्हे की आग के सामने बैठ, लड्डू बनाये थे. वे जब तक लड्डू बनाती रही

थीं, तब तक उनके बेटे ध्रुव और पुरु लड्डुओं के लालच में, चूल्हे के पास बिछी चटाई पर बैठे रहे थे. सबसे छोटा बेटा मुन्ना भी, शाल में लिपटा, वहीं चटाई पर लेटा, हवा में अपने छोटे-छोटे हाथ-पैर मारता, चमकदार आग देख खेलता रहा था. लड्डू बनते-बनते ध्रुव निंदासा हो गया था, सोने चला गया था. मुन्ना को भी अम्मा रजाई में लिटा आयी थीं, आंगन से ठंडी हवा आ रही थी. लड्डू बनने, ठंडे होने के बाद अम्मा ने एक गिलास गर्म दूध के साथ, एक लड्डू पुरु को दिया था. हर साल की भांति इस बार की लड्डू पथरा गये थे. पथराना उनके लड्डूओं की खास बात होती थी. सिल-बट्टे पर फोड़ कर न खाये जाएं, वे पुरु की अम्मा के लड्डू कैसे हो सकते थे.

पुरु के पिता सांझ से ही गांव की किसी पंचायत में चले गये थे, अभी तक नहीं लौटे थे. अम्मा अपना काम निपटा उन्हीं के इंतज़ार में बैठी थीं. चूल्हे पर कढ़ाही में दूध चढ़ा था. अम्मा पुरु से सोने जाने के लिए कई बार कह चुकी थीं, पर उसे उनके पास बैठना अच्छा लग रहा था. वह बैठा-बैठा अम्मा की नाक की कील की रोशनी मुट्ठी में भरने की कोशिश कर रहा था. उनकी नाक की कील के तराशे नग पर पड़ने वाली लालटेन की रोशनी प्रतिबिम्बत हो दीवार पर जा पड़ती थी, सिर के हिलने के साथ वह भी हिलती-डुलती थी. वह बार-बार कोशिश करता था, पकड़ न पाता था, वे सिर हिला देती थीं. वह हर बार कहता था. ‘अम्मा! सिर मत हिलाना.’

पिता के घर लौटने तक पूरे गांव में सोता पड़ चुका था, इक्का-दुक्का कुत्ते भी रोने-मैंकने लगे थे. पुरु भी सोने चला गया था.

‘दूध औट-औट के रबड़ी हो गया है, दे दूं?’ अम्मा ने चमचे से दूध की मलाई एक ओर करते हुए, थोड़ी देर बाद पूछा.

पिता ने अम्मा की बात की ओर ध्यान न दिया, कुछ चिंतित-से लग रहे थे.

वे आज कुछ अधिक ही चुप थे. कारण अम्मा की समझ में न आ रहा था, सोच रहीं थीं शायद जहां पंचायत में गये थे, वहां कुछ हुआ होगा.

थोड़ी देर बाद, गला खखारते हुए बोले- ‘ध्रुव की अम्मा! बहुत दिनों से तुमसे एक बात कहने की सोच रहा था.

‘मुझ से?’

‘हां तुम्हीं से.’

‘ऐसी क्या बात है?’ अम्मा चटाई पर सम्भल कर बैठ गयीं.

‘ध्रुव की अम्मा! मैं जो कहने जा रहा हूं, उसे पहले तुम ध्यान से सुन लेना, फिर तुम्हारा जो मन करे बताना. देखो! हमारे तीन लड़के हैं, हैं कि नहीं?’

‘हां हैं’, अम्मा ने हुंकारी भरी.

‘संजय की बहू के एक भी नहीं है. क्या हम अपने तीन में से किसी एक को संजय को दे सकते हैं? सोचो, दो तब भी अपने पास बने रहेंगे. उनके यहां एक बच्चा पहुंच जाने से उनका मन भी लगा रहेगा. और फिर खेती-जायदाद का मामला भी है. ज़रा सोचो, संजय ने कहीं अपनी ससुराल का कोई बच्चा लाकर अपने पास रख लिया तो आधी जायदाद फोकट में अपने हाथ से निकल जाएगी. वैसे, सारी की सारी घूम-फिर अपने ही घर आ जाएगी. पूरा दारोमदार तुम्हारे ऊपर टिका है. खूब सोच लो, फिर बताओ.’

‘मैं अपना कोई बच्चा, किसी को न दूंगी. तीन तो क्या, दस होते तो भी न देती. बच्चे क्या कोई खेलने वाले कंचे होते हैं जो इतने अपने पास रख लूं, उतने उसे दे दूं?’ अम्मा ने चूल्हे की गर्म राख में अपनी उंगली चलाते हुए कहा.

‘अरे सुनो तो! दिया हुआ बच्चा नाम भर के लिए उनका रहेगा असली मां-बाप उसके हमीं रहेंगे. कन्नौज है ही अपने गांव से कितनी दूर, चार पैडल मारो और कन्नौज. जब कहना उसे गांव लिवा लाऊंगा या जब चाहना, तुम उसके पास चली जाना. मेरी बात समझने की कोशिश करो. सोच कर देख लो, लाखों की प्रापर्टी का मामला है.’

‘मैं फिर भी न दूंगी,’ अम्मा उठकर खड़ी हो गयीं.

पिता को केवल ‘हां’ सुनने की आदत थी. अंतिम रूप से अम्मा की ‘ना’ सुनते ही उन्हें तेज़ गुस्सा आ गया, चिल्लाये- ‘ध्रुव की अम्मा!’ हाथ में पकड़ा दूध का गिलास आंगन में दे मारा.

वे उठकर खड़े हो गये.

‘मैं जानता था तुम्हारा यही जवाब होगा. बड़ी आई लड़कों वाली, लगता है संसार में तुम्हारे अलावा किसी औरत ने बच्चे जन्मे ही नहीं. मैं भी असल बाप का हूं, देखूंगा, कैसे न दोगी. कल ही एक लड़के को कन्नौज पहुंचा आऊंगा. कौन रोकेगा?’

अम्मा उनके गुस्से से परिचित थीं. गिलास फेंक देने से बहुत डर गयी थीं. गिलास की झन्नाहट से मुन्ना जाग गया था. वे लालटेन की बत्ती धीमी कर, जाकर मुन्ना के पास लेट गयीं.

संजय, पुरु के पिता गिरजा के छोटे भाई थे. उन्होंने डॉक्टरी पास की थी इसलिए कन्नौज में रहकर अपने ही दवाखाने में डॉक्टरी करते थे. उनकी शादी हुए दस साल से अधिक हो गये थे, पर संतान कोई न थी. गिरजा जब भी सौदा-पाती के लिए आते थे, उन्हें संजय हमेशा कुछ परेशान-सा लगता था. वे उस परेशानी का कारण संतान की कमी को समझते थे, पर पूछा उससे कभी कुछ न था.

ऐसे ही एक दिन जब वे कन्नौज गये थे, दोपहर भर के लिए संजय के यहां रुक गये थे. रोटी खाने के बाद संजय उनके पास आकर बैठ गया था. थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करने के बाद उसने बहुत दुखी हो कहा- ‘दद्दा! आपसे एक बात कहनी थी.’

गिरजा ने समझा संजय को पैसों-वैसों की कुछ कमी होगी, वही कुछ कहना चाह रहा होगा, तुरंत बोले- ‘हां, हां कहो क्या बात है?’

‘आप और भाभी, ध्रुव और पुरु में से किसी एक बच्चे को हमें गोद दे दीजिए. यहां घर में कोई बच्चा न होने से घर भांय-भांय करता है. आपकी बहू भी परेशान रहती है. आपके बच्चे हमारे बच्चे हैं. आप जिसे भी देंगे, हम उसे बड़े प्रेम से पालेंगे. खाना-पीना, पढ़ाई-लिखाई, कपड़ा-लत्ता, सब खर्चा हम उठा लेंगे. आप आज्ञा देंगे तो उसके बाप की जगह अपना नाम भी लिखा दूंगा. भाभी से पूछ कर देखिएगा.’

वास्तव में संजय ने गिरजा के मन की बात कह दी थी. ऐसा तो वे सालों से सोच रहे थे, उत्साहित होकर कहा- ‘हां, हां इसमें कौन-सी दिक्कत है. हम सगे भाई हैं. हमारे-तुम्हारे बीच बंटवारा भी किस चीज़ का है. मेरे बच्चे तुम्हारे बच्चे हैं, जब चाहो एक को गोद ले लो. चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं.’

कन्नौज से गांव लौटने के बाद गिरजा उसी दिन संजय वाली बात अपनी पत्नी से कह देना चाहते थे, पर उस दिन उनकी आंखों के सामने ऐसा कुछ घट गया, जिससे उन्होंने वह बात कई दिन बाद कही. हुआ ऐसा कि उस शाम जब वे गाय के पास दूध दूहने बैठे, ध्यान गाय-बछड़े की ओर चला गया. बछड़ा गाय के पास उसी के खूंटे से बंधा था. गाय बड़े प्रेम से उसे चाट रही थी. दूध दूहने के बाद जब वे बछड़ा गाय से अलग खींच ले जाने लगे, गाय उन्हें मारने दौड़ पड़ी. ऐसे तो गाय रोज ही अपना बछड़ा चाटती थी, थोड़े बहुत सींग भी रोज हिलाती थी, पर उनका ध्यान उस ओर कभी न गया था. आज शायद इसलिए गया था, संजय वाली बात दिमाग में ताज़ी थी. सोचने लगे, कोई पशु अपने बच्चे को अपने से दूर किये जाने पर इतना प्रतिरोध कर सकता है, तो मेरी पत्नी उसके किसी बच्चे को उससे अलग किये जाने पर कितना करेगी. मेरी पत्नी पशु नहीं है, मां तो है.

अम्मा लेट ज़रूर गयी थीं पर नींद उनकी आंखों से हज़ार कोस दूर थी. पुरु उनके दाईं ओर और मुन्ना बाईं ओर लेटा था. ध्रुव पिता के पास लेटा था. लालटेन की मरियल रोशनी में वह मढ़ाह एक अंधेरी गुफा जैसा लग रहा था. अम्मा ने अपना एक स्तन मुन्ना के मुंह में दे रखा था, वह चुकुर-चुकुर दूध चूस रहा था. उन्हें आज पिता का व्यवहार बहुत खराब लगा था. वे जानती थीं, संजय को वे बहुत चाहते हैं, जायदाद के लिए भी चिंतित रहते हैं. दरअसल, संजय से अधिक उन्हें जायदाद की चिंता रहती है. पर वे यह नहीं जानती थीं, उनकी यह चिंता एक दिन वज्र बन कर उनके बच्चों पर आ गिरेगी. सोचने लगीं, अगर मैंने अपना कोई बच्चा संजय को नहीं दिया, ध्रुव के पिता और गुस्सा हो जाएंगे, घर में पता नहीं क्या-क्या उत्पात करेंगे. मेरा घर पूरे गांव के लिए एक तमाशा बन जाएगा. पर यह भी हो सकता है, मेरे एक बार न कहने के बाद वे दुबारा हमसे वह बात न कहें. बच्चे क्या सिर्फ मेरे ही हैं, उनके भी तो हैं. और मान लो उन्होंने दुबारा पूछा, मैं क्या करूंगी? क्या कहूंगी? आज मना कर दिया, क्या फिर मना कर पाऊंगी? मान लो उनके दुबारा पूछने पर मैं ‘हां’ कर दूं. उस ‘हां’ का क्या मतलब होगा? यही न कि अपने तीन बच्चों में से मुझे कोई एक संजय को देना होगा, हमेशा-हमेशा के लिए. लेकिन सवाल यह है कि कौन-सा दूंगी? ध्रुव को? सात साल का हो गया है, सबसे बड़ा भी है, उसे ही दे दूंगी. लेकिन कैसे? उसकी तो तबियत ही ठीक नहीं रहती. सात का हो ज़रूर गया है, लगता पुरु से भी छोटा है. जिगर भी उसका आये दिन बढ़ा रहता है, कुकुर खांसी भी उसका पीछा नहीं छोड़ती. आंखों के सामने रहता है, दिन में तीन-तीन बार दवा पिलाती हूं. वहां चला जाएगा, कौन पिलाएगा. संजय की मेहरिया को क्या पड़ी. सुना है, जिन औरतों के औलाद नहीं होती, उन्हें दूसरे के बच्चों की कलक भी नहीं होती. वे जानें भी क्या, बच्चे कैसे जने जाते हैं. तभी ध्रुव को ज़ोर की खांसी आ गयी, खांसते-खांसते उठकर बैठ गया. खांसता रहा जब तक मुंह से सफेद फुचकुर न निकल गया. दौड़कर उसके पास पहुंच गयीं, देर तक उसकी पीठ सहलाती रहीं. खांसी शांत हो जाने पर वह फिर लेट गया. अम्मा उसकी रजाई सम्भाल फिर अपनी खटिया पर लौट आयी. ध्रुव को देने का विचार मन से निकाल दिया. उनके लेटते ही मुन्ना अपना चिड़िया जैसा मुंह खोल, अपनी नन्ही-नन्हीं, अधखुली हथेलियों से अम्मा का स्तन खोजने लगा. इस बार अम्मा ने उसे दूध नहीं पिलाया, ठोंककर सुला दिया. फिर सोचने लगीं, यदि ध्रुव नहीं तो फिर कौन? मुन्ना? वह अभी बहुत छोटा है. संजय वाली को क्या पड़ी है, इतने छोटे बच्चे का हगना-मूतना करेगी. उसे पला-पलाया चाहिए बस. पुरु? हां पुरु को दे दूंगी. यही ठीक रहेगा. पुरुआ शरीर से भी गुद्गुदारा है. ध्रुव से छोटा है, लगता नहीं है. खा भी सब कुछ लेता है, खादर बैल की तरह. फिर उन्हें याद आया, पुरु जब पेट में आया था तब किसी भी कीमत पर बच्चा नहीं चाहती थीं, ध्रुव का जन्म हुए बारह-चौदह महीने ही हुए थे तब. कितनी कोशिश की थी उसे गिराने की, कितना सिरका पिया था, ध्रुव के पिता ने कन्नौज से एक अंग्रेज़ी दवा भी लाकर दी थी. फिर भी वह गिरा नहीं था. पैर अड़ा कर बैठ गया था मेरी कोख में. कैसे गिरता, उसे धरती पर आना जो था. अम्मा ने पुरु की ओर करवट ले ली. वह गहरी नींद में था, फिर भी अम्मा ने बांहों में भर लिया, एड़ी सहलाकर देखी खूब गर्म थी. उसके बालों में उंगलियां चलाते हुए, अपनी छाती से लिपटा लिया. मन ही मन उससे पूछा, पुरुआ! तू मेरी कोख से क्यों पैदा हुआ था? मैं तुझे किसी और को देने जा रही हूं. आंखें रिसने लगीं, नाक रुंध गयी. पिता के डर से नाक सरसरा भी न सकती थीं, बस बह जाने दी. उन्होंने पुरु को अपने मन से घटाना शुरू कर दिया था. एक न एक दिन उसे जाना ही था. लेकिन जितने भी दिन वह उनके पास था वे उसे अधिक से अधिक प्यार कर लेना चाहती थीं. इसलिए उस दिन सवेरे उन्होंने सिर पर वो वाला ऊनी टोपा लगाया था जो उन्होंने अभी हाल ही में बुना था. उस दिन उन्होंने उसे दो लड्डू बिना मांगे दिये थे. उस दिन उन्होंने उसके दूध में मलाई भी सबसे गगज्यादा डाली थी. उस दिन उन्होंने उसका हाथ-मुंह भी सबसे पहले साफ किया था तथा उसके माथे पर काजल के, एक की बजाय, दो टीके लगाये थे. ऐसा करते समय उन्हें बार-बार लगा था, वे अपने बच्चे को बलि के लिए तैयार कर रही हैं. बकरे को भी बलि से पहले ऐसे ही खूब खिलाया-पिलाया जाता है.

तीसरे दिन पिता ने अम्मा से पूछा- ‘तो ध्रुव की अम्मा! क्या जवाब है तुम्हारा? संजय को क्या कहला भेजूं?

अम्मा उस समय रात की रोटी के लिए आटा मांड़ रही थीं. उन्हें पता था, यह बात फिर से उठेगी, और सही बात यह थी कि वे इस बात का इंतज़ार ही कर रही थीं. एक जवाब उन्होंने अपने मन में तैयार करके रख लिया था.

‘पुरुआ को दे आओ,’ अम्मा ने बिना उनकी ओर देखे कह दिया, आटे का तसला दीवार की तरफ रख, उनकी ओर पीठ कर ली, धप्प, धप्प आटा मांड़ने लगीं.

एक दिन सवेरे, पिता ने अपनी साइकिल पोंछनी शुरू कर दी. साइकिल के पहियों में हवा कम थी, हाथ पम्प से देर तक फच्च पीं-फच्च पीं हवा भरी. नहाने जाने से पहले अम्मा से कहा- ‘ध्रुव की अम्मा! पुरु का हाथ-मुंह धो दो, कन्नौज छोड़ आऊं. संजय भी क्या सोच रहा होगा, इतने दिन हो गये, वादा करके भी कोई लड़का उसके यहां नहीं पहुंचाया.’

अम्मा ने पुरु को बाहर से पकड़ लाने के लिए ध्रुव को आदेश दिया.

अम्मा का बुलाना सुन, पुरु हमेशा की भांति खुश हो गया. जानता था अम्मा उसे तभी बुलाती हैं, जब उन्हें कुछ खाने की चीज़ देनी होती है. दौड़कर अम्मा के पास चला गया, उनके हाथ देखने लगा. हाथ खाली थे. अम्मा ने उसे कुछ बोलने का मौका न दिया, आते ही पकड़ लिया, उसके सिर पर का टोपा निर्दयता से खींच आंगन में बिछी खटिया पर फेंक दिया. खींच कर पनारे पर ले गयीं, ठंडे पानी से उसका मुंह धोने लगीं. वह समझ न पाया उसका मुंह आज इस तरह से क्यों धोया जा रहा है. वास्तव में अम्मा को अपनी विवशता पर बहुत गुस्सा आ रहा था. वह गुस्सा वे पुरु पर उतार रही थीं क्योंकि वही केवल उनके हाथ में था. और यह भी कि जो हमेशा के लिए घर से चला जाएगा उससे प्रेम कैसा.

‘अम्मा! तुमने हमें क्यों बुलाया था?’ पुरु ने अम्मा से पूछा, जब वे उसका मुंह अपनी धोती के पल्लू से पोंछ रही थीं.

‘कुछ नहीं, आज तुम्हें अपने पिता के साथ कन्नौज जाना है.’

‘और मुन्ना?’ उसने पूछा.

‘कोई नहीं, तुम अकेले जाओगे.’

पिता ने, साइकिल के डंडे पर, पुरु को बैठाने के लिए, एक तौलिया पहले ही बांध लिया था. खुद कुर्ता-धोती पहन, तैयार हो कहा- ‘पुरुआ! चल.’

तैयार खड़े पुरु ने पहले अम्मा की ओर देखा, फिर ध्रुव की ओर, और फिर अम्मा की गोद में चढ़े मुन्ना की ओर.

पिता ने फिर कहा- ‘चलो भी, देर हो रही है, संझा तक घर भी लौटना है.’

पुरु ने रुआंसा हो कहा- ‘अम्मा! तुम भी चलो.’

पिता जानते थे, पुरु थोड़ी ही देर में रोना- गाना शुरू कर देगा, उन्होंने तत्काल उसे उठा कर साइकिल पर बिठा लिया. उसने घबड़ा कर पिता की ओर देखा- ‘मुन्ना को भी बिठा लो.’

पिता ने साइकिल आगे बढ़ाते हुए कहा- ‘चलो, मैं तुम्हें कन्नौज में जलेबी खरीद दूंगा. मुन्ना को यहीं रहने दो, अम्मा के पास, नहीं तो वह तुम्हारी सारी जलेबी खा जाएगा.’

जलेबी का नाम सुन पुरु का मन थोड़ी देर के लिए बहल गया. उसने मुड़कर अम्मा की ओर देखा. तभी ध्रुव ने आगे बढ़; अपनी कमीज की जेब से एक फिरकी निकाल पुरु को दी. पुरु ने लौटा दी- ‘रख लो, शाम को लौटूंगा, तब खेलूंगा.’

चलती साइकिल से उसने आखिरी बार अम्मा को देखा. इस बार उसे अम्मा का चेहरा साफ-साफ नहीं दिखाई दिया, बस उनकी छींटदार धोती दिखाई दी. धीरे-धीरे, सरसों के पीले फूलों के बीच, पगडंडियों पर दौड़ती साइकिल, उन फूलों में डूबती चली गयी.

अम्मा घर की देहरी पर अपनी फैली आंखों के साथ ठगी सी खड़ी रहीं. उन्हें लगा था, उनके पुरु को कोई कसाई, उसके गले में रस्सी बांध, उनसे दूर खींचे लिये चला जा रहा है, और वे एक अदृश्य खूंटे से बंधी इतनी लाचार हैं कि चाह कर भी अपने पुरु को उससे नहीं छुड़ा सकतीं. उन्होंने देखा, चौतरे पर गया और बछड़ा आमने-सामने बंधे थे. पशु थे तो क्या हुआ, एक दूसरे को देख तो सकते थे. वे मुन्ना को गोद में लिये ही उस बछड़े के पास बैठ गयीं, उसके गले से लिपट, बिलख कर, जी भर कर रोयीं. रोते-रोते वे एक ही बात कह रही थीं- ‘हाय! आज मेरे पुरुआ का खूंटा बदल गया.’

पुरु के काका का दवाखाना कन्नौज के दूसरे दवाखानों की तुलना में कम ही चलता था. काका के जीवन में कोई उत्साह न था. दिन भर बिस्तर पर करवटें बदलते रहने और समय-बेसमय सोते रहने के कारण उनका शरीर स्थूल तथा बेतुका-सा हो गया था. काकी का हाल भी कोई खास अच्छा न था. उत्साह नाम की चीज़ उनके जीवन में भी कोई न था, जब मर्जी हुई नहा लिया, जब मर्जी हुई बना-खा लिया, और जब मर्जी हुई सो लिया. काका को पूरा भरोसा था, उनके भाई उन्हें एक बच्चा दे देंगे, काकी को न था. वे किसी का कोई बच्चा चाहती भी न थीं. उनका मानना था, जब भगवान ने मुझे कोई संतान नहीं दी, तब किसी दूसरे का बच्चा गोद लेने से क्या हो जाएगा.

पुरु और उसके पिता दोपहर के लगभग बारह बजे कन्नौज पहुंच गये. पिता ने उसे साइकिल से नीचे उतार खड़ा कर दिया. लड़खड़ा गया वह, उसके दोनों पैर डंडे से लटकते-लटकते कब के सुन्न हो गये थे. संजय काका उस समय खर्राटे भर रहे थे, दद्दा के अचानक आ जाने से हड़बड़ा कर उठ बैठे. पिता और पुरु को देख काकी को जूड़ी-सी आ गयी, चिंता हो गयी, आज से एक जने का खाना और बनाना पड़ेगा.

पिता ने पुरु के सिर पर प्रेम से हाथ फेरते हुए कहा- ‘जाओ बेटा! आज से ये काकी ही तुम्हारी अम्मा हैं.’

वह सहमता-सकुचाता, एक-एक डग भरता काकी के पास चला गया. काकी ने काका को दिखाने के लिए, मन न होते हुए भी, उसे अपनी छाती से लगा कर प्यार किया. काकी के शरीर की गंध पुरु को अच्छी नहीं लगी, उसकी मम्मी कितनी अच्छी महकती हैं. काकी को भी पुरु के शरीर से सिसियांध-सी आती लगी. ‘आज से ये काकी ही तुम्हारी अम्मा है’ पिता की इस बात का मतलब वह न समझ सका.

पिता ने नाश्ता पानी करने के बाद उठते हुए कहा- ‘संजय! मैं चलता हूं. पुरुआ का ध्यान रखना. तुम्हारी भाभी से लड़-झगड़ कर लाया हूं, शिकायत का कोई मौका मत देना. चाहो तो, उसके बाप की जगह अपना नाम लिखा देना.’

वे चल दिये. पुरु भी उनके पीछे चल दिया.

‘नहीं बेटा! आज से तुम यहीं रहोगे, ये तुम्हारे नये मां-बाप हैं. मैं बहुत जल्दी मुन्ना को लेकर तुम्हारे पास आऊंगा.’

‘नहीं, मैं अम्मा के पास जाऊंगा.’

‘नहीं, काकी के पास जाओ.’

‘और पिता जलेबी?’ उसने आंखों में आंसू  भर कर कहा.

‘वो तो मैंने तेरा जी बहलाने के लिए कह दिया था.’

वे चले गये, उससे पीछा छुड़ाकर, जैसे कोई अपनी आफत से पीछा छुड़ाकर भागता है.

वह ज़मीन पर लोट गया, ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा. जो कुछ उसके वश में था उसने पूरी ताकत लगा कर किया था, लोटना-रोना.

पिता के थोड़ी दूर निकलते ही काका ने उसे झटके से उठा कर खड़ा कर दिया- ‘चुप, चिल्लाएगा? चुप, चिल्लाएगा?’ उनका थप्पड़ मारने के लिए उठा हाथ देख वह डर गया, आंसू बहने बंद हो गये, सूख कर फटे गालों पर चिपक गये, हिचकियां दूर तक आती रहीं, सो गया.

गांव में पुरु, रात में अम्मा के पास उनके पेट पर अपना एक पैर रखकर सोता था. अम्मा के पास बिना लेटे उसे नींद न आती थी. काकी ने उसे अपने पास नहीं लिटाया, डर था उन्हें, रात में कहीं गद्दा न खराब कर दे, कहीं मूत-पात दिया तो. एक अलग कमरे में खटोले पर लिटा दिया. रात में वह अकेला कभी नहीं सोया था, डर लग रहा था उसे. बरामदे की बत्ती भी थोड़ी देर बाद बंद हो गयी थी. पूरा कमरा अंधेरे से भर गया था. डर के कारण, उसने अपना सिर रजाई से ढक लिया था. उसकी गर्म सांसें बार-बार उसके पास लौट आती थीं. उन्हीं सांसों में उसने एक बार फुसफुसाया- ‘अम्मा!’ बहुत अच्छा लगा उसे, एक बार फिर- ‘अम्मा!’ तभी नीचे, घुंघरू बंधा डंडा सड़क पर पटक-पटक कर चलते पहरेदारे ने आवाज़ लगायी- ‘जागते रहियो।़।़।़.’ वह आवाज़ अंधेरा और सन्नाटा चीरती चली गयी. पुरु के रोंगटे खड़े हो गये, घुटने पेट से चिपका लिये, सोचने लगा अम्मा की नाक की कील, उनकी छींटदार धोती, मुन्ना का चिड़िया जैसा मुंह, ध्रुव की फिरकी, आखिरी रात में अम्मा का बिना मांगे दो लड्डू देना, पिता का वादा करके जलेबी न खरीदना और उसे धोखे से काका के यहां छोड़ जाना.

काका ने दूसरे दिन उसका दाखिला नगरपालिका के एक स्कूल में करा दिया, बाप की जगह अपना नाम नहीं लिखाया. किताबें भी खरीद दीं. हिंदी की किताब उसे बहुत अच्छी लगी. पहले पाठ का पहला चित्र वह बार-बार देखता था. एक दिन काकी से पूछा- ‘यह फोटू किसकी है?’

इसमें लिखा है, ‘अम्मा जरा देख तो ऊपर चले आ रहे हैं बादल.’ फोटू में जो औरत बनी है वह एक अम्मा है, नीचे अम्मा की धोती पकड़े जो लड़का खड़ा है वह उसका बेटा है,’ काकी ने बताया.

फोटू वाली अम्मा भी छींटदार धोती पहने थीं. पुरु को लगता था, ये उसी की अम्मा हैं, और उनकी धोती पकड़े वह खुद खड़ा है. काका-काकी जब भी उससे कुछ पढ़ने के लिए कहते, वह किताब का वही वाला पन्ना खोल कर बैठ जाता. काका को बहुत चिढ़ होती थी, उन्हें लगता था, उसके सिर से अम्मा का भूत अभी तक नहीं उतरा है. वह भूत वे जल्दी ही उतार देना चाहते थे. हर शाम दवाखाने से लौटने के बाद  काका उसे पास बुलाते, उसका कान उमेठते हुए पूछते- ‘पुरुआ! तेरी अम्मा कैसी?’

‘अच्छी.’

वे कान और तेज़ी से उमेठते- ‘जो मैंने कहा वह.’

‘मेरी अम्मा बहुत खराब’, उमेठा हुआ कान छुड़ाने के लिए वह कह देता, देर तक कुत्ते के पिल्ले जैसे कूं कूं करते कान सहलाता रहता.

काका के यहां पुरु की दिनचर्या पानी भरने से शुरू होती थी, भुरारे-भुरारे चौराहे के, नगरपालिका के नल से, एक जंगाल पानी भर देता था. पुरु स्कूल तभी जाता था, जब काकी की मर्जी होती थी. जिस दिन घर पर रहता था, दोपहर में उसे बरामदे में बिठा दिया जाता था. वहां बैठा-बैठा वह आंगन में आने वाली चिड़ियां उड़ाता रहता था. कभी वह उन्हें बैठ जाने देता था. उनके पंख रंग-बिरंगे होते थे. उनके साथ उनके छोटे बच्चे भी आते थे, अपनी मांओं के पीछे-पीछे फुदकते थे, उन्हीं के पीछे फुर्र से उड़ जाते थे. वे अपने एकाध पंख भी आंगन में छोड़ जाती थीं, पुरु उन्हें उठा लाता था, हवा में ज़ोर-ज़ोर से घुमाता था, शायद वह भी उड़ सके. उड़ न पाता था, पंख कम होते थे.

घर के सड़क वाले छज्जे पर खड़ा होना पुरु का रोजमर्रा का नियम था. छज्जे की पखिया तक उसकी ठुड्डी आराम से पहुंच जाती थी. अपनी पतली-पतली कलाइयों पर ठुड्डी टिका, सड़क पर आते-जाते बजरुओं को देखता रहता था. छींटदार साड़ी पहने हर औरत उसे अपनी अम्मा लगती थी, कल्पना करता था, वह औरत जो उसके घर की तरफ चली आ रही है, अभी उसके घर का जीना चढ़ेगी, कुंडी बजाएगी. वो उसकी अम्मा होगी, वह दौड़कर उनकी टांगों से लिपट जाएगा, पल भर में काका-काकी की सारी शिकायतें कर डालेगा. तब काका उसके कान भी न उमेठ पाएंगे, उल्टे अम्मा ही उनके कान उमेठेंगी. उसकी यह कल्पना कभी साकार न हुई, सालों निकल गये, कोई औरत न कभी उसके घर का जीना चढ़ी, न कुंडी बजायी.

घरों की छतों पर बंदर देखना भी उसे बहुत अच्छा लगता था, विशेषकर वह बंदरियां जो अपनी छाती से अपना बच्चा चिपकाये होती थी. वह सोचता था वह भी बंदरिया का बच्चा होता तो अपनी अम्मा की छाती से लिपटा होता.

अम्मा उसे देखने कभी नहीं आयीं. पिता आते थे, उससे बिना मिले, दवाखाने से ही लौट जाते थे. काका ने उनसे साफ कह दिया था- ‘अगर लड़का हमें दे दिया है तो उसे हमेशा के लिए भूल जाओ, वर्ना ले जाओ अपना लड़का.’ वे डर जाते थे, आधी जायदाद का मामला था, कह देते थे- ‘नहीं संजय ऐसी बात कतई नहीं है. उसकी अम्मा ने कहा था, इसलिए पूछ लिया, और अम्माओं को तो तुम जानते ही हो.’

सालों बीत गये. पुरु पहली कक्षा में फेल हुआ, काका की सिफारिश पर प्रोन्नत हुआ. मास्टर साहब दवाखाने से मुफ्त चूरन ले जाते थे. प्रोन्नत होते-होते छठे दर्जे में पहुंच गया. कक्षा में वह फेल ज़रूर होता था लेकिन घर के हर काम में अव्वल रहता था. काका के जूतों में चमकदार पालिश कर लेता था, काकी का स्टोव बिना भभकाए जला देता था, कुर्सी मेज की धूल पोंछ लेता था, दरवाखाने का फर्श चमका लेता था.

एक दिन उसने घर की बैठक में काका के साथ एक आदमी बैठा देखा. काकी ने बताया कि वे उसके पिता हैं. छह साल बाद देखा था उसने, पहचान न पाया था. किवाड़ की आड़ से देर तक पितानुमा उस आदमी को देखता रहा था. थोड़ी देर बाद बैठक में जैसे तूफान-सा आ गया, काका और उस आदमी में तीखी बहस छिड़ गयी-

‘हमने अपना पला-पलाया बेटा, तुझे दे दिया, फिर भी तू जायदाद में हिस्सा चाहता है.’

‘नहीं चाहिए मुझे तुम्हारा बेटा, ले जाओ उसे. गोबर-गणेश है पूरा, हर दर्जे में फेल होता है. कितना भी खिलाओ, लंघा बना रहता है. क्या कमी रखी है मैंने, फिर भी छज्जे पर खड़ा-खड़ा रोया करता है.’

थोड़ी देर बाद काका गुस्से से तनफनाते बैठक से बाहर निकले, पुरु को घसीट कर अंदर ले गये- ‘ले जाओ अपना सुपुत्र, हमें नहीं चाहिए. जितनी रोटी ये खाता है, उतने में कोई भी एक नौकर रख लूंगा.’

काका खटपट-खटपट जीना उतरते दवाखाने चले गये.

वह आदमी बैठक और बरामदे के बीच की देहरी पर खड़ा रहा था. उसने पुरु से कहा- ‘चल बेटा! तेरी अम्मा कब से तेरा इंतज़ार कर रही है.’

अम्मा का नाम सुनते ही पुरु का मन पुलकित हो गया, चल दिया. चलने से पहले उसने एक बार मुड़ कर काकी की ओर देखा, वे खड़ी-खड़ी मुस्करा रही थीं. उनका मुस्कराना उसे अजीब-सा लगा, क्योंकि तब उनका चेहरा और मर्दाना हो गया था.

साइकिल गांव में एक मकान के सामने जा रुक गयी. उसके चिहुंकने की आवाज़ सुनते ही दो बच्चे दौड़ कर बाहरी देहरी पर आ गये.

‘सुनती हो ध्रुव की अम्मा! तुम्हारा पुरुआ.’

एक औरत भी दौड़ कर बाहर आ गयी. पुरु उनमें से किसी को न पहचान सका. वह औरत पुरु को देखते ही दंग रह गयी, हाथ-पैर के बढ़े हुए काले नाखून, टखनों-कुहनियों-गर्द पर मैल की परत, फटे गाल, कानों पर चढ़े जंगली जैसे बाल और उनमें जुओं और लीकों की सघन बस्तियां. उसे लगा वह दहाड़ मारकर रो दे. मैंने क्या अपना बेटा ऐसा ही दिया था. यह तो किसी जंगली जानवर की मांद से आया लगता है.

दोनों बांहें फैला उसने कहा- ‘आ पुरुआ! मैं तेरी अम्मा, यह तेरा छोटा मुन्ना, यह ध्रुव.’ वह एक कदम पीछे हट गया, उस औरत की शक्ल अपने मन में बसी अम्मा से मिलायी. यह वह अम्मा नहीं थी. मुन्ना भी वह न था जो अपना चिड़िया जैसा मुंह फैला अम्मा का दूध पीता था. ध्रुव भी फिरकी वाला न था. सबके सब बदल गये थे. पुरु और उनके बीच छह साल चौड़ा यादों का एक मरुस्थल था, जिसके एक किनारे पर वह खुद खड़ा था और दूसरे किनारे पर वे सब. बीच में थी गर्म हवा और धूल के गुबार.

(सम्पादित)

– सच्चिदानंद चतुर्वेदी

(जनवरी 2014)

 

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