खुद ही को जलाती एक गर्म हवा…  –  रवीश कुमार

आवरणकथा

हमारा टीवी बीमार हो गया है. पूरी दुनिया में टीवी को टीबी हो गया है. हम सब बीमार हैं. मैं किसी दूसरे को बीमार बताकर खुद को डॉक्टर नहीं कह रहा. बीमार मैं भी हूं्. पहले हम बीमार हुए अब आप हो रहे हैं. आप में से कोई कोई रोज हमें मारनेपीटने और ज़िंदा जला देने का पत्र लिखता रहता है. उसके भीतर का ज़हर कहीं हमारे भीतर से तो नहीं पहुंच रहा. मैं डॉक्टर नहीं हूं. मैं तो खुद ही बीमार हूं. मेरा टीवी भी बीमार है. डिबेट के नाम पर हर दिन का यह शोर शराबा आपकी आंखों में उजाला लाता है या अंधेरा कर देता है. डिबेट से जवाबदेही तय होती है. लेकिन जवाबदेही के नाम पर अब निशानदेही हो रही है. टारगेट किया जा रहा है. इस डिबेट का आगमन हुआ था मुद्दों पर समझ साफ करने के लिए. लेकिन जल्दी ही डिबेट जनमत की मौत का खेल बन गया. जनमत एक मत का नाम नहीं है. जनमत में कई मत होते हैं. मगर यह डिबेट टीवी जनमत की वेरायटी  को मार रहा है. एक जनमत का राज कायम करने में जुट गया है. जिन एंकरों और प्रवक्ताओं की अभिव्यक्ति की कोई सीमा नहीं है वे इस आज़ादी की सीमा तय करना चाहते हैं. कई बार ये सवाल खुद से और आपसे करना चाहिए कि हम क्या दिखा रहे हैं और आप क्यों देखते हैं. आप कहेंगे आप जो दिखाते हैं हम देखते हैं और हम कहते हैं आप जो देखते हैं वो हम दिखाते हैं. इसी में कोई नम्बर वन है तो कोई मेरे जैसा नम्बर टेन. कोई टॉप है तो कोई मेरे जैसा फेल. अगर टीआरपी हमारी मंजिल है तो इसके हमसफर आप क्यों हैं. क्या टीआरपी आपकी भी मंजिल है? इसलिए हम आपको टीवी की उस अंधेरी दुनिया में ले जाना चाहते हैं जहां आप तन्हा उस शोर को सुन सकें, समझ सकें. उसकी उम्मीदों, खौफ को जी सकें जो हम एंकरों की जमात रोज़ पैदा करती है. आप इस चीख को पहचानिए. इस चिल्लाहट को समझिए. इसलिए मैं आपको अंधेरे में ले आया हूं. कोई तकनीकी खराबी नहीं है. आपका सिग्नल बिल्कुल ठीक है. ये अंधेरा ही आज के टीवी की तस्वीर है. हमने जानबूझकर ये अंधेरा किया है. मुझे पता है आज के बाद भी मैं वही करूंगा जो कर रहा हूं. कुछ नहीं बदलेगा, मैं बदल सकता हूं. मैं यानी हम एंकर. तमाम एंकरों में एक मैं. हम एंकर चिल्लाने लगे हैं, धमकाने लगे हैं. जब हम बोलते हैं तो हमारी नसों में खून दौड़ने लगता है. हमें देखते देखते आपकी रगों का खून गरम होने लगा है. धारणाओं के बीच जंग है. सूचनाएं कहीं नहीं हैं. हैं भी तो बहुत कम हैं.

हमारा काम तरहतरह से सोचने में आपकी मदद करना है. जो सत्ता में है उससे सबसे अधिक सख्त सवाल पूछना है. हमारा काम ललकारना नहीं है. फटकारना नहीं है. दुत्कारना नहीं है. उकसाना नहीं है. धमकाना नहीं है. पूछना है. अंत अंत तक पूछना है. इस प्रक्रिया में हम कई बार गलतियां कर जाते हैं. आप माफ भी कर देते हैं. लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि हम गलतियां नहीं कर रहे हैं. हम जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं. इसलिए हम आपको इस अंधेरी दुनिया में ले आये हैं. आप हमारी आवाज़ को सुनिए. हमारे पूछने के तरीकों में फर्क कीजिए. परेशान और हताश कौन नहीं है. सबके भीतर की हताशा को हम हवा देने लगे तो आपके भीतर भी गरम आंधी चलने लगेगी, जो एक दिन आपको ही जला देगी. जेएनयू की घटना को जिस तरह से टीवी चैनलों में कवर किया गया है उसे आप अपने अपने दल की पसंद के हिसाब से मत देखिए. उसे आप समाज और संतुलित समझ की प्रक्रिया के हिसाब से देखिए. क्या आप घर में इसी तरह से चिल्लाकर अपने पत्नी से बात करते हैं? क्या आपके पिता इसी तरह से आपकी मां पर चीखते हैं? क्या आपने अपनी बहनों पर इसी तरह से चीखा है? ऐसा क्यों है कि एंकरों का चीखना बिल्कुल ऐसा ही लगता है. प्रवक्ता भी एंकरों की तरह धमका रहे हैं. सवाल कहीं छूट जाता है, जवाब की किसी को परवाह नहीं होती. मारो मारो, पकड़ो पकड़ो की आवाज़ आने लगती है. एक दो बार मैं भी गुस्साया हूं. चीखा हूं और चिल्लाया हूं. रात भर नींद नहीं आयी. अक्सर सोचता हूं कि हमारी बिरादरी के लोग कैसे चीख लेते हैं. चिल्ला लेते हैं. अगर चीखने चिल्लाने से जवाबदेही तय होती तो रोज प्रधानमंत्री को चीखना चाहिए. रोज सेनाध्यक्ष को टीवी पर आकर चीखना चाहिए. हर किसी को हर किसी पर चीखना चाहिए. क्या टीवी को हम इतनी छूट देंगे कि वो हमें बताने की जगह धमकाने लगे? हममें से कुछ को छांटकर भीड़ बनाने लगे और उस भीड़ को ललकारने लगे कि जाओ उसे खींच कर मार दो. वो गद्दार है, देशद्रोही है. एंकर क्या है? जो भीड़ को उकसाता हो, भीड़ बनाता हो वो क्या है? पूरी दुनिया में चीखने वाले एंकरों की पूछ बढ़ती जा रही है. आपको लगता है कि आपके बदले चीखकर वो ठीक कर रहा है. दरअसल वो ठीक नहीं कर रहा है.

कई प्रवक्ता गाली देते हैं. मार देने की बात करते हैं. ये इसलिए करते हैं कि आप डर जायें. आप बिना सवाल किये उनसे सहमत हो जायें. हमारा टीवी अब आये दिन करने लगा है. एंकर रोज भाषण झाड़ रहे हैं. जैसे मैं आज झाड़ रहा हूं. वे देशभक्ति के प्रवक्ता हो गये हैं. हर बात को देशभक्ति और गद्दारी के चश्मे से देखा जा रहा है. सैनिकों की शहादत का राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है. उनके बलिदान के नाम पर किसी को भी गद्दार ठहराया जा रहा है. इसी देश में जंतर मंतर पर सैनिकों के कपड़े फाड़ दिये गये. उनके मेडल खींचे गये. उन सैनिकों में भी कोई युद्ध में घायल है. किसी ने अपने शरीर का हिस्सा गंवाया है. कौन जाता है उनके आंसू पोंछने? शहादत सर्वोच्च है लेकिन क्या शहादत का राजनीतिक इस्तेमाल भी सर्वोच्च है? कश्मीर में रोजाना भारत विरोधी नारे लगते हैं. किसी पुलिस अधिकारी ने कहा है कि हम रोज गिरफ्तार करने लगें तो कितनों को गिरफ्तार करेंगे. बताना चाहिए कि कश्मीर में पिछले एक साल में पीडीपी बीजेपी सरकार ने क्या भारत विरोधी नारे लगाने वालों को गिरफ्तार किया है.

कश्मीर की समस्या का भारत के अन्य हिस्सों में रह रहे मुसलमानों से क्या लेना देना है? कश्मीर की समस्या इस्लाम की समस्या नहीं है. कश्मीर की समस्या की अपनी जटिलता है. उसे सरकारों पर छोड़ देना चाहिए. पीडीपी अफजल गुरु को शहीद मानती है. पीडीपी ने अभी तक नहीं कहा कि अफजल गुरु वही है जो बीजेपी कहती है यानी आतंकवादी है. इसके बाद भी बीजेपी  पीडीपी को अपनी सरकार का मुखिया चुनती है. यह भी दुखद है कि इस बेहतरीन  राजनीतिक प्रयोग को जेएनयू में कुछ छात्रों को आतंकवादी बताने के नाम पर कमतर बताया जा रहा है. बीजेपी ने कश्मीर में जो किया वो एक शानदार राजनीतिक प्रयोग है. इतिहास प्रधानमंत्री मोदी को इसके लिए अच्छी जगह देगा. हां उसके लिए बीजेपी ने अपने राजनीतिक सिद्धांतों को कुछ समय के लिए छोड़ा, उसे लेकर सवाल होते रहेंगे. अफजल गुरु अगर जेएनयू में आतंकवादी है तो श्रीनगर में क्या है? इन सब जटिल मसलों को हम हां या की शक्ल में बहस करेंगे तो तर्कशील समाज नहीं रह जायेंगे. एक भीड़ बनकर रह जायेंगे. यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है. बहरहाल अब जब चैनलों की दुनिया में सब नियम धराशायी हो गये हैं. पहले हमें सिखाया गया था कि जो भड़काने की बात करे, उकसाने की बात करे, सामाजिक द्वेष की बात करे, उसका बयान दिखाना है छापना है. अब क्या करेंगे जब एंकर ही इस तरह की बात कर रहे हैं? प्रवक्ताओं को कुछ भी बोलने की छूट दे रहे हैं? कन्हैया के भाषण के वीडियो को चैनलों ने खतरनाक तरीके से चलाया. बिना जांच किये कि कौनसा वीडियो सही है, उसे चलाया गया.

अब टीवी टुडे और एबीपी चैनल ने बताया है कि वीडियो फर्जी है. कुछ वीडियो में कांटछांट है तो किसी में ऊपर से नारों को थोपा गया है. अगर वीडियो में इतना अंतर है तो यह जांच का विषय है. इसके पहले तक कैसे हम सबको नतीज़े पर पहुंचने के लिए मज़बूर किया गया. गलीगली में जेएनयू के विरोध में नारे लगाये गये. छात्रों को आतंकवादी और देशद्रोही कहा गया. क्या अब कोई चैनल उन वीडियो की जवाबदेही लेगा. किसी में कन्हैया गरीबों से, सामंतवाद से आज़ादी की बात कर रहा है तो किसी ने यह काटकर दिखाया कि वो सिर्फ आज़ादी की बात कर रहा है. हमारे सहयोगी मनीष आज कन्हैया के घर गये थे. इतना गरीब परिवार है कि उनके पास पत्रकारों को चाय पिलाने की हैसियत नहीं है. उन्हें मुश्किल में देख मनीष कुमार वापस चले गये. इस गरीबी को झेलने वाला कोई छात्र नेता अगर गरीबी से आज़ादी की बात नहीं करेगा तो क्या उद्योगपतियों की गोद में बैठे हमारे राजनेता करेंगे? कन्हैया कुमार की तस्वीरों को बदलबदलकर चलाया गया ताकि लोग उसे एक आतंकवादी और गद्दार के रूप में देख सकें. सोशल मीडिया पर कौन लोग समूह बनाकर इसे हवा दे रहे थे. कौन लोग सबूत और गवाही से पहले उमर खालिद को आतंकवादी गद्दार बताने लगे. उसे भी भागना नहीं चाहिए था. सामने आकर बताना चाहिए था कि उसने क्या भाषण दिया और क्यों दिया. कन्हैया और खालिद में यही अंतर है. पर शायद जिस तरह से भीड़ कन्हैया के प्रति उदार है, खालिद को यह छूट नहीं मिलती. फिर भी अगर खालिद ने ऐसा कुछ कहा तो उसे सामना करना चाहिए था. हालत यह है कि खालिद को आतंकवादी बताने के पोस्टर जगह जगह लगा दिये गये हैं. अब अगर उसका वीडियो फर्जी निकल गया तो क्या होगा. क्या वीडियो के सत्यापन का इंतज़ार नहीं किया जाना चाहिए?

हम आज आपको तरह तरह की आवाज़ सुनायेंगे. पहले हम आपको अलग-अलग चैनलों के स्टूडियो में जो बातें कही गयीं वो सुनाना चाहते हैं. पत्रकार तो पत्रकार, प्रवक्ताओं ने जिस तरह एंकरों पर धावा बोला है वो भी कम भयानक नहीं है. कहीं पत्रकार धावा बोल रहे थे, कहीं प्रवक्ता. लेकिन पत्रकारों ने देशभक्ति के नाम पर गद्दारों की जो परिभाषा तय की है वो बेहद खतरनाक है.

मई 2016

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