केवल डाक्टर

♦    अयोध्याप्रसाद गोयलीय        

      चालीस वर्ष पूर्व एक युवक कालेज से डाक्टरी का डिग्री लेने के बाद रायबहादुर मथुरादास पाहुवा के पास उनका आशीर्वाद लेने पहुंचा, तो लाखों मनुष्यों को नेत्र-ज्योति का दान देने वाले उस सुविख्यात नेत्र-चिकित्सा-विशेषज्ञ ने ममता-भरे शब्दो में पूछा था- ‘कहो, साहबजादे! डाक्टरी से तुम क्या चाहते हो? धन-दौलत या यश और दुआएं?’

     युवक नम्रतापूर्वक बोला- ‘मुझे धन की चाहत नहीं. मैं दिल्ली की गली-गली और कूचे-कूचे में अपना नाम चाहता हूं.’

     डाक्टर पाहुवा ने युवक की पीठ थप-थपाते हुए फर्माया- ‘शाबास बेटे! मगर यश और दुआ के लिए तुम्हें बहुत धैर्य और संयम की कसौटी पर खरा उतरना होगा. ऐसा भी होगा कि घर में जिस रोज भुनी भांग भी न होगी, उसी रोज नाजायज काम करने के लिए धन का प्रलोभन दिया जायेगा. उस प्रलोभन को ठुकराकर घर में भूखे पेट सो सके, तो तुम इस पेशे में अवश्य नाम कमाओगे. लेकिन मेरे बच्चे! मेरी एक बात गांठ बांध लो कि अपने किसी भी शत्रु से इस पेशे का लाभ उठाकर प्रतिशोध लेने का प्रयास न करना.’

     युवक ने बात को कुछ और स्पष्ट करने की सविनय प्रार्थना की.

     ‘साहबजादे! हर आदमी के शत्रु-मित्र होते हैं, किंतु डाक्टर को अपने शत्रु से भी मित्रता का ही व्यवहार करना चाहिए. मैं अपने ही जीवन की एक घटना सुनाता हूं. बहुत दिनों की बात है- मैं फर्स्ट क्लास में रेलयात्रा कर रहा था और मेरे मुलाजिम के पास थर्ड क्लास का टिकिट था. संयोग की बात, जब टी.टी.आई. टिकिट चेक करने आया, तब मेरा मुलाजिम भी मेरे पास मौजूद था. मैंने बताया कि ट्रेन छूट जाने से यह अपने डिब्बे में वापस नहीं जा सका, अगले स्टेशन पर उतर जायेगा. इस पर टी.टी.आई. चुपचाप दूसरे डिब्बे में चला गया. किंतु कुछ समय के बाद वही टी.टी.आई. जब दुबारा मेरे डिब्बे से गुजरा, तो इत्तफाक से मुलाजिम किसी काम से फिर मेरे पास आया था. टी.टी. आई. यह देखकर आपे से बाहर हो गया. मेरे समझाने-बुझाने पर भी वह नहीं माना और मुलाजिम का फर्स्ट क्लास का किराया लेकर ही टला. क्रोध तो मुझे बहुत आया, किंतु कानून के आगे लाचार था.’

     ‘चार-पांच वर्ष बाद एक दिन अपनी क्लिनिक में रोगियों की पंक्ति में उसी टी.टी.आई. को देखा, तो मुझे वह घटना याद हो आयी और मेरा चेहरा खुशी से चमक उठा. मैंने अपने मन-ही-मन में कहा कि बदला लेने का बहुत अच्छा अवसर है.’

     ‘लेकिन मेरे बच्चे, जब मैं उसकी आंखें फोड़ने के लिए आपरेशन थियेटर में घुसा, तो मेरा रोम-रोम कांप उठा. मैं पसीने से तर-बतर हो गया था. मेरे हाथों में औजार उठाने की ताकत नहीं रही. कोई मेरे कान में कह रहा था- तू इस वक्त मथुरादास नहीं, केवल डाक्टर है, मेज पर पड़ा आदमी टी.टी.आई. नहीं, केवल रोगी है. उसने अपनी ड्यूटी पर अपने कर्तव्य का पालन  किया! तू अपना कर्तव्य पालन कर.’

     ‘नेत्र-ज्योति मिलने पर वह देखता ही रह गया. फिर रुंधे हुए कंठ से बोला- डाक्टर, तुम इन्सान भी हो और फरिश्ता भी!’

     युवक विदा होते समय विनम्रता से बोला- ‘बुजुर्गवार! आपकी इस नसीहत की मैं धरोहर की तरह रक्षा करूंगा.’

     वही युवक आज डाक्टर के.एल. जैन बालरोग-विशेषज्ञ के नाते दिल्ली में ख्याति और दुआएं अर्जित कर रहा है.

(अप्रैल 1971)

 

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