काली कार के गोरे लोग

♦  चंद्रकांता कक्कड़    

     कुछ एक बादल आकाश पर मंडरा रहे थे. सारी धरती बेखबर नींद में मस्त थी. क्षण-भर में ही इंद्रदूतों के नाद और हल्की फुहार ने गहन अंधकार को बिजली के प्रचंड प्रकाश से भर दिया. लोग सोते से उठ खड़े हुए, घरों की बत्तियां जल उठीं. बच्चे, बड़े-बूढ़े, सभी गुदड़ियां हाथों में लिये मलते भीतर भागे और फिर नींद की गोद में समा गये और बत्तियां बुझ गयीं. केवल मूसलाधार वर्षा का स्वर कानों में गूंजता रहा.

    मैं उठकर खिड़की में चली आयी. आड़ी-तिरछी रेखाओं के उस पार केवल गहरा अंधकार था. यही कोई साढ़े तीन बजे होंगे. सामने दृष्टि जाते ही मैं उस पार की खिड़कियों को देखने लगी. ट्यूब लाइट की जगमगाहट ने मेरा ध्यान केंद्रित कर लिया. रेखा के कमरे की बत्ती जल रही है. रेखा और उदय! जाने क्यों हल्का रोमांच हो आया. पूरे घर में वे दो ही हैं. अभी परसों ही लौटे हैं. परसों रात को इसी तरह ट्यूब लाइट की रोशनी से अनुमान हुआ कि रेखा आ गयी है. मैंने निश्चय किया कि रेखा से कल दोपहर तक मिलूंगी. बहुत दिनों का विछोह मुझे किसी प्रेमी-प्रेमिका-सा सिहरा गया. सहेली है न! और मैं हंसी. अजीब है यह रेखा भी. एक पहेली- अनबूझ!

    लो भई, काली कार गोरे लोग आ गये हैं. मैं लगभग खिलखिला पड़ी. इतने दिन यह काली कार ही नहीं दिखी. वरना आज से एक मास पहले हर संध्या को सैर के समय यह कमबख्त हर मोड़ पर भोंपू बजाती चौंका देती थी! फिरकनी है, फिरनकनी!

    उस दिन मैं पटरी वाले से चप्पल खरीद रही थी, सहसा वही काली कार मेरे पास से होकर फर्राटे से निकल गयी. मैं धक-से रह गयी. उन लोगों ने जरूर देखा होगा कि बाटा की दुकान छोड़कर यहां पटरी वाले से मोल-भाव हो रहा है. इसमें झेंपने वाली कौन-सी बात है मैंने मन को समझाया. और एक दिन मैं चौराहा पार कर रही थी, तभी सहसा पों।़।़।़।़ ध्वनि से चौंकर गर्दन मोड़ी, तो वही काली कार की खिड़की से झांकती दो जोड़ी आंखे! एक जोड़ी आंखों ने दोनों हाथ जोड़े और दांत दिखा दिये. प्रत्युत्तर में मैं भी वहीं किया. कभी-कभी नहीं, अक्सर ही इस काली कार का चालक उदय दिखाई पड़ जाता है उसकी बिल्ली की-सी आंखे मुस्कराकर सामने उठ जाती हैं और मैं चौंक जाती हूं. क्या खूब सोच-समझकर गाड़ी खरीदी रेखा ने , भई मान गये- गोरे गाल पर जैसे कोई डिठौना!

    कल शॉपिंग से लौटते समय रेखा के बगल वाली उषा बलात मुझे खींच गयी- ‘अरे आओ भी. जब देखों, तब वही नखरे. आज यों सहज में नहीं छोडूंगी.’ गैलरी पार करते दिल धक-से रह गया. उदय! वही कंजी आंखें. सिमटी-सी, अपने आप में लजायी अर्द्धमीलित-सी. रोयेंदार छाती को ढांपतीं झुकी पलकें और वह जल्दी से भीतर हो लिया. जान गयी थी मैं . उदय यों नंगे बदन की हालत में हतप्रभ हो गया था.

    मैं रेखा के विषय में सोच रही थी, होगी कहीं अंदर. अजीब है यह रेखा भी, मिलना-जुलना और जज्ब होना हो जानती ही नहीं. उषा ने मौन तोड़ा, तो मेरी चेतना लौटी- ‘अरे तुम क्या जानती हो, मुझसे पूछो मुझसे, जो यहां चौबीस घंटे रहती हूं.’ ‘तो क्या रेखा …?’ मैं प्रश्नसूचक निगाहों से उसे देखा. ‘रेखा तो लगता है, यहां रहती ही नहीं.’ उषा ने उपालम्भ के स्वर में कहा- ‘हां भई, कार वाले लोग हैं.’ मैं हंस पड़ी.

    उषा की आया से मैं बोली- ‘अरे जरा रेखाजी को बुला लाओ. कहना मैं आयी हूं.’ और मैंने देखा, रेखा चली आ रही है. लगा, मेरी सूचना उसे उदय ने दे दी होगी. जी हुआ कि रेखा को बांहों में भींच लूं. लाख हो, पर है तो मेरी सहेली न, गले से लिपट जाऊं. आह रेखा, कितने दिनों में मिली हो. दुष्टा, कहकर भी नहीं गयी और लौटने पर भी सूचना नहीं दी. लेकिन ऐसा कुछ न कर सकी. जी की कसक जी में ही रह गयी. केवल औपचारिकतावश हाथों का जवाब हाथ जोड़कर देना पड़ा. भाड़ में जायें ये सब मैनर्स. हर समय सभ्यता का नकाब. कहीं-कहीं तो कैसा बेजा लगता है, खासकर सखियों में. पर एक पहेली-सी यह रेखा. मैं सोचती रह गयी, आकिर क्यों यह घुल-मिल नहीं पाती?

    रेखा के मस्तक पर थकान की रेखा मैं स्पष्ट पढ़ गयी. पूछा- ‘कब लौटी हो?’ संक्षिप्त-सा उत्तर मिला- ‘परसों ही तो.’ दो-एक बातों के अतिरिक्त मैं कुछ कह न पायी. उषा के घर कुछ अधिक बात करना उचित न लगा. विदा लेते वक्त मैंने कहा- ‘रेखा, घर पर आओगी न?’ रेखा ने सिर हिलाकर स्वीकृति दी.

    न जाने क्यों, मैं रेखा से मिले बिना रह नहीं सकती. जहां आठ दिन गये कि मुझे लगता है, हम सदियों से नहीं मिले. यह नहीं कि मैं उसके रूप पर मुग्ध हूं. वैसे देखा जाये तो रेखा गजब की सुंदर है- उसकी बड़ी-बड़ी सपनीली आंखे, मादक ओंठ और छरहरा लंबा बदन, किसी भी रफ्तार में ब्रेक लगा सकते हैं.

    रेखा में आत्मसम्मान कूट-कूटकर भरा है. इधर मैं इंतज़ार में पगलाये जा रही हूं, पर वह दुष्टा आयी ही नहीं. हो सकता है, उसने कुछ बुरा माना हो? यही कि उषा के यहां आने पर भी उसके यहां मैं क्यों नहीं गयी? सच में मुझे जाना चाहिए था उसके यहां भी. कुछ विचारकर मैंने रामू को भेजा, रेखा को बुलाने. पर वह पल्ला झाड़ते हुए लौट आया. बोला- ‘मेम साहब की तबीयत ठीक नहीं है. लेटी हैं और कोई किताब पढ़ रही हैं.’

    ‘अरे, कुछ बकता भी है कि रेखा ने कहलवाया क्या है?’ बेचारे रामू पर ही मैं अकारण बरस पड़ी.

    ‘बीबीजी, मेम साब कहती है, अगर तबीयत दुरुस्त हो गयी, तो वे कल आयेंगी.’

    बड़ा गुस्सा आया रेखा पर. पता नहीं क्या समझती है अपने को. माना कि पति इंजीनियर है, घर में कार है, दोनों काफी सुंदर भी हैं. होगी अपने घर में, मुझे क्या? मेरे अंतर में कशमकश होने लगी. पर दिल के दूसरे कोने में रेखा के प्रति न जाने कहां से प्यार का सोता उमड़ आया. पता नहीं, रेखा हर समय घुटी-घुटी और अपने में कैद क्यों रहती है! खोयी-खोयी भी. लगता है पीड़ा, कसक और वेदना को वह पी रही है. कुछ है जरूर, जो उसे सालता रहता है. कभी भी तो कुछ नहीं कह सकी वह मुझसे. वह आती है, तो केवल मेरे यहां ही. कहती थी, देखो न, एक तुम ही मेरी सखी हो, और कहीं तो मैं जाती ही नहीं.

    बड़ा आश्चर्य है कि रेखा अपने पति का प्रसंग कभी नहीं छेड़ती, कभी कोई बात शुरू हो जाये, तो उसे कुनैन की गोली की तरह निगल जाती है. मुझे लगता है, कहीं कोई बड़ा घाव है, जो उसके हृदय में रिस रहा है और जबरन पीड़ा में भी वह मुस्कराने की चेष्टा कर रही है.

    उस दिन किसी मैगजीन में खोयी हुई थी कि रेखा के धीमे-स्वर से चौंकी. उसके अभिवादन का उत्तर दिया. चाहकर भी उससे खुल न पायी. उसका स्वभाव ही ऐसा है, हर समय घुटी-घुटी रहती है.

    मैंने कहा- ‘रेखा, तुम क्यों इस कदर निर्जीव बनी रहती हो? निपट एकांत और एकाकीपन की घड़ियां क्या तुम्हें बोर नहीं करतीं? तुम्हारा सारा दिन बीतता कैसे है रेखा, जबकि इजीनियर साहब महीने में पचीस दिन बाहर रहते हैं?’ वह जैसे अपने आंतरिक संघर्ष से जूझ रही थी. मैंने जारी रखा- ‘मेहमान अब के कितने दिन रहे?’ पाषाण-शिला में जैसे प्राणों का संचार हुआ. रेखा ऐसे सम्भली, मानो वर्षा अभी थमी हो और उसका असर शेष हो. ऐसी तरलता उसकी बुझी-बुझी आंखों के कोरों में स्पष्ट झलक रही थी. बोली- ‘हां वे अबकी बार जल्दी लौटने को कह गये हैं.’

    ‘सचमुच रेखा, भला तुम्हारा समय कैसे कटता होगा?’

    कुछ क्षण वह मुझे निरीह आंखों से देखने के बाद बोली- ‘तभी तो इतने सारे शौक पाल रखे हैं. यह लिखना, वह पेंटिंग और खरगोश के बच्चे.’ इसकी लिखने-लिखाने की सनक तो मैं भी जानती हूं. मैंने माथे पर हाथ मारा. अगर बताने से शान में बट्टा लगता है, तो भुगतें रानीजी, मुझे क्या? मैं खीझ उठी. इसका तो न आना ही भला. जब देखो चेहरा लटका ही रहता है. आती है तो वातावरण उलटे बोझिल हो जाता है. और मैं चाय लाने चली गयी.

    लौटकर देखती हूं, रेखा पर्स में कुछ टटोल रही है. होगा कुछ. और नहीं तो चाबी का गुच्छा ही ढूंढ़ रही होगी. पर सहसा रेखा ने एक पाकेट डायरी मेरी ओर बढ़ा दी- ‘लो रीना इसे देखो.’ उसकी आंखों में तरलता थी.

    सोचा कोई कहनी का प्लाट-वाट-होगा और क्या? मैंने कहा- ‘रेखाजी, पहले चाय हो जाये, तब कुछ.’ और मैंने डायरी को मेज पर पटक दिया.

    तभी एक युवती का रंगीन चित्र डायरी से निकलकर ट्रे में गिर पड़ा. चित्र के नीचे बायीं ओर लिखा था ‘उदय’. ऐं, यह क्या? चाय की केटली की पकड़ मेरे हाथों से छूटने को हुई. आंखें फटी-फटी रह गयीं. बदन का खून जैसे जमकर बर्फ हो गया. काठ-सा निर्जीव शरीर लिये मैं निढाल-सी सोफे पर गिरी, फक् चेहरा रेखा पर जा टिका. हैरत हुई कि रेखा सिसक रही है.

    आश्चर्य की खाई में मैं डूबी चली जा रही थी. लगा, कहीं धरती में धंस रही हूं. आंखों के आगे घना कुहरा बढ़ रह था और प्याले में छलकी चाय की भाप एक जाले-सी तन गयी. न जाने कहां एक प्रकाश की किरण दिल के कोने में भर उठी-काली कार के ये गोरे लोग… रेखा…उदय… कंजी आंखें… शिष्टता से मुस्कराती आंखें… बस और कुछ भी तो नहीं? फिर तुम्हारी गलती है, यह चित्र मेरा तो नहीं? पर आंखों को धोखा कैसे हो सकता है? है तो यह चित्र मेरा ही… यह कहां से आया? मुझे लगा कि सारा आलम घूम रहा है और मैं उसकी आड़ी-तिरछी रेखाओं में चक्कर खा रही हूं. ‘रेखा… यह सब झूठ है, ऐसा कभी हो नहीं सकता है. तुम तो जानती हो रेखा मैं कितनी संकोची हूं. ठीक है तुम्हारे यहां आती हूं, लेकिन हमेशा उस समय जब तुम होती हो, केवल तुम. ओ रेखा…’

    मेरी यह प्रतिक्रिया देख वह वास्तव में घबरा उठी. बोली- ‘देखो रीना, और कुछ नहीं, इसे मेरे उदय ने बनाया है. लेकिन कई दिन से उसके पास इसे देखकर मुझे यही लगा कि उदय इस चित्र से बेहद लगाव रखता है. बस और कुछ बात न थी. तुम तो यों ही विपरीत भावनाओं में बह गयीं.’ रेखा ने अपनी पीड़ा छिपाते हुए कहा.

    लेकिन इससे मैं सहज में उबर न सकी. हृदय के प्रश्नों की कतार को एक कुशल निरीक्षक-सी निहारती रही. तो क्या रेखा की इस गहन उदासी, खोयेपन, ओर बुझी ज़िंदगी का कारण मैं ही हूं? हृदय प्रतिवाद कर उठा… नहीं… मैं नहीं जानती यह उदय का बच्चा कौन है. और यह रेखा… भाड़ में जाये. और फिर मैंने रेखा से कभी न मिलने की कसम खा ली.

(मई  1971)

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