कहानी पर कर्ज़  –   अक्षय जैन

व्यंग्य

उस दिन रास्ते में नटवरलाल मिल गये, चेहरे पर सदाबहार रौनक थी. किसी भी सिरे से लगता ही नहीं था कि यह आदमी कभी बूढ़ा भी होगा. बड़े अदब के साथ उन्होंने झुक कर मुझे नमस्कार किया.

मैंने कहा- ‘यार मेरे लिए तुम्हें इतना ज़्यादा झुकने की ज़रूरत नहीं है.’

नटवरलाल बोले- ‘भाई साहब! दुनिया को वही फतह कर सकता है जो झुकना जानता हो. सही वक्त पर सही जगह झुकना जानता हो. झुकने में मज़े ही मज़े हैं. बिना कुछ किये सामने वाला आपका मुरीद बन जाता है. आपके सामने झुकने की एक खास वजह है. मुझे आपकी मदद चाहिए. दरअसल आप यकीन नहीं करेंगे, मैं कई दिनों से आपको ढूंढ़ रहा हूं.’

‘मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूं कि तुम मुझे किसी काबिल तो समझते हो.’ मैंने कहा- ‘वर्ना इस दुनिया में एक लेखक की हैसियत ही क्या है? न घर में उसे कोई पूछता है और न ही दफ्तर में कोई भाव देता है.’

नटवरलाल बोले- ‘नहीं, नहीं, भाई साहब, अब पहले जैसी बात नहीं रही. लोगों को धीरे-धीरे लेखकों की मार्केट वैल्यू समझ में आ रही है. ‘देवदास’ फिल्म पर पचास करोड़ रुपये खर्च किये गये. शरतचंद्र चट्टोपाध्याय जैसा लेखक नहीं होता, तो ऐसी भव्य फिल्म का निर्माण कभी हो पाता?’

मैंने कहा- ‘मियां. तुम इन फिल्म वालों को नहीं जानते हो. फिल्म फ्लॉप हो गयी तो सारा दोष लेखक पर मढ़ देंगे. ऊपर से यह घोषित कर देंगे कि आइंदा वे किसी लेखक की कहानी पर कोई फिल्म नहीं बनायेंगे. यह कहने से भी नहीं चूकेंगे कि अब तक बिना कहानी के फिल्म बनाते आये हैं, आगे भी बनाते रहेंगे. यह बताओ, तुम मुझे ढूंढ़ किसलिए रहे थे? आजकल ढेर सारी अमेरिकी कम्पनियां दिवालिया हो रही हैं. कहीं तुम्हारा माइक्रोसॉफ्ट खरीदने का प्लॉन तो नहीं है?’

नटवर बोले- ‘भाई साहब! नटवरलाल ने न तो आज तक कभी कोई रिस्क वाला काम किया है और न कभी करेगा. नटवरलाल उसी काम में हाथ डालता है, जो 100 प्रतिशत फूल प्रूफ हो. स़िर्फ कुछ कागज़ात पर आपको दस्तखत करने हैं और आपके पास इतना पैसा हो जायेगा कि उससे आप एक बैंक खरीद सकेंगे.

मैंने कहा- ‘भाई मेरे अपनी ज़िंदगी भर की कमाई से मैं खुद का घर नहीं बनवा पाया, बैंक कैसे खरीद पाऊंगा? नटवर देखो, तुम्हारे कारनामे दुनिया भर में मशहूर हैं. तुम जीते जी एक किंवदंती बन गये हो. उम्र में बड़े होने का तकाजा देकर, चाय भी हमेशा मैंने अपने जेब से पैसा खर्च कर तुम्हें पिलायी है. तुम मुझे फंसाने का कोई काम नहीं करोगे.’

नटवर बोले- ‘भाई साहब, आपने ऐसा सोच भी कैसे लिया कि मैं आपको फंसाने का काम करूंगा? आप इस लायक होते तो अब तक आपको कोई न कोई फांस चुका होता. आपकी छवि एक ईमानदार और देशभक्त लेखक की है. आप पर एक खरोंच तक नहीं आयेगी.’

मैंने कहा- ‘स़ाफ-स़ाफ बताओ, मुझे क्या करना होगा?’

नटवर बोले- ‘मैं एक बैंक से सौ करोड़ रुपये का कर्ज लेने जा रहा हूं. मैंने सारी गोटियां फिट कर ली हैं. बैंक वाले चाहते हैं कि कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति गारंटी दे. आपको तो स़िर्फ दस्तखत करना है और बदले में पांच करोड़ रुपये हासिल करने हैं.’

मैंने कहा- ‘नटवर तुम क्या समझते हो, मैं तुम्हारी चाल में आ जाऊंगा? तुमने बैंक का कर्ज वापस नहीं किया तो बैंक वाले मुझे पकड़ेंगे. मेरी इज़्ज़त जायेगी, तुम्हारा क्या बिगड़ेगा?’ नटवर बोले- ‘भाई साहब. ताव में मत आइए. मेरी योजना पर इत्मीनान से विचार कीजिए. आप पढ़ने-लिखने वाले जीव हैं. इतिहास, संस्कृति और इक्कीसवीं सदी के मनुष्य के जटिलतम अंतर्विरोधों को समझने का माद्दा रखते हैं. क्या आप इतनी छोटी बात भी नहीं समझना चाहते हैं कि गारंटी देने से आपका कोई नुकसान नहीं होगा?

मैंने कहा- ‘कैसे? कैसे नहीं होगा?’

नटवर बोल- ‘जिन लोगों ने गारंटी दी है, उनकी बात छोड़िए. जिन लोगों ने कर्ज लिया है, उनका आज तक कुछ नहीं बिगड़ा. इस देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों और नामी-गिरामी लोगों ने बैंकों से कई लाख करोड़ रुपये का कर्ज लिया है, जिसे वे वापस नहीं कर रहे हैं. क्या हुई एक को भी फांसी?’

मैंने कहा- ‘लेकिन बैंक वाले कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं.’

नटवर बोले- ‘भाई जी. जिसके पास खोने को कुछ नहीं हो, वो किसी से क्यों डरे? आपके पास है क्या, जो बैंक वाले आपसे छीन कर ले जाएंगे? आपका मकान तक किराये का है.’

मैंने कहा- ‘लेकिन भाई, इज़्ज़त खत्म हो जायेगी.’

नटवर बोले- ‘भाई जी! अभी आपने ही कहा कि इस दुनिया में एक लेखक की हैसियत ही क्या है? न घर वाले इज़्ज़त करते हैं और न बाहर वाले करते हैं. जो चीज़ आपके पास है ही नहीं, उसके चले जाने का सियापा कर रहे हैं. पांच करोड़ हाथ में आयेंगे तो आपकी ज़िंदगी का नज़रिया ही बदल जायेगा.’

मैंने कहा- ‘सो तो ठीक है. लेकिन तुमने अपनी योजना के बारे में कुछ भी नहीं बताया. तुम बैंक से सौ करोड़ रुपये का कर्ज़ लेकर उसका करोंगे क्या?’

नटवर बोले- ‘भाई साहब, यही सवाल आप मुझसे पहले कर लेते, तो आपके मन में कोई दुविधा नहीं होती. मैं इतिहास बनाना चाहता हूं. मैं सबसे बड़े बजट की फिल्म बनाना चाहता हूं. फिल्म का बजट होगा- 100 करोड़. 95 करोड़ मैं लगाऊंगा और पांच करोड़ आप देंगे. और हां, कहानी आपकी होगी.’ 

अप्रैल 2016

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