एक सपने के सौ साल (सम्पादकीय) मार्च 2016

सौ साल पहले एक यज्ञ शुरू हुआ था- एक सपने को पूरा करने के लिए. सपना, अपने देश को अपनी शिक्षा देने का; यज्ञ भारतीय अस्मिता की पहचान को सुरक्षित रखने के लिए. यह सपना महामना मदनमोहन मालवीय का था जो आज बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के रूप में हमारे सामने है. इस सपने को पूरा करने की प्रेरणा उन्हें नालंदा और तक्षशिला जैसे शिक्षा केंद्रों से मिली थी, जहां शिक्षा भी दी जाती थी और चरित्र-निर्माण भी होता था. यही चरित्र-निर्माण मालवीयजी का एक सपना था. वे कहते थे, ‘चरित्र मानव-स्वभाव का सर्वश्रेष्ठ रुप है. किसी भी देश की ताकत, उद्योग और सभ्यता… सब व्यक्तिगत चरित्र पर निर्भर करते हैं… प्रकृति के न्यायपूर्ण संतुलन में व्यक्तियों, राष्ट्रों और जातियों को उतना ही aिमलता है जितने के वे योग्य होते हैं.’ मालवीयजी देश की युवा पीढ़ी को उस योग्य बनाना चाहते थे कि उसे अधिकतम मिल सके. यह सही है कि तब उनकी कल्पना में राष्ट्र के हिंदुओं को प्राथमिकता देने की बात भी थी, पर सही यह भी है कि कल्पना जब साकार हुई तो उसमें विश्वविद्यालय के नाम के साथ ‘हिंदू’ एक शब्द मात्र बन कर रह गया था- मूल उद्देश्य देश को शिक्षित और चरित्रवान बनाना ही था. एक भारतीय शिक्षा के केंद्र के रूप में इस विश्वविद्यालय ने करवट ली थी, जिसके प्रति पूरे भारत की संवेदना  थी. भारतीय संस्कृति की समावेशी दृष्टि के एक उदाहरण के रूप में यह संस्था विकसित होने लगी. आज जब हम सभ्यता, संस्कृति और मूल्यों के टकराव को देख रहे हैं, तो ज़रूरी हो जाता है यह समझना कि सौ साल पहले अस्तित्व में आये इस तरह के विश्वविद्यालय का क्या महत्त्व है. मैकाले की शिक्षा नीति के माध्यम से अंग्रेज़ों ने इस देश के भविष्य को अपने चंगुल में रखने का एक षड्यंत्र रचा था. आज वह भविष्य हमारा वर्तमान बना हुआ है. अब हम गुलाम नहीं हैं, पर हमारे सोच और संस्कारों पर एक विदेशी संस्कृति किस तरह हावी होती जा रही है, यह हम देख रहे हैं. मालवीयजी ने इस खतरे को सौ साल पहले भांपा था. यह विश्वविद्यालय उनकी सजगता, जागरूकता और दूरदृष्टि के उदाहरण के रूप में हमारे सामने है.

देश-विदेश के हज़ारों छात्र यहां शिक्षा प्राप्त करते हैं. सवाल उठता है, हमारे देश की उच्च शिक्षा की वर्तमान स्थिति में यह सौ साल पुराना संस्थान क्या कोई सकारात्मक योगदान कर पा रहा है? यह सही है कि पिछले सात दशकों में देश में उच्च शिक्षा का विकास लगातार हुआ है. पर इस विकास का स्वरूप क्या है? एक सर्वेक्षण के अनुसार आज देश में आधे से अधिक इंजीनियर नौकरियों के योग्य नहीं हैं; विश्व में शैक्षणिक संस्थानों की गुणवत्ता-सूची में भारत का नाम हम खोजते ही रह जाते हैं. हमारे शिक्षा-संस्थानों पर डिग्रियां बांटने-बेचने के आरोप लगते हैं. शर्म तब आती है जब हम इनका खण्डन भी नहीं कर पाते. विज्ञान के क्षेत्र में, आई.टी. के क्षेत्र में हमारे छात्र ज़रूर नाम करा रहे हैं, पर इसके लिए हमारी शिक्षा-व्यवस्था के बजाय श्रेय छात्रों को ही दिया जाना चाहिए. अभी तक शिक्षित भारत की हमारी परिकल्पना ही स्पष्ट नहीं हो पायी. जिन हाथों में शिक्षा की बागडोर है, वे शिक्षण-संस्थानों में ‘अपने लोगों’ को बिठाने में ही लगे हुए हैं.

यह सारी स्थिति निराश भी करती है और चिंतित भी. मालवीयजी के सपने के सौ साल के बहाने हमारे शिक्षा-संस्थानों और शिक्षा-व्यवस्था को आंकने की एक कोशिश है इस अंक की आवरण-कथा. निराशा और चिंता से उबरने के लिए स्थिति की वास्तविकता से साक्षात्कार ज़रूरी है.

मार्च 2016

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