एक अनसुलझा रहस्य

♦  एरिक फ्रैंक रसेल     

      28 मई 1828 को सोमवार था. राष्ट्रीय त्योहार होने के कारण न्यूरेम्बर्ग शहर के तीन चौथाई लोग सैर करने निकल गये थे. दुकानें बंद थीं, सवारियों का आना-जाना बंद-सा था और राहगीर भी इक्के-दुक्के ही दिखाई पड़ते थे. किसी को गुमान भी न था कि आज के दिन एक ऐसी घटना घटेगी, जो सम्पूर्ण जर्मनी के लिए वर्षों तक विवादपूर्ण रहस्य बनी रहेगी, अन्य देशों में भी उत्सुकता पैदा करेगी और हमेशा के लिए अनसुलझी रह जायेगी.

    उस दिन एक मोची ने सैर-सपाटा करने की ठानी. सोचा था घूमना भी हो जायेगा और अगर कोई दोस्त मिल जाये, तो गपशप भी हो जायेगी. बढ़िया वस्त्र पहनकर घर में ताला लगाकर वह निकल पड़ा. उस समय उसे कहां पता था कि वह एक रहस्यकथा का पात्र बन जायेगा.

    हुआ यों कि मोची की नजर सोलह वर्ष के एक किशोर पर पड़ी, जो एक दीवार से टिककर बीमार बिल्ली की तरह रो रहा था. सुनहरे बाल, भूरी आंखें और बंदर की तरह आगे निकली हड्डी. उसके तन पर तार-तार हुई घुड़सवारी की पोशाक थी, पैरों में फटे जूते थे. एक हाथ दीवार पर टिकाये और उस पर सिर रखे वह गला फाड़कर रो रहा था.

    मोची उसके पास गया और पूछा- ‘भाई इस तरह क्यों रोते हो?’ जवाब में उसने और जोर से रोना शुरू किया और मोची की तरफ एक पत्र बढ़ा दिया. पत्र घुड़सवार-दस्ते के कमांडिंग अफसर के नाम था. मोची ने उसे अपने साथ आने का इशारा किया और चढ़ चला उस अफसर के मकान की ओर. किशोर डगमगाता, उलटे सीधे डग भरता उसके पीछे चला.

    कैप्टन घर पर नहीं था, लेकिन जल्द ही लौटने वाला था. उसके नौकर ने लड़के को घर पर ही ठहरा लिया और भोजन में तरह-तरह की चीजें परोसी. मगर लड़के ने सिर्फ डबलरोटी खायी, थोड़ा ठंडा पानी पिया- बीयर, मांस और अन्य चीजों की ओर देखा भी नहीं. फिर वह घास के गद्दे पर सो गया.

    कैप्टन ने घर लौटने पर उसे सोते देखा और पत्र खोलकर पढ़ा. पत्र की लिखावट जानबूझकर बिगाड़ी गयी थी. लिखा था- ‘भगवान ने दस बच्चे देकर मुझे मुसीबत में डाल दिया है, पत्रवाहक एक नमूना है, जो 16 बरस तक बिना कुछ देखे-सुने, बिना कुछ जाने-समझे घर में पड़ा रहा. वह निपट अज्ञानी है और मुझे विश्वास है कि वह घुड़सवार दस्ते के सर्वथा उपयुक्त होगा.’

    साथ ही एक और पत्र था- उसकी मां की तरफ से लिखा गया. हालांकि लिखावट बिलकुल एक थी. इस पत्र के अनुसार उस किशोर की जन्मतिथि थी- 30 अप्रैल 1812.

    कैप्टन झुंझला उठा और उसने किशोर को झकझोरकर उठाया. कैप्टन के सवालों के जवाब में किशोर ने केवल तीन वाक्यों का उच्चारण किया. सवाल चाहे वाक्य कुछ भी हो- जवाब बस वही. ये तीन वाक्य थे- ‘अपने पिता की तरह सैनिक बनना चाहता हूं,’ ‘नहीं जानता हूं’ और ‘घोड़े का घर.’ जैसे उसके कोश में बस इतने ही शब्द थे.

    कैप्टन ने खीझकर उसे पुलिस के हवाले कर दिया. कई सिपाहियों ने उससे अलग-अलग ढंग से सवाल किये, पर जवाब वही- ‘अपने पिता की तरह सैनिक बनना चाहता हूं,’ ‘नहीं जानता हूं’ और ‘घोड़े का घर.’

    पुलिस ने उस पर आवारागर्दी का आरोप लगाकर उसे जेल में बंद कर दिया. वहां वह सारी रात सोता रहता और सारे दिन ज़मीन पर स्थिर बैठकर शून्य में एकटक देखता रहता, बस देखता ही रहता. जेलर घबरा उठा और उसका ध्यान बंटाने के लिए उसे कागज-पेंसिल दी.

    कागज-पेंसिल मिलते ही किशोर जैसे जी उठा. बच्चे की तरह उसने लिखना शुरू किया. उसके टेढ़े-मेढ़े अक्षरों से कागज भर गया. पूरे कागज में मात्र तीन शब्द थे- ‘रीटर (सशस्त्र घुड़सवार) कास्पर हाउजर.’

    किशोर का नाम ‘कास्पर हाउजर’ है, ऐसा मान लिया गया. लेकिन इस नाम से बुलाने पर वह कोई जवाब नहीं देता था, यहां तक कि वह इस नाम से परिचित है, ऐसा भी नहीं लगता था. पुलिस को लगा कि वह शायद किसी को किसी तरह से बनाना चाहता है. इसलिए उसकी हर गतिविधि पर नजर रखी जाने लगी.

    इसी सिलसिले में पता चला कि उसे तेज रोशनी नापसंद और अंधेरा पसंद है. वह डबलरोटी चटपट खा लेता है और ठांडा पानी पीता है. और कोई भी चीज उसे बिलकुल नहीं अच्छी लगती. उसने अपने जूते निकाल फेंके थे. उसके पैर नाजुक और छोटे थे- लड़कियों की तरह. वह घंटों बिना हिले-डुले बैठा रहा. उसके पांव टेढ़े हो गये थे, जैसे कि बहुत कम चलने-फिरने वालों के पैर टेढ़े हो जाया करते हैं.

    उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे उसकी शिनाख्त हो सके. न तो उसके जूतों में ऐसा कोई निशान था और न उसके कपड़ों में. उसका जैकेट पुराने कोट में से काटकर बनाया गया था. उसका टोप कूड़ेदान में से उठाया गया लगता था. उसकी जेब में थी बालू को एक छोटी पुड़िया, एक-दो चिथड़े, कुछ धार्मिक पत्रिकाएं और एक माला.

    कास्पर हाउजर को देखने लिए न्यूरेम्ब वासियों की कतार लग गयी और वह सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया. शुरू-शुरू में लोग एकमत थे कि वह ‘महामूर्ख’ है और उसके घर वालों ने उसे घर से निकाल दिया है. लेकिन शीघ्र ही सबको पता चल गया कि वह बहुत तेजी से नये शब्द सीख रहा है, उसकी याददाश्त गजब की है, वह किसी को एक बार अगर देख ले, तो कभी भूलता नहीं.

    इन दो महीनों में कास्पर हाउजर ने चलने का अभ्यास किया, जिससे उसकी चाल में सुधार हुआ तो अवश्य, लेकिन सही और सहज ढंग से चलना उसे कभी नहीं आया. और भोला तो इतना था कि मोमबत्ती की लौ को पकड़ने जाता और फिर चीख पड़ता. आईने में अपनी ही छबि देखकर आईने के पीछे किसी और की तलाश करता. कोई भी चीज अच्छी लगने पर उसके लिए ‘घोड़ा’ शब्द का प्रयोग करता. कोई चमकती और बेकार वस्तु देखता तो उसके लिए भी ‘घोड़ा-घोड़ा’ कहा करता. उसकी यह हरकत देखकर उसे लकड़ी का एक घोड़ा दिया गया. यह खिलौना पाकर वह इतना खुश हुआ कि न्यूरेम्बर्गवासियों ने उसे उसी तरह के आधे दर्जन और घोड़े दिये.

    इस किशोर का क्या किया जाये, यह न सूझने से शहर के अधिकारियों ने उसे प्रदर्शनी की वस्तु बना दिया. उसे ‘न्यूम्बर्ग का बालक’ नाम देकर शहर के एक प्रमुख विज्ञानी एवं डाक्टर डॉमर की देख-रेख में रखा गया. लोगों की जिज्ञासा की तृप्ति के लिए यह विज्ञप्ति भी प्रकाशित की गयी-       

    ‘यह किशोर कौन है और कहां से आया है, कहा नहीं जा सकता. न्यूरेम्बर्ग आने के बाद ही इसे दुनिया देखने को मिली है. इससे पहले यह हरदम एक अंधेरी गुफा में फर्श पर घास बिछाकर बैठा रहता था. न इसने कभी कोई आवाज़ सुनी और न कोई तेज रोशनी देखी. यह गुफा में सोता, जगता और फिर सो जाता. जब यह सोकर उठता, उसके पास डबलरोटी और पानी से भरी सुराही रखी होती. कभी यह जगने पर पाता कि शरीर पर नयी कमीज है. जो आदमी गुफा में आता था, उसका चेहरा इसे कभी देखने को नहीं मिला. खेलने के लिए इसके पास लकड़ी के दो घोड़े और कुछ फीते थे.’

    ‘यह कभी बीमार नहीं पड़ा और हमेशा प्रसन्न रहता था. एक बार यह घोड़ों के साथ खेलते हुए शोर मचा रहा था. इस पर उस आदमी ने इसे डंडे से मारा था. एक दिन वह आदमी गुफा में एक मेज ले आया, जिसकी सतह सफेद थी. आदमी ने उसके हाथ में एक पेंसिल पकड़ाकर बार-बार कुछ शब्द लिखवाये. फिर तो यह स्वयं उन शब्दों को बार-बार लिखता रहा. फिर उस आदमी ने इसे खड़ा होना व चलना सिखाया और एक दिन इसे गुफा से बाहर ले आया. उसके बाद इसे इतना ही याद है कि यह न्युरेम्बर्ग में था और इसके हाथ में कागज का एक पुर्जा था.’

    इस विज्ञत्ति पर आपत्ति उठायी गयी. कास्पर हाउजर ने उस आदमी का चेहरा कभी नहीं देखा हो, यह कैसे सम्भव है? मगर इसका यह समाधान सम्भव था कि वह आदमी चेहरे पर नकाब डालकर आता हो. और इसकी पुष्टि भी आगे चलकर हुई.

    डॉ. डॉमर ने देखा कि कास्पर हाउजर का इंद्रिय बोध पशुओं की तरह असाधारण रूप से तेज है. अंधेरे में वह बिल्ली की तरह स्पष्ट देख सकता था. तेज रोशनी का अभ्यस्त हो जाने पर भी उसकी यह खूबी बरकरार रही. यह बात उसकी घ्राण-शक्ति के बारे में भी थी. अंधेरे में भी वह केवल गंध के द्वारा किसी भी पशु को ढूंढ़ सकता था और किसी आदमी को ठीक-ठीक पहचान सकता था. पत्तियों की गंध के आधार पर वह वृक्षों की पहचान कर सकता था. पकते हुए भोजन की, खासकर मांस की, महक उसे जरा भी अच्छी नहीं लगती थी.

    बच्चों की समझने लायक बातें भी कास्पर के दिमाग में बैठाने के लिए समय और धैर्य दोनों की आवश्यकता थी. जैसे कि पशुओं से मनुष्य जैसे व्यवहार की आशा नहीं रखनी चाहिए, सिर्फ डबलरोटी ही नहीं अन्य चीजें भी खायी जाती हैं.

    फिर भी कास्पर ने तरक्की की. वह लिखना-पढ़ना सीख गया, बागवानी में रस लेने लगा. लेकिन उसकी कई विचित्र आदतें गयीं नहीं. जो भी वस्तु उसे अच्छी लगती, उसे वह ‘लाल’ कहता, और जो अच्छी न लगे उसे ‘हरी’. बहुत-सी चीजें उसके ‘लाल’ और ‘हरी’ की सीमा में आ गयीं.

    फिर अचानक ही वह आत्मकथा लिखने को उत्सुक हो उठा और वह लिखने में जुट भी गया. न्यूरेम्बर्गवासी बड़ी उत्कंठा से उसकी प्रतीक्षा करते रहे.

    मगर शायद कास्पर की इस घोषणा से कोई भयभीत हो उठा था. 17 अक्टूबर को कास्पर डॉ. डॉमर के तहखाने में अचेत पाया गया. उसके कपाल पर एक बड़ा और गहरा जख्म था. कई दिन तक वह अचेत पड़ा रहा. जब होश में आया और बातें करने के लायक हुआ, तो उसने अटकते-अटकते बताया कि एक ‘काले चेहरे’ वाले ने उस पर आक्रमण किया था. उसका मतलब शायद नकाबपोश से था.

    इस पर काफी हो-हल्ला मचा और कास्पर हाउजर को ऐसी जगह रखा गया, जहां पुनः हमला होने की आशंका न हो. दो सिपाही भी वहां तैनात कर दिये गये.

    जून 1830 में हेर वान टचर ने अदालत में दावा करके कास्पर को अपने संरक्षण में ले लिया. दावे के आधार का कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता.

    और उसके आठ महीने बाद लार्ड स्टेनहोप नामक अंग्रेज ने उसे दत्तक के रूप में लेने के लिए अर्जी दी. महीनों की बातचीत के बाद स्टेनहोप 1831 के दिसंबर में कास्पर को अपने साथ आन्सबाक ले गया और वहां उसे डॉ. मेयर के सुपुर्द कर दिया.

    कास्पर की परीक्षा के बाद डॉ. मेयर इस निष्कर्ष पर पहुंचते कि उसकी बुद्धिमत्ता की बातें अतिशयोक्ति हैं, वास्तव में उसकी बुद्धि मात्र आठ वर्ष के बालक जैसी है. यह पता लगते ही कास्पर में स्टेनहोप की रुचि खत्म हो गयी. उसने उसे वहीं रहने दिया.

    मानो सरकस से भागा हुआ कोई खेल-कुशल हाथी आन्सबाकवासियों के हाथ लग गया था. वे उसका प्रदर्शन करने लगे. लेकिन सरकस के हाथी को थोड़े दर्शकों से संतोष कहां मिलता है! अत्याधिक ध्यान दिये जाने के कारण कास्पर की आदतें बिगड़ गयी थीं. वह न्यूरेम्बर्ग वापस जाने के लिए तड़पने लगा और उदास रहने लगा.

    14 दिसंबर 1833 को तीसरे पहर वह लड़खड़ाता हुआ अपने एक पादरी मित्र के घर आया. उसने कलेजे को दायें हाथ से जोर से दबा रखा था. घर में पहुंचते ही उसने अस्फुट स्वरों में बताया कि सार्वजनिक बाग में किसी ने उस पर छुरे से वार कर दिया और वह बेहोश हो गया.

    अलगे दिन उसने बताया कि एक अनजान आदमी उसे यह प्रलोभन देकर बाग में ले गया था कि तुम्हारे मां-बाप के बारे में बताऊंगा. वहां अजनबी ने सारी बातें गुप्त रखने की शपथ कास्पर से खिलायी. फिर उसने कास्पर को एक छोटा-सा बटुआ दिया और छुरे से घायल करके भाग गया. बटुए की तलाश हुई. जब वह मिल गया, उसमें कागज के एक टुकड़े पर एक अर्थहीन संदेश मिला. हस्ताक्षर की जगह ‘एम.एल.ओ.’ लिखा था. आक्रमणकारी का कोई सुराग नहीं मिल पाया.

    कास्पर हाउजर की हालत बिगड़ती गयी और 17 दिसंबर को उसका देहांत हो गया. सारा आन्सबाक भौंचक्का रह गया और न्यूरेम्बर्ग तो जैसे गूंगा हो गया. सारे जर्मनी में और आस-पास के देशों में खलबली मच गयी.

    फिर तरह-तरह की बातें फैलीं. जो कास्पर के विरुद्ध थे, उन्होंने कास्पर-कथा को इस युग की सबसे बड़ी ठगी कहा. समर्थकों का कहना था कि बेचारा एक बहुत बड़े षड्यंत्र का शिकार हो गया. कुछ की राय में वह बावेरिया की राजगद्दी का वारिसदार था और शहीद हो गया.

    कास्पर हाउजर के साथ ही उसके रहस्य भी दफन हो गये. उसके कब्र के पत्थर पर यह इबारत खुदी हुई है- ‘इस जमाने का एक रहस्य यहां दफन है. इसका जन्म अज्ञात है और मृत्यु रहस्यपूर्ण.’

    मगर कास्पर हाउजर मरकर भी लोगों की जिज्ञासा का विषय बना रहा. उस पर कई लेख लिखे गये हैं. डचेस आफ क्लीवलैंड ने भी उस पर कलम चलायी है.

    न्यूरेम्बर्ग के जो लोग कास्पर हाउजर के मूर्ख होने में संदेह करते थे, उनका कहना है कि यह किशोर किसी किसान-परिवार का अवांछित बच्चा था. इस विश्वास का कारण था उसके शरीर पर पाये गये बेढंगे कपड़े और वह पत्र, जिसमें दस बच्चों का उल्लेख था. लेकिन दूसरों की मान्यता थी कि कपड़े उसके अपने नहीं थे, जल्दबाजी में उसे पहनाये गये थे. पत्र किसी अनजान ने भ्रम पैदा करने के लिए लिखा था.

    हेर वॉन फ्युअरबाक का कहना है कि कास्पर हाउजर के हाथ अमीर घराने के लोगों की तरह छोटे-छोटे और नाजुक थे, किसानों के हाथ की तरह तो जरा भी नहीं थे. सिपाही वुस्ट का कहना है- ‘कास्पर के शरीर का रंग स्वास्थ्यपूर्ण था. अंधेरी कोठरी या गुफा में रखे गये लोगों की तरह न वह पीला था और न कमजोर लगता था.’

    कास्पर दुनिया की सामान्य वस्तुओं को भी ऐसे आश्चर्य से देखता था, जैसे वह स्वयं मंगलग्रह से आया हो. और फ्युअरबाक ने लिखा- ‘शब्दों और विचारों के अन्वय की कास्पर हाउजर में इतनी कमी थी, वह प्रकृति की सामान्य चीजों के प्रति इतना अज्ञात प्रकट करता था और सभ्य जीवन के रीति-रिवाज, आचार-विचार के प्रति वह इतना भयभीत था तथा उसके सामाजिक, मानसिक क्रिया-कलापों में इतनी विलक्षणता थी कि यह मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता कि वह किसी अन्य ग्रह का था व जादू से धरती पर आ टपका था.’

    चार्ल्स फोर्ट ने इस रहस्य को और भी उलझा दिया. उसने लिखा है कि सार्वजनिक बाग में जहां कास्पर हाउजर को छुरा मारा गया, वहां बर्फ की मोटी परत जमी हुई थी. और छानबीन करने पर मालूम हुआ कि वहां एक ही व्यक्ति के पांव के निशान थे और वे स्वयं कास्पर के थे.

    अंत में फोर्ट ने लिखा है- ‘ऐसा कहा जाता है कि किन्हीं राजनीतिक मामलों का भंडाफोड़ होने से रोकने के लिए कास्पर हाउजर की हत्या की गयी थी… कास्पर की हत्या के बाद कुछ ही समय में ऐसे कई व्यक्ति मर गये, जिन्होंने कास्पर के मामले में दिलचस्पी दिखायी थी और न्यूरेम्बर्ग में अफवाह थी कि इन सबको विष दिया गया था. इस तरह से मरने वालों में थे- नगरपति डा. बाइंडर, डॉ. आस्टर हाउजर, डॉ. फ्रेउ और डॉ. अल्बर्ट.’

    कास्पर हाउजर कौन था? यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है.

(मई  2071)

1 comment for “एक अनसुलझा रहस्य

  1. November 8, 2014 at 2:43 pm

    Excellent colection

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