एकात्मता के प्रेम-पाश में बद्ध होता है राष्ट्र  –  सुनीलकुमार पाठक

आवरणकथा

राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवादवर्तमान में विमर्श का एक प्रमुख विषय है. ‘राज्धातु में ष्ट्रन्प्रत्यय के योग से राष्ट्रशब्द की निष्पत्ति हुई है, जिसका अर्थ हैराज्य, देश, साम्राज्य, जनपद, प्रदेश, मंडल आदि. भारतीय संविधान की उद्देशिकामें राष्ट्रशब्द को अंग्रेज़ी के नेशन(Nation) शब्द का हिंदी पर्याय मानकर प्रयुक्त किया गया है. अंग्रेज़ी का नेशनशब्द लैटिन धातु नेशियोया नेटससे निष्पन्न है. दोनों का ही अर्थ जाति अथवा जन्म है. इसी कारण, अंग्रेज़ी के नेटिवशब्द का सम्बंध किसी व्यक्ति के भौमिक मूल अर्थात् उसके जन्म या निवास की मूल भूमि से है. यह भौमिक मूल जन्म के स्थल या स्थान विशेष से सम्बद्ध होकर, उस भूक्षेत्र से सम्बद्ध है, जिसका वह जन्मस्थल या जन्मस्थान, स्वयं एक अंग या अंश होता है. एतदर्थ, राष्ट्र का सम्बंध जन्मस्थान से होकर जन्मभूमि से सिद्ध होता है.

राष्ट्रशब्द की परिभाषा पर विचार करते हुए हमारी अहम् धारणा यह है कि यह भारतीय परिवेश और संस्कृति का शब्द है. और सर्वप्रथम ऋग्वेदमें हम इसका संधान पाते हैं. यहां राष्ट्रशब्द संगमन अथवा संगम के अर्थ में है– ‘अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम’. ‘ऋग्वेदका जिन्होंने भाष्य किया है, उन लोगों ने इसका अर्थ देश, दिशाओं अथवा पृथ्वी को धारण करनेवाली शक्ति कहा है. यह शक्ति जनों की है, लोगों की है, व्यक्तियों की है अथवा प्रकृतिप्रदत्त समृद्धियों की है. कुल मिलाकर इसका अर्थ यह बनता है कि राष्ट्र किसी भी प्रकार के समूह का, संगठन का, शक्ति का समुच्चय है. इस प्रकार भारतीय परिप्रेक्ष्य यह कहता है कि राष्ट्रीका अर्थ हैएक ऐसी इकाई, जो अपने आप में एक जगह है तथा आपस में मिलीजुली हुई है. ‘यजुर्वेदका कथन है– ‘राष्ट्रदा राष्ट्रभ्ये दत्त’. ‘अथर्ववेदकी उक्ति है– ‘तेनास्मान् ब्रह्मणस्पते।़मि राष्ट्राय वर्धये, राष्ट्राय मध्यम् बध्यतां.’ वैदिक वाङ्मय में राष्ट्र सम्बंधी चिंतन स्पष्ट है. वहां अधिकतर राष्ट्रशब्द ही प्रयुक्त है, ‘देशशब्द का प्रयोग नगण्य है. ‘देशकेवल स्थानवाची शब्द है, जबकि राष्ट्रमें स्थान (भूमि) के साथसाथ उस (देश या स्थान) के निवासियों का, उन (देशवासियों) की संस्कृति का भी समावेश है. वैदिक ऋषि राष्ट्रका दायित्व केवल शासक अर्थात् राजको सौंपकर ही संतुष्ट नहीं दीखते, वे राष्ट्र के प्रति समस्त राष्ट्रजन की जागरूकता की कामना करते हैं– ‘वयं राष्ट्रे जागृमाय पुरोहिताःराष्ट्र सम्बंधी वैदिक अवधारणा के इस सूत्रवाक्य– ‘माता भूमिः पुत्रो।़हं पृथिव्याःको वास्तव में भारतीय राष्ट्रीय चेतना का बीजमंत्र माना जा सकता है. जन्मभूमि के प्रति यही मातृभावनाभारत की राष्ट्रीय चेतना की संचालिका धुरी है. ‘समृद्धियुक्त जन समुदायकी व्याख्या यजुर्वेद में सुस्पष्ट हैहे सर्वव्यापक शक्ति! हमारे राष्ट्र में ब्रह्म तेज से सम्पन्न वर्चस्वी ब्राह्मण (विद्वान, शब्दसाधक, बुद्धिजीवी) जन्म लें. शस्त्रास्त्रनिपुण, निरोग एवं महारथी क्षत्रिय (पराक्रमी योद्धा सैनिक) हों. दुधारू गौएं, बलिष्ठ बैल और तीव्रगामी अश्व हों. बुद्धिमती नारियां हों. श्रेष्ठ, कर्मठ, सुसभ्य, सुशील और शूरवीर संतानें हों. समय पर वर्षा हो. औषधयुक्त एवं फलफूलवाली वनस्पतियां हों. हमारे राष्ट्र का हर प्रकार से योगक्षेम सम्पन्न हो.’ यह वैदिक राष्ट्रप्रार्थना वास्तव में भारतीय राष्ट्रीय चेतना की मंजूषा है, जिसमें राष्ट्रीयता के समग्र समन्वयात्मक तत्त्वरत्न सुरक्षित हैं.

भारतीय राष्ट्रीय चेतना के सम्यक् स्वरूप के साक्षात्कार हेतु अथर्ववेदके भूमिसूक्तका अध्ययनअनुशीलन भी सहायक है. ‘भूमिसूक्तभारतभूमि की विशालता और उसके नानाविध प्राकृतिक वैभव का विराट गौरवान्वयन है. इसमें हमारी मातृभूमि की गरिमा का अभिज्ञापन है. राष्ट्रीय चेतना के आधारभूत तत्त्वदेशप्रेम और जन्मभूमि के प्रति रागात्मक संवेदन का बड़े उदात्त शब्दों में प्रकटीकरण है. इसी भूमि सूक्तके आधार पर डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी ने दि फंडामेंटल यूनिटी ऑफ इंडियानामक पुस्तक में भारत की राष्ट्रीय चेतना को पश्चिम से आयातित मानने की अवधारणा को सतर्क खंडित किया है. डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल कृत भारत की मौलिक एकतानामक ग्रंथ तो भूमिसूक्तका वृहद् भाष्य ही है. इस सूक्त के कुछ मंत्र द्रष्टव्य हैं, यथा

यते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं यास्त ऊर्जस्तन्वः संबभूकः

तामु नो धेहि अभि नः पवस्व माताभूमिः पुत्रो।़हं पृथिव्याः

(हे पृथ्वी! तुम्हारे शरीर से निकलनेवाली जो शक्ति की धाराएं हैं, उनके साथ हमें संयुक्त करो.)

सानो भूमिर्विसृजतां माता पुत्राय मे पयः

(यह भूमि हमारी माता है, हम इसके पुत्रजो जन इस सम्बंध का अनुभव करता है, उसी के लिए माता दूध (कल्याण) का विसर्जन करती है.)

शतपथ ब्राह्मणमें समृद्धियुक्त ओजस्वी जनसमूह को राष्ट्रकहा गया है– ‘श्रीर्वै राष्ट्रम्.’ प्रजा को ही राष्ट्रकी संज्ञा देते हुए एतरेय ब्राह्मणकहता है– ‘राष्ट्राणि वै विशः’ ‘शुक्रनीतिसारमें राष्ट्रकी परिभाषा है– ‘स्थावारं जंगमं वापि राष्ट्र शब्देन गीयते.’ अर्थात् राष्ट्रशब्द से स्थावर (वृक्षपर्वतादि) तथा जंगम (पशु, मनुष्यादि) का बोध करना चाहिए. ‘महाभारतके शांतिपर्वमें राष्ट्रस्ये तत् कृत्यमं’ (अर्थात् राष्ट्रवासी प्रजावर्ग का कृत्य’) तथा अराजकेषु राष्ट्रेषु धर्मो व्यवतिष्ठते.’ (अर्थात् अराजक या राजाविहीन राष्ट्र में धर्म की स्थिति नहीं होती’) आदि वचनों में राष्ट्र को प्रसंग के अनुसार प्रजावर्ग या देश के क्षेत्रफल में लक्ष्य किया गया है. ‘महाभारतके शांतिपर्वमें राष्ट्र की रक्षा और वृद्धिके संदर्भ में राष्ट्र की रक्षा में प्रजावर्ग का और राष्ट्र की वृद्धि में देश की समृद्धि का अर्थ निहित है.

इस प्रकार राष्ट्र की जो वैदिकपौराणिक परिभाषा बनती है, उसे समेकित रूप से यों प्रस्तुत किया जा सकता हैमनुष्य की स्थिति में, वह चाहे जहां कहीं भी है; जो जीवन की अखंडता है, सम्पूर्णता है, वह चाहे भूमि की हो, जनसंख्या की हो, एक सुनिश्चित संगठन के लिए शासनप्रशासन की हो या उसके वर्चस्व की स्थापना की हो, उसे ही हम अत्याधुनिक सांस्कृतिक और राजनीतिक अर्थ में राष्ट्रकह सकते हैं.

आक्सफोर्ड शब्दकोशके अनुसार एक व्यक्तिसमूह, जिसकी भाषिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परम्पराएं एक हों तथा जो एक सरकार के अधीन हो, ‘राष्ट्रके अंतर्गत आता है.’ ‘ब्रिटानिका रेडी रिफरेंस इनसाइक्लोपीडियामें राष्ट्र (Nation) शब्द का अर्थ इस प्रकार हैऐसे लोगों का समूह जिनकी साझा पहचान उनके अंदर एक मनोवैज्ञानिक बोध और राजनीतिक इकाई का निर्माण करती है. उनकी राजनीतिक पहचान, साझी भाषा, संस्कृति, जातीयता और इतिहास जैसे अभिलक्षणों से पहचानी जाती है. एक राज्य के अंदर, एक से ज़्यादा राष्ट्र हो सकते हैं, लेकिन राज्य और देश जैसे पद बहुधा एकदूसरे के अर्थ में प्रयुक्त किये जाते हैं. एक राष्ट्रराज्य ऐसी आबादी का राज्य है, जिसकी प्राथमिक तौर पर एक राष्ट्रीयता रही है.’)

भारतीय चिंतन की दृष्टि राष्ट्र को व्यक्ति अथवा जन में समाहित वह रागात्मक भावना मानती है, जिसे मातृभाव से संपृक्त होने के कारण, हमारे भीतर एक ऐसी श्रद्धासम्बलित पूज्यभावना बनती है कि हम उसे प्रतिदिन प्रातःकालीन नमस्कार अर्पित करते हैं

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते

विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे

भारतीय वाङ्मय में सम्पूर्ण भारत की कल्पना एक ऐसे राष्ट्र के रूप में की गयी है, जिसका भूखंड भारत और इसमें रहनेवाली जनता भारतीय है

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्

वर्ष तद्भारतं नाम भारती यत्र संततिः

आदिकाव्य रामायणमें भारत के भौगोलिक और सांस्कृतिक स्वरूप को राष्ट्रके रूप में प्रस्तुत किया गया है. श्रीराम के मुख से आदिकवि वाल्मीकि की पंक्तियां हैं

नेयं स्वर्णपुरी लंका रोचते मम् लक्ष्मणः

जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

विष्णुपुराणके अनुसार

गायन्ति देवाः किल गीतकानि, धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे

स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्

अर्थात भारतभूमि में जन्म लेना सौभाग्य सूचक है.

भारतीय विद्वानों ने भी राष्ट्रशब्द को परिभाषित किया है. डॉ. सुधींद्र के अनुसार, ‘भूमि, भूमिवासी जन और जनसंस्कृतितीनों के सम्मिलन से राष्ट्र का स्वरूप बनता है.’ ‘भूमि’- अर्थात भौगोलिक एकता, ‘जन’- अर्थात जनगण की राजनीतिक एकता, ‘जनसंस्कृतिअर्थात सांस्कृतिक एकतातीनों के समुच्चय का नाम राष्ट्रहै. आगे वे पुनः लिखते हैं– ‘भूमि उसका (राष्ट्र का) कलेवर है, जन उसका प्राण है और संस्कृति उसका मानस है.’ श्री वासुदेव शरण अग्रवाल ने राष्ट्रशब्द को अर्थित करते हुए लिखा है– ‘राष्ट्र का सम्मिलित अर्थ पृथ्वी, उसपर रहनेवाली जनता और उस जनता की संस्कृति है.’

विभिन्न विद्वानों ने राष्ट्र के लिए कुछ सत्ताओं (विशेषताओं) की अनिवार्यता मानी हैजैसे, देश सम्बंधी एकता, धर्म की एकता, वर्ग की एकता तथा ऐतिहासिक पूर्वजों के गौरव के प्रति एकता. राष्ट्र में प्रमुख रूप से भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक इकाइयां पूंजीभूत रहती हैं. इन तीन तत्त्वों के संकोच या विस्तार के अनुसार, राष्ट्र का स्वरूप भी संकुचित या विस्तृत होता रहता है.

सारतः ‘राष्ट्र’ शब्द का सम्मिलित अर्थ है- पृथ्वी, उस पर बसनेवाली जनता और जन-संस्कृति. जब ये तीनों स्वर एकमेक होते हैं, तब ‘राष्ट्र’ का जन्म होता है.

मई 2016

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