उड़ीसा की राजकीय मछली : महानदी महासीर  –  डॉ. परशुराम शुक्ल

राज-मछली

महानदी महासीर एक शानदार मछली है. इसका वैज्ञानिक नाम है टॉर महानदिकस. अंग्रेज़ी में इसे महसीर कहते हैं. व्यावसायिक उपयोग की इस मछली का व्यावसायिक नाम महानदी महासीर है. विश्व में यह इसी नाम से विख्यात है.

महानदी महासीर साइप्रिनीफॉर्मेस गण के साइप्रिनिडी परिवार की मछली है. इसका वंश टॉर है. विश्व में टॉर वंश की अनेक मछलियां पायी जाती हैं. इनमें पांच मछलियां प्रमुख हैं. ये हैं- 1. टॉर टॉर, 2. टॉर-प्यूटिटॉरा, 3. टॉर मोसल, 4. टॉर खुर्दी और टॉर महानदिकस. भारत में सामान्यतया सभी स्थानों पर इन सभी मछलियों को महासीर के नाम से जाना जाता है. इसका प्रमुख कारण इनकी शारीरिक संरचना है. टॉर वंश की पांचों महासीर मछलियों की शारीरिक संरचना में इतनी समानता होती है कि एक मत्स्य विशेषज्ञ ही इन्हें अलग-अलग पहचान सकता है.

महासीर मछलियों के वैज्ञानिक नामों का निर्धारण करना आरम्भ से एक बड़ी समस्या रही है. इसके प्रमुख कारण दो हैं. पहला- महासीर की सभी जातियों की शारीरिक संरचना लगभग एक जैसी होती है तथा दूसरा- एक ही जाति की महासीर की शारीरिक संरचना अलग-अलग नदियों तथा अलग-अलग जलस्रोतों में बदल जाती है. यह समस्या महानदी की महासीर के साथ सर्वाधिक है. सर्वप्रथम विख्यात मत्स्य वैज्ञानिक डेविड ने इसका जीववैज्ञानिक अध्ययन किया और इसे टॉर महानदिकस वैज्ञानिक नाम दिया. इसके बाद मेनन ने इसका वैज्ञानिक अध्ययन किया. मेनन ने अपने वैज्ञानिक अध्ययन में यह पाया कि टॉर महानदिकस की शारीरिक संरचना टॉर टॉर से इतनी अधिक मिलती है कि दोनों को अलग-अलग जातियों की मछलियां नहीं कहा जा सकता. इस समानता को देखते हुए मेनन ने 1999 में दोनों को एक ही जाति की मछलियां घोषित कर दिया. कुछ मत्स्य वैज्ञानिक इन दोनों मछलियों को एक ही जाति की मछली नहीं मानते हैं. इनका मत है कि महानदी की महासीर टॉर टॉर की एक उपजाति है. इसके साथ ही कुछ मत्स्य विशेषज्ञ महानदी की महासीर को टॉर प्यूटिटॉरा की उपजाति मानते हैं.

महानदी महासीर पुरानी दुनिया की मछली है. यह केवल एशिया के कुछ भागों में पायी जाती है. भारत, बांग्लादेश और म्यांमार (बर्मा) में मिलती है. भारत में इसे उड़ीसा, असम तथा पूर्वी और मध्य हिमालय के तराईवाले भागों में देखा जा सकता है. यह महासीर महानदी के ऊंचाईवाले भागों में बहुत बड़ी संख्या में मिलती है. इसीलिए इसे महानदी की महासीर कहते हैं. इसके साथ ही इसे हीराकुण्ड के विशाल जल क्षेत्र में भी देखा जा सकता है.

हिमालय की तेज़गति से बहनेवाली नदियों और जलधाराओं की यह मछली पर्वतीय नदियों में रहना पसंद करती है, जिनका तल कंकड़ों-पत्थरोंवाला और चट्टानी हो.

यह बड़ी स्वादिष्ट और पौष्टिक होती है, अतः देशी बाज़ारों के साथ ही विदेशों में भी इनकी भारी मांग है. इसके साथ ही यह शानदार शिकार की मछली (गेमफिश) मानी जाती है. महानदी महासीर बड़ी तेज़ और फुर्तीली होती है. इसलिए कुछ लोगों को इसके शिकार में बड़ा आनंद आता है. इसकी शारीरिक संरचना इस प्रकार की होती है कि यह तेज़ गति से बहनेवाली नदियों में धारा के विपरीत सरलता से तैर सकती है.

महानदी महासीर की शारीरिक संरचना सामान्य महासीर और सुनहरी महासीर से बहुत मिलती-जुलती है. यह एक बड़े आकार की मछली है. इसकी लम्बाई 1.4 मीटर से लेकर 1.7 मीटर तक हो सकती हैं. कभी-कभी 2.7 मीटर तक लम्बी महानदी की महासीर भी देखने को मिल जाती है. भोजन और व्यावसायिक उपयोग के लिए प्रायः 1.7 मीटर के आसपास की मछलियां पकड़ी जाती हैं. महानदी महासीर की शारीरिक संरचना मोसल महासीर से भी बहुत मिलती है. महानदी महासीर और मोसल महासीर में केवल आंखों के आकार का अंतर होता है. मोसल महासीर की आंखें बड़ी होती हैं, जबकि मोसल महासीर की तुलना में महानदी की महासीर की आंखें छोटी होती हैं.

इसका वज़न 40 किलोग्राम से लेकर 60 किलोग्राम तक हो सकता है. कभी-कभी 75 किलोग्राम तक की महानदी महासीर देखने को मिल जाती हैं. मादा महानदी महासीर नर से छोटी होती है. इसका वज़न भी नर महानदी महासीर से कम होता है.

महानदी महासीर की शारीरिक संरचना ताज़े पानी की सामान्य मछलियों की तरह होती है. इसका शरीर बीच में मोटा और मांसल होता है तथा सिर और पूंछ की ओर पतला होता है. इसका सिरवाला भाग, पूंछवाले भाग की तुलना में अधिक मोटा और मांसल होता है.

इसका सिर इसके शरीर की तुलना में छोटा होता है. इसकी आंखें छोटी होती हैं तथा मुंह चौड़ा होता है. महानदी महासीर के पूरे शरीर पर बड़े और मज़बूत शल्क होते हैं, जो इसे सुरक्षा प्रदान करने का काम करते हैं. इसके शरीर पर सामान्य महासीर के समान मीनपंख होते हैं. इसके मीनपंखों की संरचना इस प्रकार की होती है कि यह तेज़ धारावाली पर्वतीय नदियों में धारा के विपरीत सरलता से तैर सकती है. महानदी महासीर के सभी मीनपंख गहरे रंग के होते हैं तथा पूंछ का मीनपंख, अन्य महासीर मछलियों के समान दो भागों में बंटा हुआ होता है.

महानदी महासीर अन्य महासीर मछलियों के समान सर्वभक्षी है. सामान्यतया यह ताज़े पानी की नदियों में पाये जानेवाले कीड़े-मकोड़े, क्रस्टेशियन और मेंढक खाती है. इसके साथ ही यह बड़ी संख्या में छोटी मछलियों का शिकार भी करती है. महानदी महासीर ताज़े पानी में पायी जानेवाली विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां भी बड़े शौक से खाती है. इसे शैवाल भी पसंद है. नदियों के किनारे बड़ी संख्या में वृक्ष होते हैं. इनसे विभिन्न प्रकार के फल, बीज, बेरियां आदि नदियों में गिरते रहते हैं. महानदी महासीर इस प्रकार गिरे हुए फल, बीज आदि बड़े शौक से खाती है. इसकी एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह भोजन की उपलब्धता और स्थान के अनुसार अपना भोजन बदल सकती है. सम्भलपुर जिले में रुके हुए पानी में इसे पालने में सफलता मिली है. पालतू हो जाने पर महानदी महासीर बाहर से दिया हुआ भोजन सरलता से लेने लगती है.

महानदी महासीर का प्रजनन, महासीर की अन्य जातियों के समान होता है. इसमें बाह्य निषेचन पाया जाता है. अर्थात्
मादा महानदी महासीर अण्डे देती है और नर उन पर शुक्राणु डालकर उन्हें निषेचित करता है.

यह एक वर्ष में दो बार प्रजनन करती है. इसका पहला प्रजनन काल अगस्त के मध्य से आरम्भ होता है और सितम्बर तक चलता है तथा दूसरा प्रजनन काल नवम्बर के अंत से आरम्भ होता है और जनवरी के आरम्भ तक चलता है.

प्रजनन काल के आरम्भ होते ही यह नदी में धारा के विपरीत तैरती हुई ऊपर की ओर चढ़ती है. ऊपर पहुंचकर नर महानदी महासीर प्रजनन की इच्छुक मादा की खोज करता है और प्रजनन की इच्छुक मादा के मिल जाने के बाद उसके साथ रहना आरम्भ कर देता है. यह मादा के साथ तैरता है तथा उससे अनेक प्रकार से प्रणय निवेदन करता है. कुछ समय बाद नर-मादा दोनों मिलकर ऐसे स्थान की खोज करते हैं, जहां पानी की गति धीमी हो अथवा पानी रुका हुआ हो. इसके बाद ये नदी के तल से एक बड़ा पत्थर निकालकर एक गड्ढा तैयार करते हैं. इसी गड्ढे में मादा अण्डे देती है. नर महानदी महासीर इस समय मादा के निकट ही रहता है. मादा अण्डे देती जाती है और निकट खड़ा नर उन पर शुक्राणु छिड़ककर उन्हें निषेचित करता जाता है.

महानदी महासीर के अण्डे नदियों के चट्टानी तलों में ही परिपक्व होते हैं. इसके अण्डों पर मौसम का सीधा प्रभाव पड़ता है. मौसम गर्म होने पर ये शीघ्र परिपक्व हो जाते हैं. इसके अण्डे परिपक्व होने पर फूटते हैं और इनसे छोटे-छोटे बच्चे निकल आते हैं. ये बच्चे थोड़ा-सा बड़े होते ही नदी में नीचे की ओर यात्रा आरम्भ कर देते हैं तथा अपने भोजन क्षेत्र में पहुंच जाते हैं. बच्चों का बड़ी धीमी गति से विकास होता है. इनमें 26 सेंटीमीटर का हो जाने पर नर और 24 सेंटीमीटर का हो जाने पर मादा प्रजनन योग्य हो जाते हैं.

महानदी महासीर वयस्क होने के बाद नदी में धारा के विपरीत प्रवास करती है तथा अपने प्रजनन क्षेत्र में पहुंचकर चट्टानी तल में प्रजनन करती है और फिर वापस आ जाती है. इसका यह चक्र जीवनभर चलता रहता है.

इसकी संख्या में तेज़ी से कमी हो रही है. इसके साथ ही जल प्रदूषण, बांधों के निर्माण, जंगलों की कटाई आदि के कारण इसके प्राकृतिक आवास और प्रजनन स्थल नष्ट हो रहे हैं, अथवा कम होते जा रहे हैं. इससे यह प्रजनन नहीं कर पाती.

पर्वतीय भागों में कभी-कभी स्थानीय लोग, प्रजनन हेतु नदी में ऊपर की ओर प्रवास करती हुई मछली को बीच में ही पकड़ लेते हैं तथा इसे मारकर इसके अण्डों और मांस का भोजन के रूप में उपयोग करते हैं. इसका भी इसकी संख्या पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है. महानदी महासीर की गिरती हुई संख्या को देखते हुए आई.यू.सी.एन. (इन्टरनेशनल यूनियन फार द कंजरवेशन ऑफ नेचर) ने सन् 2009 में इसे एक संकटग्रस्त मछली घोषित कर दिया है. 

मार्च 2016

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