‘इजाज़त मिल सकेगी क्या?’

(सीरिया के कवि नज़ार त़ौफीक कबानी को आधुनिक अरब शायरी का पितामह माना जाता है. उनकी पहली नज़्म ‘बेरूत ने मुझे बताया’ सन् 1944 में प्रकाशित हुई जब वह दमिश्क यूनिवर्सिटी में कानून के छात्र थे. दो दर्जन से अधिक कविता-संग्रहों वाले कबानी की कविताओं ने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया है. यहूदियों के हाथों अरबों की शिकस्त ने कबानी को गहरा सदमा पहुंचाया. उसीसे उनकी शायरी में एक इंकलाबी, प्रतिरोधी और आलोचनात्मक रुझान पैदा हुआ. उन्होंने लिखा कि यहूदियों ने अरबी लोगों को वैचारिक, रचनात्मक, बौद्धिक और राजनीतिक मैदान में पनपने नहीं दिया साथ ही अभिव्यक्ति की आज़ादी भी छीन ली. उन्होंने अपने दर्द को ‘इजाज़त मिल सकेगी क्या?’ में पेश किया है. हिंदी में प्रस्तुति की है फ़ीरोज़ अशऱफ ने.)

इजाज़त मिल सकेगी क्या,
जहां सब सोचने और लिखनेवालों का मुकद्दर
मौत का घर है,
जहां लब कैद हैं,
और दरवेशों ने जहां
ताज़ा लफ्ज़ पे पहरे बिठाये हैं,
जहां कुछ पूछने का मतलब है सज़ा पाना,
वहां मुझको इजाज़त मिल सकेगी क्या?

इजाज़त मिल सकेगी, अपने बच्चों को
मैं पालूं जिस तरह से पालना चाहूं,
बता पाऊं कि मज़हब आदमी और उसके रब के
आपसी रिश्ते को कहते हैं
कोई भी तीसरा मज़हब का ठेकेदार दरमियां आ नहीं सकता!

इजाज़त मिल सकेगी क्या
मैं पहले ये बता पाऊं कि मज़हब नाम है
मिलने-मिलाने का, सचाई का,
कि मज़हब नाम है ईमानदारी का,
फिर उसके बाद जी चाहे तो यह सोचें
मुसतहब या पुण्य क्या है
वजू कैसे करें, नहायें कैसे,
दाहिने हाथ से लुकमा बनायें.

इजाज़त मिल सकेगी क्या
अपनी बेटी को ये बतला दूं
खुदा को प्यार है उससे
वो जब चाहे, जहां चाहे, दुआ मांगे
खुदा से इल्म मांगे, पुण्य को मांगे,
बस उसकी ही रिज़ा मांगे.

इजाज़त मिल सकेगी अपने बच्चों को
बड़े जबतक न हो जायें
कब्र से पाप की हर्गिज़ डराऊं मैं नहीं तबतक
कि बच्चे मौत से पूरी तरह वाकिफ नहीं अबतक.

इजाज़त मिल सकेगी क्या
कि अपनी प्यारी बेटी को
मैं अपनी सभ्यता से, संस्कृति से करा दूं ठीक से वाकिफ,
ये बेहतर है वो इंसानियत के दीन को दिल में बसाये
फिर जो चाहे तो सिर ढके, ज़ीनत छुपाये.

इजाज़त मिल सकेगी, अपने बेटे को ये समझाऊं
डाह या फिर जाति, या फिर मज़हब
आदमी को अपने रब से दूर करता है
किसी को दुख न दे और माफ भी कर दे
कि बस एहसान ही इंसान को पुरनूर करता है.

इजाज़त मिल सकेगी अपनी बेटी को बता पाऊं
कि बस आयात को यूं याद कर लेना नहीं काफी,
जो वो स्कूल में पढ़ती है, वो सब भी ज़रूरी है
इल्म का, दीन का इक खास रिश्ता है,
समझकर पढ़ने वालों से
खुदा की खास नज़दीकी हुआ करती!            

फरवरी 2016

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