आधे रास्ते (सातवीं क़िस्त)

ब मेरे मैट्रिक होने की खबर आयी तो पिताजी की आंखों में आंसू आ गये. मुझे छाती से लगाते हुए उन्होंने कहा- “कनु, मेरी मैट्रिक पास होने की अभिलाषा अधूरी रह गयी थी. तूने आज उसे पूरा कर दिया. मुझसे भी बड़ा बनना.”

1902 में पढ़ने के लिए कॉलेज जाना आज के विलायत पढ़ने जाने की अपेक्षा कहीं अधिक साहस की बात समझी जाती थी. पिताजी के एक मित्र ने सलाह दी कि बम्बई के एलफिन्स्टन कॉलेज को छोड़कर और किसी में पढ़ाई की अच्छी व्यवस्था नहीं है. लेकिन बम्बई दूर था, इसलिए मां को अच्छा नहीं लगा और वहां आकर्षण बहुत-से थे, इसलिए पिताजी को पसंद नहीं आया. मेरी बहन और दूसरे रिश्तेदार बड़ौदा रहते थे. मेरे मामा के पुत्र प्राणलाल भाई भी वहां जाने वाले थे. इन कारणों से मेरा बड़ौदा कॉलेज में जाना तय हुआ.

शुभ शकुन देखकर प्राणलाल भाई और मैं प्रोफेसर तापीदास काका के लिए चिठ्ठी लेकर बड़ौदा के लिए रवाना हुए.

प्राणलाल भाई बचपन से ही बाल भीम की याद दिलाते थे. उनकी छाती और गर्दन लम्बाई की दृष्टि से असाधारण थी. उनकी बलिष्ठ भुजाएं सामान्य मनुष्य की जांघों से भी मोटी थीं. उनका एक पैर लोहे के खम्भे के समान था, दूसरा बचपन में सूख गया था, परंतु वे आवश्यकता पड़ने पर उसे जांघ के जोड़े से घुमाकर चाबुक की भांति इस्तेमाल करते थे.

मैं उनसे बिल्कुल भिन्न था- छोटा, नाजुक, थोड़ा बोलनेवाला, लजीला और अकडू. बड़े आदमी का लाडला लड़का होने से मैं बाजार में कुछ लेने नहीं जाऊं; यदि जाऊं तो कुछ लेना नहीं आवे. बिना वस्तु के ही काम चला लूं पर भाव-ताव करने की हिम्मत न हो. मैं बैठा-बैठा कुछ शुरू कर डालूं पर उसे पूरा करें प्राणलाल भाई.

इस प्रकार जब बड़ौदा गये तो हम दोनों एक दूसरे पर अवलम्बित थे.

पहले दिन मेरी बहन और बहनोई ने हमारा सत्कार किया और एक पड़ोसी के घर हमारा सोने का प्रबंध किया.

सबेरे हमारी जाति के ताज़ा पास होनेवाले एक मित्र ने हमसे छात्रालय के सुपरिटेंडेंट भाईशंकर से मिल आने के लिए कहा. उसने उससे हमारी सिफ़ारिश कर दी थी. हम प्रसन्न होते हुए कॉलेज की ओर गये. इस विषय में हमें तनिक भी शंका नहीं थी कि हम जग जीतने निकले हैं.

जब हम सुपरिटेंडेंट के कमरे के आगे पहुंचे तब गर्व से हमारी छाती फूल रही थी.

कमरे के आगे हजामत बनवाते हुए एक विद्यार्थी से हमने पूछा-

‘भाईशंकर सुपरिंटेंडेंट कहां हैं?”

उसने बड़े रौब से पूछा- “कहां से आये हो?”

हम सुपरिन्टेंडेंट से मिलने गये थे, ऐसे छोटे-छोटे सवालों का जवाब देने नहीं, इसलिए मुझे अपने स्वाभिमान पर चोट होती दिखाई दी. स्वाभिमान पर चोट होती देखकर मेरा सर चकराने लगता था और मैं विरोधी को मुंह तोड़ उत्तर देने से अपने को रोक नहीं सकता था. उसमें भी यह तो पहला अनुभव था- “कहां से? देखते नहीं उस दरवाज़े में से?” मैंने भी वैसा ही जवाब दिया. दूर खड़े हुए दो-तीन लड़के हंस पड़े.

“क्या काम है? मुझे बताओ,” उस विद्यार्थी ने कहा.

“इससे तुम्हें क्या मतलब?” प्राणलाल भाई को भी मेरा रंग लगा, “भाई शंकर कब आवेंगे?”

 खैर, पहले ही दिन रौब जमाकर हर्षित होते हुए हम वापस आये.

शाम को हमारे ग्रेज्युएट मित्र मिले तो हमारे रौब की शीशी का पारा तल में जाकर बैठ गया.

अधिकार की दृष्टि से तो ‘बोर्डिंग’ का सुपरिंटेंडेंट वह ‘फेलो’ होता था जो प्रति वर्ष बी. ए. में प्रथम आता था. भाईशंकर तो कॉलेज का क्लर्क था. लेकिन चूंकि उसके सामने ही प्रति वर्ष ‘फेलो’ बदले जाते थे, इसलिए उसे सब सम्मान प्रदर्शित करने के लिए सुपरिंटेंडेंट कहते थे. हम वास्तविक सुपरिंटेंडेंट का अपमान कर आये थे.

जैसे-तैसे अपने मित्र की सहायता और तापीदास काका की चिट्ठी के द्वारा अंत में हमको ‘डाईसेक्सशन हॉल’ नाम के सुविधारहित मकान में चार-पांच विद्यार्थियों के साथ रखा गया.

दूसरे दिन मैस में खाने गये. मैस में तीन रेशमी धोती पहने हुए ब्राह्मण थे, जो साथ बैठे- दो हम और तीसरे हमारे फेलो साहब.

“क्यों, मुन्शी ब्रदर्स”, उससे छींटा कसे बिना न रहा गया, “मुझे पहचानते हो कि नहीं?”

“अरे हम तो तुम्हें बहुत दिन से जानते हैं”, प्राणलाल भाई ने उत्तर दिया.

हमें विश्वास हो गया कि हममें आपस में लड़ाई रहेगी.

डाइसेक्शन हॉल’ में तीन विद्यार्थी और थे. उनके साथ भी हमारी शीघ्र मित्रता हो गयी. केवल भट्ट नाम का एक छठा विद्यार्थी था. वह अकडू और अलग रहने वाला था. पहले ही दिन से उसने आठ-दस घंटे रोज़ पढ़ना शुरू कर दिया. वह अक्सर हमें किसी-न-किसी प्रकार इस बात का भान करा देता था कि उसे हमारी गप्पें और शैतानियां पसंद  नहीं हैं.

उन्हीं दिनों ‘बीकानेर नाटक मंडली’ बड़ौदा आयी और दो-चार दिन बाद मैं अपने मित्रों को नाटक दिखाने ले गया.

मैंने भट्ट से भी चलने के लिए आग्रह किया परंतु वह टस-से-मस न हुआ. उसने कहा- “मेरे बाप ने मुझे यहां पढ़ने भेजा है, नाटक देखने नहीं.”

“धत्तेरे बाप की!” एक अनाविल मित्र ने उत्तर दिया.

जबसे भट्ट ने यह कहा था कि हमारे माता-पिता ने हमें अभिनेता बनने के लिए कॉलेज नहीं भेजा है तब से हम यह मानने लगे कि उसकी सुविधा का ध्यान रखने की हमारी ज़िम्मेदारी खत्म हो गयी.

रात को दो-तीन बजे नाटक खत्म होने पर हम धीरे-धीरे चलते हुए और गीत गाते हुए घर लौटते और घर पर भी यदि प्राणलाल भाई को गाने की उमंग उठती तो साथ देने के लिए तैयार रहते.

एक शनिवार को हम ‘नर्मदा’ नामक नाटक देखकर आये तो तीन बजे के लगभग प्राणलाल भाई अपनी बुलंद आवाज़ में ललकारने लगे-

‘बलिहारी है प्रियतम तेरे प्रेम की

तेरी आंखों के ये तारे

मुझे प्राण से भी हैं प्यारे

प्रिय तुम होना कभी न न्यारे

मेरे यौवन के रखवारे.’

और हम सबने भी साथ दिया. गीत ने सामूहिक गान का रूप ले लिया. एक ने मेज़ पर ताल देना शुरू किया तो दूसरे ने मुंह से हारमोनियम बजाना शुरू किया. इस प्रकार प्रातःकाल चार बजे ‘डाइसेक्शन हॉल’ गूंज उठा.

दूसरे दिन सबेरे हममें से एक ने भट्ट को फेलो के कमरे से निकलते देखा. खाने के वक्त फेलो महाशय ने चुटकी ली- “डाइसेक्शन हॉल में तो रात को बुलबुलें चहक रही थीं.”

“बुलबुलें ही थीं न”, प्राणलाल भाई ने जवाब दिया- “कौए तो नहीं थे?”

“खबरदार, मैं चेतावनी देता हूं”, फेलो ने कहा.

हमने भट्ट की खबर लेने का संकल्प किया. वह दोपहर को बारह बजे नंगे पैर- वह जूते कभी नहीं पहनता था- ‘डाइसेक्शन हॉल’ की ओर आता हुआ दिखाई दिया. हम दरवाजा अंदर से बंद करके और ओढ़कर सो गये. रास्ता तपकर अंगार जैसा हो रहा था. जलते हुए पैरों से भट्ट आया और दरवाजा खटखटाया. सोते हुए आदमी तो जागते देखे गये हैं, पर जगते हुए क्या कभी जगे हैं? ज्यों-ज्यों दरवाजा खटकता जाता त्यों-त्यों हमारे नकुओं से अधिकाधिक ज़ोर से खर्राटे की आवाज़ निकलती जाती. अंत में भट्ट थक गया और बड़बड़ाता हुआ, जलते पैरों फेलो को बुलाने गया.

थोड़ी ही देर में फेलो, भट्ट और छात्रालय का कहार दरवाजा खटखटाने लगे. हम मुचकुंद की निद्रा में पड़े थे, इसलिए जागते तो कैसे जागते? अंत में किवाड़ें उतारने की बात सुनी तो हममें से एक ने दरवाज़ा खोला और हम आंखें मलते हुए उठे.

“क्या करते हो?”

“हम कल नाटक देखने गये थे, इसलिए हमें नींद आ गयी.”

फेलो के मन की बात हो गयी. हमारी धृष्टता, संगीत, अपने मां-बाप के प्रति हमारा कर्तव्य आदि सभी विषयों का उसने विस्तार से विवेचन किया और कहा कि ‘मुनशी ब्रदर्स’ को तो कॉलेज से निकाल ही दिया जायेगा.

बातों-ही-बातों में उसने मेरी भी कुछ आलोचना की. यह देखकर मेरा पारा गर्म हो गया. मैं बिस्तर से उठा और उसके सामने जाकर खड़ा हो गया और बोला- “देखिए मास्टर फेलो, आप जो कहना चाहें, शीघ्र कह डालें. हमें नीद आ रही है. आपके जाने के बाद हमें सोना है.”

फेलो आगबबूला हो गया. “मैं देख लूंगा, देख लूंगा” कहता हुआ चला गया. हम करने को तो सब कर गये, पर हमारे होश उड़ गये. अब क्या होगा? कॉलेज में से निकलवायेगा. हम स्तब्ध होकर एक-दूसरे की ओर देखने लगे.

हममें से एक कॉलेज के तीन अग्रगण्य माने जानेवाले विद्यार्थियों को जानता था. वह उनके पास मदद के लिए गया. वे तीन थे- ‘पी. के.’, ‘पंडय़ा काका’ और ‘अंकलेसरिया’. ये तीनों कॉलेज के हर कार्य में आगे रहते थे, सुधारों के लिए लड़ते थे और सूरती मैस में सम्राट का पद भोगते थे. हमने ‘फेलो’ के साथ होनेवाली लड़ाई की कथा आरम्भ से लेकर अंत तक उन्हें सुना दी. उनको भी फेलो से घृणा थी, इसलिए हमें अभयदान देते हुए उन्होंने तनिक भी हिचकिचाहट नहीं दिखायी.

दूसरे दिन फेलो का फरमान आया. भट्ट को बाहर रखने और उसका अपमान करने के लिए ‘मुन्शी ब्रदर्स’ पर दो रुपया और दूसरों पर एक-एक रुपया जुर्माना किया गया था. जैसे ही फरमान आया वैसे ही पी. के. ने प्रिंसिपल के पास भेजने के लिए अपील तैयार कर डाली. प्रिंसिपल ने इस अपील की जांच गणित के अध्यापक तापीदास काका और संस्कृत के प्रोफेसर आर्ते को सौंपी.

वृद्ध तापीदास काका सारे कॉलेज के ‘काका’ थे. उनका प्रेमपूर्ण हास्य सबको वश में कर लेता था. सबको सांत्वना देने की उनमें अद्भुत शक्ति थी. ‘दोनों ओर से बहुत-सी बातें कही जा सकती हैं,’ यह उनका प्रिय सूत्र था.

काका और आर्ते साहब ने हमें बुलाया. मेरे मित्रों ने मुझे आगे कर दिया. मैं यह सोचकर कांप रहा था कि यदि कॉलेज में आते ही दंड मिला तो न जाने पिताजी क्या कहेंगे. मैं घबराता हुआ आगे बढ़ा.

कुछ दूर पर हमारे फेलो महाशय बैठे थे.

“क्या तुम ‘मुन्शी ब्रदर्स’ में से एक हो?”

“जी, हां!”

“क्या है? सच-सच बता दो.” काका ने कहा.

“साहब”, मैंने कहा, “हम शनिवार की रात को नाटक में से आकर ज़रा गा रहे थे कि भट्ट ने जाकर फेलो से शिकायत कर दी. तभी से फेलो साहब गुस्सा हो गये हैं.”

“गाने में क्या हुआ?” आर्ते साहब ने पूछा. “लेकिन तुम दोनों ने भट्ट और फेलो का अपमान भी तो किया है?”

‘जी नहीं, दोपहर को हम सो रहे थे कि भट्ट और फेलो साहब आ गये. इन्होंने दरवाज़ा खटखटाया. मैंने सुना नहीं. साहब, यही हमारा दोष है.’

“लेकिन इसमें अपमान कैसे हुआ?” काका ने पूछा.

‘किसी तरह भी नहीं साहब! उल्टे इन्होंने हमें आधे घंटे तक बुरी तरह डांटा है. इन्होंने  कहा कि हम कॉलेज के लायक नहीं हैं, बाप का पैसा बिगाड़ते हैं, हमें कॉलेज से निकाल दिया जायगा.”

“दैट्स इट” काका ने फेलो से कहा. “यह लड़का अपमान करे? और तू उसे लेक्चर दे? दो महीने पहले तो तू स्वयं ही विद्यार्थी था. अधिकार मिल गया तो तेरा यह रौब है?”

“लेकिन साहब, मेरा अपमान जो हुआ है”, फेलो ने कहा.

“अरे, यह भी विद्यार्थी और तू भी विद्यार्थी. गीत गाया तो क्या पाप हो गया? क्या ऐसी बातें कहनी चाहिए? अरे, मेरे भाई, ऐसे लड़कों के साथ तो दो घड़ी हिल-मिलकर बैठना चाहिए, बातचीत करनी चाहिए.” और उन्होंने हमसे कहा, “जाओ जुर्माना माफ हुआ. खबरदार जो फिर कभी फेलो का अपमान किया.” और काका फेलो से बोले, “नये लड़कों से तनिक प्रेम का व्यवहार करना चाहिए. जा, जा. केतली में तूफान.”

हम विजयपताका फहराते हुए बाहर आये और वहां खड़े हुए हमारे मित्रों ने हमें शाबाशी दी.

यह उत्सव मनाने के लिए हमने चार आने चंदा किया, बाज़ार से जलेबी और चिवड़ा मंगाये और पंड्या काका के कमरे में दावत की. इस प्रकार पी. के. की टोली में प्रविष्ट होने की हमारी विधि सम्पन्न हुई.

इस अनुभव से मुझे बड़ा लाभ हुआ. अपने ही में डूबे रहने से मुझमें जो अकड़ आ गयी थी वह अब कम होने लगी. साथ ही दूसरों के मुकाबले मुझे अपनी शक्तियों और कमज़ोरियों का भी कुछ भान हुआ. अब मैं कॉलेज के नेताओं का भी प्रिय बन गया.

1902 की मेरी डायरी में एक स्थान पर लिखा है-

‘मुझे आमोद के पी. के. देसाई की मित्रता का सौभाग्य मिला है. सब मित्रों ने मिलकर मुझे जो कुछ सिखाया है उससे अधिक उस अकेले ने मुझे सिखाया है.’

ज्ञान और विकास के लिए भटकनेवाले मुझ जैसों को उसका साथ अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ.

जब मैं स्कूल में पढ़ता था तभी से नेपोलियन ने मेरी कल्पना को उत्तेजित किया था. पैसे हाथ में आते ही मैंने तुरंत एबट लिखित ‘नेपोलियन का जीवन चरित्र’ खरीदा और उसे अत्यधिक रुचि के साथ पढ़ा.

इस पुस्तक की प्रेरणा से मैंने एक अंग्रेज़ी  महाकाव्य लिखना भी आरम्भ किया था. नेपोलियन का स्थान अब भी मेरे छोटे-से देव मंदिर में है. उसका प्रताप अत्यंत दुर्बलता के क्षणों में मेरे मन को प्रेरणा देता है.

उस समय विद्यार्थियों में सदैव इस बात पर झगड़ा चलता रहता था कि त्रियों को शिक्षा देनी चाहिए या नहीं. पी. के. त्री-शिक्षा के प्रमुख समर्थक थे. मुझे भी त्रियों की महत्ता और समानता में जन्म से अविश्वास  नहीं था. मैंने चिंतामणि सम्पादित ‘समाज-सुधार’ और मिल की ‘त्रियों की पराधीनता’ नामक पुस्तकें अपनी समझ के अनुसार पढ़ डालीं, उनकी विशेष बातों को नोट कर लिया, उनके बहुत-से वाक्य रट डाले और युद्ध में भाग लेने के लिए तैयार हो गया.

विद्यार्थियों का एक बहुत बड़ा दल त्रियों को पढ़ाने के विरुद्ध था और उसके नेता श्री नरसिंहाचार्य बड़ौदा में स्थापित ‘श्रेयः साधक अधिकारी वर्ग’ के सदस्य थे. दोनों दलों में निरंतर वाद-विवाद चलता रहता था.

एक बार कॉलेज की ‘वाद-विवाद सभा’ में ‘त्री-शिक्षा’ पर वाद-विवाद हुआ. एक विद्यार्थी ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच कहा- “सौभाग्य से मेरी त्री को पढ़ना नहीं आता और यदि आता होता तो मैं भुला देता!” दूसरे ने कहा- “पुरुष और त्री की समानता कैसी? दोनों को क्यों पढ़ाना चाहिए? दोनों में बहुत अंतर है. पुरुष में गर्दभता मिलाने से त्री बनती है. ‘ही’ में ‘एस’ मिलाने से ‘शी’ बनती है.

यह सारा वाद-विवाद केवल सिद्धांतों के लिए ही नहीं था. बात यह थी कि दो विदुषी त्रियां गुजरात की सर्वप्रथम ग्रेजुएट होकर अपने प्रांत की शोभा बढ़ा रही थीं. वे ही उस झगड़े का कारण थीं.

त्रियों के स्वातंत्र्य-युद्ध में हमें एक अप्रत्याशित लक्ष्य मिल गया. एक झूठी-सच्ची बात यह थी कि जब हमारा फेलो दूसरे कॉलेज में था तब उसने एक सहपाठिनी को ‘शकुंतला’ नाटक का एक श्लोक लिखकर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप उसने उसके भाई के हाथों मार खायी थी. हमारे हाथ में यह ब्रह्मात्र आ गया.

हम भी ‘शकुंतला’ पढ़ रहे थे, इसलिए हमने यह श्लोक याद कर लिया और नहाते, खाते, टेनिस खेलते, कॉलेज की गैलरी में घूमते हम इस श्लोक का पाठ करने लगे.

हमारा यह जप हमारे मंडल के संस्कृत जाननेवालों ने उड़ा लिया. पंड्या काका हर रोज़ खाते वक्त इसे बोलने लगे और ‘नमः पार्वती पतये नमः’ की घोषणा से श्लोक पूरा करवाने के बदले ‘नमः…… यै नमः’ का उच्चारण करते हुए उस विद्यार्थिनी का नाम जोड़कर हमारे जप को सार्थक कर दिया. दूसरे भी इस श्लोक को बोलने लगे. जहां ‘फेलो’ के दर्शन होते वहीं ‘पद्मताम्रौ’ का गुंजन, रट या घोषणा सुनाई देती. इस श्लोक की लोकप्रियता का कारण ‘फेलो’ की भी समझ में आ गया और वह परेशान होकर अपने कमरे में ही घुसा रहने लगा. भूले-भटके कभी हमें देख भी ले तो तुरंत दूसरे रास्ते से चला जाये और अंत में तो इस ‘त्री शिक्षा के विरोधी’, ‘वनिता वात्सल्य विरोधी’ और रूढ़िवादियों में श्रेष्ठ’ के दर्शन भी दुर्लभ हो गये.

साल के अंत में हमने उसे अंतिम बार बनाने का निश्चय किया.

पहली अप्रैल को हमने रात के दो बजे तक गप्पें मारीं और गाने गाये. उसके बाद हमको फेलो के दर्शनों की उत्कंठा हुई. सबसे छोटा होने के कारण मेरे लिए यह निर्णय हुआ कि मैं बिस्तर पर ही बैठा रहूं. बाकी के सब मित्र क्रिकेट की बाउंड्री के बांस लेकर ‘चोर चोर’ की आवाज़ लगाते बाहर निकले. हमारी आवाज़ें सुनकर फेलो, भाईशंकर, छात्रालय के बहादुर लड़के और नौकर लाठी और लालटेन लेकर दौड़े.

जहां आज नया छात्रालय है वहां उस समय खेत थे. इन खेतों और कॉलेजों के बीच एक खाई थी.

चार-चार या पांच-पांच विद्यार्थी मिलकर, खाई को पार करके चोरों को पकड़ने के लिए खेतों में गये. फेलो के सामने भी हमने चोरों का यथासम्भव सच्चा चित्र रखा. मुझे घबराता देखकर या फिर चोरों के मिलने के डर से फेलो और भाईशंकर मेरे पास ही बैठे रहे.

बहुत देर हो गयी, परंतु एक भी चोर पकड़ में नहीं आया.

“भाईशंकर”, फेलो ने कहा, “यह अप्रैल फूल का तमाशा तो नहीं है?”

“और भाई, देखते नहीं? यदि ऐसा न होता तो कनु डर के मारे मर जाता?”

इस शैतानी का अप्रत्याशित परिणाम सामने आया. छात्रालय में चोरी की बात सुनकर प्रिंसिपल ने पुलिस को एक कड़ी चिट्ठी लिखी. चोर कितने थे, कैसे थे, क्या चोरी गया आदि का ब्यौरा हमें देना पड़ा. जैसे ही पुलिस कोई चोरी का माल पकड़ती वैसे ही हमें बुलाया जाता और पूछा जाता कि यह माल हमारा है या नहीं. पहले तो हमें मज़ा आया, लेकिन बाद में हम ऊब गये और हमने यह लिखकर कि हमारी सभी चुराई हुई वस्तुएं मिल गयी हैं, दीवान को अंतिम प्रणाम किया.

बड़ौदा कॉलेज में उस समय पूरी स्वतंत्रता थी. जिसको पढ़ना हो पढ़े, न पढ़ना हो न पढ़े. अध्यापक अपना निष्काम कर्म करते जाते थे.

जब मैं कॉलेज में आया तब टेट साहब प्रिसिंपल थे. वे मितभाषी, सच्चे और कठोर अनुशासन में विश्वास रखनेवाले थे. वे अंग्रेज़ी कविता भी गणितज्ञ की भांति यांत्रिक नियमितता से पढ़ाते थे.

हमारे अंग्रेज़ी के प्रोफेसर छह फुट लम्बे और सुंदर युवक थे. वे पढ़ाने की अपेक्षा हंसी-मज़ाक में ही सारा समय बिता देते थे. उनकी उम्र क्या होगी, यह प्रश्न गम्भीर था. कारण, प्रीवियस क्लास में पहले ही दिन उन्होंने कहा कि डॉक्टर जॉनसन के विषय में उन्होंने छह वर्ष तक अध्ययन किया है. उसी दिन उन्होंने इंटर क्लास में कहा कि फ्रेंच विप्लव का अध्ययन उन्होंने पेरिस में रहकर आठ वर्ष तक किया है. दोपहर बाद उन्होंने बी.ए. क्लास में कहा कि उन्होंने दस वर्ष तक ऑक्सफोर्ड में रहकर शेक्सपियर का अध्ययन किया है. इस कारण हम उनकी उम्र का हिसाब लगाने में ही लगे हुए थे.

हमारे इतिहास के प्रोफेसर दयालु और शांत थे. वे इतने कर्तव्य-परायण थे कि प्रतिदिन साठ मिनट रोम का इतिहास पढ़ाते थे और पूरे साल में पांच-सौ पृष्ठों में से पचहत्तर ही समाप्त कर पाते थे. घंटा बजते ही क्लास में अस्सी विद्यार्थी उपस्थित हो जाते थे, परंतु आधे घंटे बाद केवल वही विद्यार्थी बच रहता था, जिसे उनकी नज़र के सामने बैठने का दुर्भाग्य प्राप्त होता था. घंटा समाप्त होते ही फिर अस्सी विद्यार्थी हो जाते थे इसका कारण यह था कि घंटे के शुरू में और घंटे के आखिर में दोनों वक्त हाजिरी ली जाती थी. इस प्रकार क्लास में रोज़ ज्वार-भाटा आता था. लेकिन उनकी वाणी का प्रवाह अगाध गति से बहता रहता था और यदि कोई उनका अपमान भी करता तो वे उसकी तनिक भी चिंता नहीं करते थे. तापीदास काका की भांति उनका भी विश्वास था कि “लड़के तो आखिर लड़के ही हैं.”

जैसे अकाल-पीड़ित व्यक्ति खाते-खाते नहीं अघाता वैसे ही मैं पढ़ते-पढ़ते नहीं अघाता था. मैंने लिटन, मेरी करेली और ड्यूमा के उपन्यास पढ़े. सर वाल्टर स्काट की रचनाएं भी पढ़ीं, परंतु वे मुझे अधिक अच्छी नहीं लगीं.

मेरे संस्कार पौराणिक थे. उनमें परिवर्तन होता गया. संध्या करना छोड़ दिया और वर्णाश्रम के प्रति अविश्वास हो गया. इसका परिणाम यह हुआ कि जैसे दूध में नींबू की बूंद पड़ने से वह फट जाता है वैसे ही संशय के स्पर्श से मेरे सम्पूर्ण मानस का रूपांतर हो गया.

त्रिकाल संध्या छोड़कर मैंने ‘प्रार्थनामाला’ की प्रार्थनाओं का बोलना आरम्भ कर दिया था. उनके पढ़ने से मुझे बाइबिल के पढ़ने में आनंद आने लगा. मैंने एक बार लिखा था- ‘ईसाई धर्म उतना निर्जीव नहीं है, जितना कि मैं समझता था. महात्मा ईसा आदर्श पुरुष हैं. 1902-3 में मैंने ईसाई धर्म के विषय में खूब पढ़ा. उसमें भी जब डीन फेरार का लिखा हुआ ‘ईसा का जीवन-चरित्र’ पढ़ा तो मेरे मोह का आवरण कुछ हटा. बाद में मैंने अपनी डायरी में लिखा था- ‘ईसाई धर्म में ईश्वर का विचार मूर्खतापूर्ण है. ईश्वर मनुष्य के समान, उसमें भी लड़का और फिर साथ में सिंहासन. ईसाई धर्म में लड़कपन है.’ इससे शिव-पार्वती की पूजा करनेवाले बालक की दो वर्ष की प्रगति का पता चलता है. पीछे ईसा के व्यक्तित्व के प्रति आकर्षण बढ़ा. रेना लिखित ईसा के जीवन-चरित्र’ का मेरे ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा. 1902-1907 की डायरी इसकी साक्षी है. उसमें लिखा है- ‘ईसा मसीह ने मेरे मन पर अधिकार कर लिया.’

पी. के. के साथ दर्शन की पुस्तकें पढ़ने का भी मैंने कुछ प्रयत्न किया. फिर मैंने पेइन की ‘मनुष्य के अधिकार’, मिल की ‘स्वतंत्रता’, मिकेलेट की ‘फ्रान्स की राज्यक्रांति’ आदि पुस्तकें पढ़ीं. इन पुस्तकों के पढ़ने से मेरी वही दशा होने लगी जो राज्यक्रांति के समय फ्रांस की थी. नये विचारों के संघर्ष से पुराने बंधन शिथिल हो गये. फ्रांस की राज्यक्रांति के अध्ययन से मुझे स्वतंत्रता और समानता का पागलपन सवार हुआ. मैं शीघ्र यह समझ गया कि समानता का अर्थ वर्णाश्रम धर्म का विध्वंस है. धीरे-धीरे अंग्रेज़ कलेक्टर और भारतीय डिप्टी कलेक्टर के बीच का भेद भी समझ में आ गया.

रंगभेद के भीतर व्याप्त बुराई का तीखा अनुभव करानेवाली एक घटना मुझे याद है. पिताजी सूरत में जब कलेक्टर से मिलने जाते थे तब हमारी गाड़ी बंगले के अंदर तक जाती थी. भड़ौंच में भी ऐसा ही हुआ करता था. बाद में एक नये कलेक्टर महाशय आये. हमारी गाड़ी को बंगले के भीतर जाने से रोका गया. चपरासी ने कहा कि साहब का ऐसा ही हुक्म है.

पिताजी के क्रोध का ठिकाना न रहा. क्षण भर के लिए मुझे ऐसा लगा कि वे गाड़ी वापस लौटा लेंगे, लेकिन उन्होंने जेब में से रूमाल निकाला, मुंह पोंछा, गाड़ी से उतरे और अंदर गये. गोरों की सरकार थी और पिताजी उसके नौकर थे. मैं समझता था कि हम ऋषियों की संतान हैं. पिताजी कार्यकुशल और ईमानदार थे और स्वभाव से राजाओं के समान थे. इतना होने पर भी एक गोरे शासक के सामने हम उपयोगी होने पर भी दुतकारे जानेवाले कुत्ते की भांति तिरस्कारणीय प्राणी थे.

इस घटना के बाद से मैं अंग्रेज़ी हाकिमों को ‘ब्राआं-द-ब्वा-गिलबेरो.’ कहता था. यह स्कॉट की एक कहानी के दुष्ट-अभिमानी पात्र का नाम है.

इस अपमान द्वारा कलेक्टर ने मेरे पूज्य पिताजी को देव सिंहासन से नीचे उतार दिया था, इसलिए मैं प्रतिहिंसा की भावना से बहुत दिन तक बेचैन रहा. परशुराम ने जिस प्रकार पृथ्वी को क्षत्रियहीन कर दिया था उसी प्रकार मैं भी पृथ्वी को अंग्रेज़हीन करने के खयाली पुलाव पकाने लगा.

इस घटना की स्मृति गहरे घाव की भांति मेरे मस्तिष्क के हिस्से-हिस्से में समा गयी और मेरी दशा ऐसी हो गयी कि जैसे ही मैं रंगभेद देखता था वैसे ही मेरी आंखों से अंगारे बरसने लगते थे.

दिसम्बर 1922 में अहमदाबाद में होनेवाली कांग्रेस का शंखनाद हुआ. पी. के. ने स्वयंसेवक तैयार करने की घोषणा की और मेरे कितने ही मित्रों ने स्वयंसेवकों में अपना नाम लिखाया. कांग्रेस, दादाभाई नौरोजी और फीरोजशाह मेहता के विषय में मैंने बहुत-कुछ सुना था. मैंने ‘एमिनेंट इण्डियन्स ऑन इण्डिया’ नाम की एक पुरानी पुस्तक पढ़ी थी और धीरे-धीरे मेरा घायल स्वाभिमान राष्ट्रप्रेम का स्वरूप लेने लगा था.

लेकिन जब मैं स्वयंसेवक बनने की आज्ञा मांगने भड़ौंच गया तो पिताजी ने इंकार कर दिया. वे पुराने ज़माने के सीधे-साधे हाकिम थे. ‘मैं सरकार का नमक खाता हूं’, उन्होंने कहा.

मेरे मुंह से निकल गया- ‘अंग्रेज़ सरकार क्या विलायत से पैसा लाती है?’ मुझे ‘ब्रीआं-द-ब्वा-गिलबेरो’ और उसके कुत्ते की याद आ गयी. लेकिन जैसे ही मेरे मुंह से ये शब्द निकले वैसे ही मैं घबरा गया.

पिताजी गुस्सा हो गये थे. रात को मां ने  पिताजी को मनाया और निश्चय हुआ कि मैं स्वंयसेवक तो न बनूं, परंतु पिताजी के साथ कांग्रेस से एक दिन पहले होनेवाले प्रदर्शन में सम्मिलित होऊं. पिताजी उसी रात को लौट आवें और मैं कांग्रेस में पहले दिन दर्शक की हैसियत से भाग लूं.

अठारहवीं कांग्रेस के अपने संस्मरणों को मैंने संग्रह करके रखा है- “…उसने जीवन में पहली बार आदमियों की इतनी बड़ी भीड़ देखी और भीड़ में ही उसने अदम्य उत्साह और अपराजेय भावना का अनुभव किया. उसकी दृष्टि में वे सभी आदमी देवता थे, जो देश की स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए एकत्रित हुए थे. उस दिन उसे ऐसा लगा कि इस देश में और ऐसे समय में जीना भी एक सौभाग्य है.

“वह मंच से बिल्कुल दूर पंडाल में आकर बैठा और चारों ओर हजारों हिलते हुए सिर देखे. इतने बड़े स्थान में, इतने बड़े पंडाल में उसे अपनी लघुता का भान और जिस देश की खातिर ये सब इकट्ठे हुए थे उसके प्रति श्रद्धा की भावना जागृत हुई. ‘अपना’, ‘अपने लोग’, ‘अपना धर्म’, ‘अपना देश’, आदि संज्ञाओं से वह परिचित था. ये सब पहली बार उसके मन में केंद्रित हुई और एक सर्वग्राही परम संज्ञा- ‘मेरा देश’- उसके मस्तिष्क में पैदा हुई. वातावरण में हलचल मची और उसने क्षण-भर जीवित शौर्य से उछलते हुए भारत के दर्शन किये. असंख्य मनुष्यों के कोलाहल में भी उसे करोड़ों को एकता के सूत्र में बांधने वाली पवित्र भावना जकड़े रही.

“सहसा गगनभेदी घोष हुआ. दस हजार आदमी खड़े हो गये. हजारों ही हाथों में रूमाल फहरने लगे. हजारों कंठ ‘हुर्रे हुर्रे’ पुकारने लगे.

“सुरेंद्रनाथ बनर्जी पंडाल में आये. सुदर्शन ने अपने हृदय पर हाथ रखा. वह खड़ा न हो सका. बीच के रास्ते पर अनेक व्यक्तियों  के बीच एक काले झब्बे वाला व्यक्ति लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ चल रहा था. वह मुख-मुद्रा, वह दाढ़ी और मस्तक सुदर्शन चित्र में देख चुका था. वही सुरेंद्रनाथ-भारतीय मेज़िनी-कांग्रेस का अवतार!

“सुदर्शन कुछ देख न सका, सुनने की उसमें शक्ति न थी. उसकी आंखें नरमुंडों के समुद्र के उस पार एक व्यक्ति पर लगी थीं. वह व्यक्ति उसके लिए मनुष्य नहीं, देवता था. वह कलकत्ते का प्रोफेसर और नेता न था, वरन क्षण-भर पहले उसे जिस स्वदेश का भान हुआ था उसकी प्रतिमूर्ति था. भारत- काले झब्बे और दाढ़ी चश्मे से शोभित भारत-सिंहासन पर आसीन था.

1902 के सुरेंद्रनाथ बनर्जी का स्थान बाल-हृदय में क्या था, इसे आज का युग शायद ही समझ सके. सुरेंद्रनाथ के बाद तिलक, तिलक के बाद ऐनी बेसेन्ट, ऐनी बेसेन्ट के बाद गांधीजी लोकप्रियता के एकछत्र अधिकारी होते गये हैं. इनमें पहले का प्रभाव अद्भुत था और पिछले तीनों-पत्रकार, विदेशी और स्वदेशी महात्मा की अपेक्षा प्रोफेसर पर विद्यार्थीवर्ग की श्रद्धा स्वभावतः अधिक थी.

‘सुदर्शन केवल साधारण विद्यार्थी ही न था, उसमें बचपन से स्वप्न देखने की बुरी आदत भी थी. सुरेंद्रनाथ उसे स्वदेश के नेता नहीं, स्वदेश की प्रतिमूर्ति जान पड़े. इतने में गान सुनाई दिया-

“बोलो भारत की जय

क्या भय? क्या भय?”

“और उसकी समस्त वृत्तियां इस गान-प्रवाह में बह गयीं. उसकी शिरा झंकृत होने लगी- “क्या भय? क्या भय?”

कांग्रेस में जाने का सबसे पहला प्रभाव मेरे ऊपर पड़ा कि भाषण देने में कई बार असफल होने पर भी मैं दत्तचित्त होकर वाक्चातुर्य पैदा करने में लग गया.

1902 में कॉलेज में अंग्रेज़ी बोलने वालों में सबसे अच्छे पी.के. थे. वे हमारी वादविवाद सभा के मंत्री थे. एक बार ‘शिवाजी’ पर वादविवाद होने वाला था. उन्होंने मुझसे बोलने का आग्रह किया. मैंने दो-तीन पुस्तकें देखीं और पंद्रह-बीस बातें नोट कर लीं. लेकिन जब वादविवाद प्रारम्भ हुआ तो मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे हृदय की धड़कन बंद हो गयी है. मैं जैसे-तैसे खड़ा हुआ. मेरे हाथ-पैर थर-थर कांप रहे थे. माथे पर पसीना बह रहा था. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मेरी स्मरण-शक्ति साथ छोड़ चुकी हो. मैंने कहा- “मेरे मित्र ने अभी-अभी कहा है कि शिवाजी को भवानी माता ने तलवार दी थी. बीसवीं शताब्दी में यह मान्यता बुद्धि के दिवालियेपन की सूचक है.” इतना कहकर मैं बैठ गया. पी. के. ने पीठ ठोकी. नितांत असफल होने से मैं इतना लज्जित हुआ कि दो-चार दिन तो अकेले ही कॉलेज की छत पर बैठकर आकुलता का अनुभव करता रहा. उसके बाद मैंने रखी हुई पिताजी की बचपन की पुस्तक ‘चेम्बर्स वाक्चातुर्य’ पढ़ना आरम्भ किया. उसमें दिये हुए पेट्रिक हेनरी, चेथाम, शेरीडन, बर्क आदि के वाक्यों को रट डाला.

अहमदाबाद में सुरेंद्रनाथ बनर्जी का भाषण आरम्भ करने का ढंग देखकर मैं उनके बोलने के ढंग पर मुग्ध हो गया था. उनके द्वारा किया गया पूना का वर्णन और स्वर्गीय रानाडे के विषय में कहे गये शब्द अब भी मेरे कानों में गूंजते हैं.

उनकी आवाज़ बड़ी प्रचंड थी और दूर से सुनकर वह ऐसी मालूम होती थी जैसे बादल गरज रहे हों. उनकी भाषा विक्टोरिया के युग की और शब्दाडम्बरपूर्ण होने पर भी एक-सी थी. वे भाषण लिखकर उन्हें रट डालते और बाद में घंटों अबाध गति से लय के साथ बोलते जाते.

इस भाषण को सुनने के बाद ही मैंने वाक्चातुर्य उत्पन्न करने की व्यवस्थित योजना तैयार की और ‘बेल्स लैटर्स’ में से डिमास्थनीज़ और सिसेरो के प्रकरणों का अध्ययन करना आरम्भ किया. मैं सुरेंद्रनाथ और दूसरे भारतीय नेताओं के भाषणों को रटने लगा. भिन्न-भिन्न अवसरों के उपयुक्त वाक्यों को लिखकर मैंने याद कर लिया. शाम को सात बजे कॉलेज के अंधकारपूर्ण खाली हाल में सुरेंद्रनाथ की भांति भाषण करना सीखने लगा. भड़ौंच जाते समय नर्मदा के पुल के नीचे आवाज़ तेज़ करने के लिए ज़ोर से चिल्लाता और शीशे के सामने खड़ा होकर अभिनय, आवाज़ और मुख के भावों का समन्वय करता. शेक्सपियर के नाटकों के भिन्न-भिन्न पात्रों के रूप में अपने को रखकर मैं उनका अभिनय करने लगा.

बड़ौदा कॉलेज में बातचीत में गुजराती का प्रयोग होता था, इसलिए मुझे अंग्रेज़ी में बात करना नहीं आया, परंतु इस परिश्रम द्वारा मैं आडम्बरपूर्ण भाषा में भाषण देने लगा. भाषणों को रटकर बोलने के कारण मेरी भाषण-शैली में कृत्रिमता भी आ गयी.

1906 तक कॉलेज में मेरी गणना अच्छे बोलने वाले विद्यार्थियों में हो गयी.

(क्रमशः)

अगस्त   2013

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