आधे रास्ते (तीसरी क़िस्त)

ब मेरा जन्म हुआ तो मुझे बड़ा लाड़-प्यार मिला. छह लड़कियों के बाद मैं ही एक लड़का था. सबको प्रतीक्षा कराते-कराते मैंने थका डाला था. मेरे आते ही पिताजी तहसीलदार हुए. फिर जब मैं छोटा था तब मैंने सबके मन में यह धारणा जमा दी थी कि मेरे भीतर बड़ी भारी चतुराई है. लेकिन यह मुझे पता नहीं है कि मैंने ऐसा कैसे किया था.

मैं बिना देवताओं की कृपा के स्वयं ही मृत्युलोक में आ गया. मां ने पुत्र की लालसा से अनेक बार महादेव की मानता मानी थी. लेकिन किसी की दयावश आना मुझे रुचा नहीं. मैं कैसे चला, कैसे गिरा, कैसे शेर बना, कैसे स्याही की मूंछें लगायीं आदि पराक्रमों के संग्रह की वृत्ति यदि प्रत्येक मां-बाप में न हो तो ऐसे छोटे, गंदे, चियाऊं-मियाऊं करते हुए मनुष्य के बच्चे को कौन पाले! लेकिन सब-कुछ होते हुए भी एक बात अवश्य है और वह यह कि दुलारे बेटे की देख-भाल करने के लिए सभी सकारण या अकारण कुछ-न-कुछ करते ही रहते और इसके कारण मुझे भी यदि ऐसा करने में चूक जाता तो मेरा दम घुटने लगता, जीवन निस्सार प्रतीत होता और वैराग्य के प्रति प्रेम उत्पन्न हो जाता.

यदि मेरी पहली दुश्मनी किसी से हुई तो अन्न-देव से. खाने का वक्त मेरे रोने का वक्त होता था. मां, तीनों बहनें और मुझे प्यारे करने वाले स्नेह जुलूस-सा निकालते थे. एक खाने की वस्तु लेता था, दूसरा घंटी लेता था, तीसरा मुझे गोदी में लेता था और चौथा सीटी बजाता था. उसके बाद हम दो-चार कमरों में या कभी-कभी एक-दो घरों में घूमते थे. ‘भाई’ को चुप रखने के प्रयत्न होते थे. इसमें कभी ‘भाई’ चुप हो जाते थे और अनजाने में कौर निगल जाते थे. यह दुश्मनी आज तक चली आती है.

मुझे प्रथम स्मृति एक भयंकर आधी रात की है. एक छोटे-से बिछौने पर मैं ज़मीन पर सो रहा हूं. बिछौने पर एक तम्बू जैसी मच्छरदानी है. मेरे शरीर के आस-पास मानो अंगारे हैं. मेरा छोटा-सा सिर फटा जाता है. आंखें ज्वर-प्रकोप से खुलती नहीं. लुप-लुप-लुप… कोई मेरी कनपटी में हथौड़े मार रहा है.

मेरे कान में एक परिचित आवाज़ आती है. छोटा-सा कोमल हृदय धड़क उठता है. मेरे मस्तक पर हाथ फिरता है– सुकुमारता से; मेरे हृदय पर फिरता है– प्रेम से. मैं पहचानता हूं इस स्वर को- इस स्पर्श को, वर्षों तक इसकी अनिर्वचनीय ममता का सौभाग्य मुझे मिला है. मेरे मुख से निर्बल, मंद और कांपती आवाज़ निकलती है– “मां!” “ओ भाई! मैं आती हूं, अच्छा!” अश्रुसिक्त स्वर उत्तर देता है.

मैं बड़ी मुश्किल से आंखें खोलता हूं. टेबल पर लैम्प मंद-मंद जलता है. मेरे पास बिस्तर पर पिताजी और माताजी आमने-सामने बैठे हैं. दोनों धीरे बातें कर रहे हैं. दोनों की आंखों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही है. मेरे मस्तिष्क में प्रश्न उठता है– ‘ये सब क्यों रोते हैं?’ लेकिन मेरा दुर्बल शरीर मूर्च्छा के वश में हो जाता है. मेरी आंखें बंद हो जाती हैं. सवेरे मैं उठता हूं और वैसे ही ‘मां-मां’ पुकारता हूं. शीघ्र पास के बिस्तर से उठकर पिताजी आते हैं. ‘क्यों बेटा?” “मां-” “वह तो आयी थी पर चली गयी. कोई बात नहीं, मैं हूं न?” कहकर वे मुझे हृदय से लगा लेते हैं.

इस रात की भयंकर स्मृति मुझे चिरकाल तक बनी रही. यह 1894 की बात है. पिताजी चोराशी के तहसीलदार थे. हम सूरत में बड़े मंदिर के पास रहते थे. उन पर अपार विपत्ति आ पड़ी थी. सत्रह और उन्नीस वर्ष की दो बड़ी लड़कियां कुछ ही महीनों में विधवा हो चुकी थीं. मां शोक के कारण भड़ौंच में थी और इकलौता बेटा मृत्यु-शैया पर पड़ा था. लोक-लाज ठुकराकर और शोक को भूलकर मां रातों-रात आ गयी.

मैं भी उसे सरलता से छोड़ने वाला न था. मैं स्वस्थ हो गया.

प्रसिद्ध ग्रीक कहानी है. पेल्युस राजा के यहां दावत थी. उसमें वैरदेवी ने एक फल रखा. ऊपर लिखा था– ‘सर्वोत्तम सुंदरी के लिए.’ उसके लिए पेरिस के न्यायाधीश को नियुक्त किया गया. उसने वह फल वीनस-रति को दिया. उस देवी ने उसे सुंदरतम त्री देने का वचन दिया. उसको लाने के लिए ग्रीक ट्राजनों के साथ बारह वर्ष तक लड़कर मर गये. ट्राय हारा और मारा गया. ग्रीक जीता- परंतु दीप्ति-हीन हो गया.

टीले के ऊपर मैं वैर का ऐसा ही फल होकर आ पड़ा.

सारी जायदाद बड़े काका के अधिकार में थी. वे अपने घर में निश्चिंतता से रहते थे. हवेली के पिछले भाग में तीसरी मंजिल पर रामभाई काका और पहली मंजिल पर बूआ रहती थीं. दीवानखाना, आगे का दालान, बीच का चौक और उसमें का महादेव जी का मंदिर सम्मिलित धर्मशाला जैसा था. हम तो बाहर रहते थे. कभी-कभी आते भी थे तो छोटे घर में रहते थे– नीचा और पुराना घर बिच्छुओं और छिपकलियों से भरा था; जीना चढ़ते हुए या तो पैर फिसलता या उसकी खिड़की से टकराता.

लेकिन सब भाइयों में लड़के बड़े काका के यहां ही थे. इसलिए ज़मीन की अधिकांश आमदनी भी वे लेते थे और सबकी मुखियागिरी भी वे ही करते थे. सम्मिलित कुटुम्ब की दासता जिसने देखी हो वही उसकी कल्पना कर सकता है और जिसने देखी हो वही उसका वर्णन कर सकता है. लेकिन मैं आया. कुछ महीने में चंदा काका के भी लड़का हुआ. पिताजी ने सोचा कि अंतिम बार के लड़के के लिए मैं यदि शीघ्र-से-शीघ्र प्रबंध नहीं करूंगा तो इसका क्या होगा? उन्होंने अपना हिस्सा मांगा– चालीस वर्ष बाद बड़े काका के कार्यभार में हाथ डालने का प्रयत्न हुआ…! गजब हो गया.

युद्ध के नगाड़े बजने लगे, घर-घर अलग-अलग शंखनाद हुआ. बादलों में गड़गड़ाहट की प्रतिध्वनि हुई. स शब्दस्तुमुलो भवत्! टीले पर यादवास्थली का प्रारम्भ हुआ.

पहले तो युयुत्सुओं की छावनियां पड़ीं- एक हमारी और हमारे पास ही अधुभाई काका की. उनके हिस्से में भी गड़बड़ थी, इसलिए बड़े काका से उनकी भी खटपट थी. छोटी बुआ कोमल और ममतामयी थी. पिताजी से उन्हें बड़ा प्रेम था. वह यहां से वहां जाय, सामनेवालों की गाली खाती जाय और पिताजी तथा माताजी के सामने आंसू बहाकर उनसे आश्वासन मांगे. अधुभाई काका बड़बड़ाते– “इस बहरे की आ बनी है.” जवाब में बहरे बड़े काका हेकड़ी के साथ कहते– “मेरे कान बहरे हैं पर कच्चे नहीं.”

विरोधी दल में उनकी छावनी बड़ी ही जबर्दस्त थी. उनका कुटुम्ब बड़ा था, हाथ में सारी जायदाद थी और जाति की मुखियागीरी थी.

दूसरी छावनी रामभाई काका और उनकी बहादुर त्री की थी. उनको लड़ पड़ने के लिए कारण की आवश्यकता न थी; पर उसमें यह कारण भी आ मिला था. हिस्सा तो चाहिए ही था, परंतु माणिक भाई के प्रति उनके द्वेष की कोई सीमा न थी. तीसरी ओर घोर दुःखदायी रुखीबा की छावनी थी. चंदा काका को साथ लेकर उसने चारों ओर आग बरसाना शुरू किया.

फौजों की कवायद हुई. महारथियों की मंत्रणाएं चलीं. संधि कराने वालों की दौड़-धूप शुरू हुई. टीले के टुकड़े होने को थे.

“बड़े आये हिस्सा मांगनेवाले! शर्म नहीं आती. इतने वर्षों में क्या कम मिला है भाई? क्या माणिक भाई को कम तनख्वाह मिलती है? हिस्सा! हिस्सा कैसा? उस बीमार छोकरे का? अरे उसे जीने तो दो; कल तो वह मर रहा था! अच्छा है बड़ा हो, सौ वर्ष का हो, फले फूले. चंदालाल अभी बच्चा है (तीस वर्ष का होगा). हिस्सा! हिस्सा! हिस्सा क्या? अरे जब चाहिए तब बात कर लेना पर अभी किसलिए? किससे कहूं? माणिक भाई तो बेचारा अच्छा आदमी है, लेकिन वह-वह चिमन मुन्शी की छोकरी ऐसा है कि तोबा!

बड़े काका की बात बिलकुल ठीक थी. पिताजी स्नेही, भोले दिल के और बात को सुनकर भी अनसुनी-सी कर देने वाले थे. बड़े काका उन्हें बातों में ले लेते और वे आ जाते. मां की सत्यता और व्यवहार-कुशलता अद्भुत थी. वह बड़े काका की सब चालें समझ जाती. आधी उम्र तक उसने एकत्र रहने की पीड़ा सही थी, लेकिन अब वह नहीं सहना चाहती थी. विधवा लड़कियां किसके सहारे रहेंगी? एकमात्र पिछले लड़के का क्या होगा? लेकिन वह स्वयं तो बड़े काका के साथ बात कर नहीं सकती थी, इसलिए उसका सारा समय पिताजी को सभी प्रकार के दांव-पेच समझाने में जाता था.

जब मैं खेलता-खेलता बड़े काका के घर में जाता तो वे मुझे बड़े प्रेम से बुलाते– ‘अरे, इधर आ, भय-तीजे!’

किसी ने भतीजे के इस समास-विग्रह के सम्बंध में पूछा तो उन्होंने कहा– “पहला भय यम का, दूसरा भाई का, तीसरा भय भतीजे का. इसके आते ही माणिक भाई ने हिस्सा मांगना आरम्भ कर दिया.”

विग्रह का प्रथम छापा मारा गया. बड़े काका ने पिताजी को चिट्ठी लिखी– “सब तैयार है; तुम्हारे आने की देर है.” पिताजी मुश्किल से छुट्टी ले लेते हैं और हम भड़ौंच आते हैं. पहले दिन बड़े काका मां से मिल जाते हैं, हंसकर मीठी बातें कर जाते हैं, पिताजी उनसे मिल आते हैं और ऊपर-ऊपर की बातें होती हैं. “कुछ ठहरो तो सही मेरे भाई! हिस्सा क्या कहीं भागा जाता है? तैयार है, हमारे बैठने की देर है.”

दूसरे दिन बड़ी कठिनाई से भाई से भाई मिलते हैं और बिखर जाते हैं. तीसरे दिन फिर मिलते हैं और असली बात पर आते हैं. बड़े काका कुछ कहते हैं, रामभाई काका या बूआ के विषय में धीरे-से एक शिगूफा छोड़ते हैं और सब सुलग उठते हैं. रामभाई काका से कोई कुछ कहे तो वे कागज़ फाड़ डालें, स्याही उंड़ेल दें. सब खड़े हो जाते हैं. चारों ओर सिंहों की गर्जना होती है. प्रत्येक के घर से आकर त्रियां पतियों को घर में ले जाती हैं. घंटों तूतू-मैंमैं होती है. सबके द्वार बंद हो जाते हैं. पिताजी की छुटी खत्म हो जाती है और वे सूरत लौट आते हैं.

“बैठ, बैठ; रामभाई! तेरे लड़का तो है नहीं फिर इतना लोभ क्यों?” एक बार बड़े काका ने हंसते-हंसते कहा– “महादेवजी को पूजना था तो पूरी तरह पूजते!”

काका उठ गये. “अच्छा, अच्छा. महादेव तुम्हारे अकेले के हैं!” जो कुछ कहा जा सकता था वह उन्होंने कहा, लिखे हुए कागज़ फाड़ डाले और काकी को रुलाया. बाद में वे टंकी पर गये, दो घड़े कंधे पर रखे और भीगी धोती से “बम-बम भोलानाथ” करते हुए मंदिर में आये. “हर-हर भोलानाथ!” महादेव को सम्बोधित करके वे बोले– “महादेवजी, तुम्हारी पूजा करते-करते मैं तंग आ गया और तुमसे एक लड़का नहीं दिया गया? एक भी नहीं? तुम अपने मन में समझते क्या हो?” उन्होंने वहां पड़े हुए चंदन से चंद्रशेखर को मारना शुरू किया– “ले, मज़ा चख ले. एक लड़का भी नहीं दिया गया?” चंद्रशेखर महादेव के सुंदर लिंग पर का एक निशान इस घटना की आज भी साक्षी देता है.

रुखीबा को गुस्सा करना भी सरल था. उसके पास कुछ मिल्कियत है, इसलिए उसके कारण ही तकरार होती है– बड़े काका ऐसा कहते और झगड़ा खड़ा हो जाता. कोई यदि यह कहता कि इतना बड़ा चंदालाल बहन का मारा हुआ है तो इसी पर झगड़ा खड़ा हो जाता. वह चबूतरे पर आ बैठती और वाणी का विसुवियस फट निकलता. मैंने सब कुछ स्वाहा कर देने वाली अग्नि की लपटों का प्रवाह देखा है, परंतु घंटों तक  बूआ के मुंह से निकलते हुए वाणी के प्रवाह के सम्मुख विसुवियस चाय की केटली के समान लगता है– तुम्हारे रोम-रोम को जला दे; तुम्हारे नाते-रिश्तेदारों को खड़े-खड़े सुलगा दे; तुम्हारे रीति-रिवाज, विशेषता और स्वाभिमान को चीरकर उसमें मिर्च भर दे और प्रवाह ज्यों-का-त्यों अस्खलित तथा अथाह बना रहे; सब थककर  किनारा कर जायं तभी रुके. अद्भुत वाक्चातुर्य वह आज के युग में होती तो क्या करती? गगज्वाइंट पार्लमेंटरी कमेटी में जाती.

एक बार किसी ने कहा कि जब तक रुखीबा जीती है तब तक शांति नहीं होती. बस फिर क्या था! बूआ दिन-भर फूल बिखेरती रही– “मैं मरनेवाली नहीं हूं. मैं तो काल का कौआ खाकर आयी हूं. बंगले की छत पर खड़ी रहूंगी और देखूंगी कि करसनदास मुन्शी के वंश में कोई जीता तो नहीं; उसके पश्चात ही मरूंगी.”

झगड़ा चाहे जिस कारण से हो पर उसका उत्तरदायित्व सदैव मां के ऊपर आकर पड़ता था. उसका दोष केवल इतना ही था कि वह चिमन मुन्शी की लड़की थी; असली वैष्णविणी थी, यह भी दोष था; माणका भाई को वश में कर लिया, यह भी दोष था. एक लड़के की मां बन गयी यह आप; दो पैसे हाथ में आये, यह गुनाह; लड़कियां विधवा हुई, यह बहुत ही अच्छा हुआ; शांत और गम्भीर थी, यह कलंक की बात थी. इस चतुर मां की लड़की को किसी ने ऊंचे स्वर से बोलते नहीं सुना था; उसे पढ़ना आया, वह तो कुटुम्ब पर पड़ी हुई सबसे बड़ी विपत्ति थी.

इस सब बातों का लक्ष्य मेरी मां छोटे घर में काम करती जाती और टप-टप आंसू गिराती जाती; स्वयं अपमान से आहत होती जाती पर हमें धीरज बंधाती जाती. मेरी बड़ी बहन में टीले का असर था, इसलिए वह कभी-कभी जवाब दे उठती. लेकिन मां को स्वाभिमान बहुत प्रिय था. ऐसा स्मरण नहीं कि वह किसी से ऊंचे स्वर से बोली हो. मैं तो नितांत कायर था. गर्जन-तर्जन देखकर मेरी हिम्मत टूट जाती और मैं किसी के पास छिप जाता. बहुत होता तो विचार करता कि एक दिन महादेवजी की तपश्चर्या करके ऐसा शत्र ले आऊं कि जिससे परशुराम की भांति सबके सिर काट दूं. कभी जब पिताजी गुस्सा होते तो उनका गोरा मुख लाल हो जाता; आंखों से अंगारे बरसने लगते. उनकी आवाज़ उसमें टीले की भंयकर गर्जना थी– सबको दबा देती. वे थोड़ी देर तक क्रुद्ध होते थे, परंतु दी हुई धमकी पर तुरंत अमल करते थे. परिणामस्वरूप सब उनसे डरकर चलते थे. “रहने दो माणका भाई का स्वभाव बिगड़ गया है,” बड़े काका हंसकर समझाते. रामभाई काका तीसरी मंजिल पर और बूआ अपनी कोठरी में घुस जाती. मैं ही अकेला बहादुर बन जाता. मैं पिताजी के पास थोडी-सी दूर पर खड़ा रहता और यह सोचकर खुश होता कि जो कुछ वे बोल रहे हैं वह मैं ही बोल रहा हूं.

इस विग्रह का दूसरा अंक आरम्भ हुआ. पिताजी ने सूरत की अदालत में दावा दायर किया– हिस्सा दो और हिसाब बताओ. गालियों की वर्षा हुई, परंतु उसमें भीगती मेरी मां साहस के साथ अभागी पुत्रियों के दुःख को दूर करने में व्यस्त थी. बड़े काका समझ गये कि इस प्रकार काम नहीं चल सकता. माणका भाई को ठंडा करना चाहिए. कागज़ लिखे– “भाई, मैं कब ना कहता हूं.”

सूरत में पिताजी के पास मैं अकेला रहता था. एक रात को अचानक बड़े काका आ धमके. वर्षों से जिसने टीला नहीं छोड़ा था उसने आज छोड़ा. पिताजी ने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया. कोई शरण में आवे तो उसने मन की बात करनी चाहिए. निश्चय हुआ कि पिताजी सब-कुछ छोड़ दें. सलाह देनेवाली मां मौजूद नहीं थी. कौल-करार हुए– “दावा अधुभाई काका की पंचायत में भेजा जाय. पुराना हिसाब रहने दो मेरे भाई! छोड़ो, घी कहां गया; खिचड़ी में. इसका दुःख क्या! घर तो हम बैठकर बांट लेंगे. ज़मीनों की चिट्ठियां डाल लेंगे. फिर क्या है? माणका भाई.’ तू कहेगा वही होगा. कनु तेरा लड़का है तो क्या मेरा नहीं है? जैसा मेरा अचु है वैसा ही मेरे लिए कनु है. और देख तो सही यदि मैं कहूं कि मुझे इतना चाहिए और वह मुझे नहीं दे तो तू क्या करेगा.” पिताती संतुष्ट हो गये.

जब मां ने यह बात सुनी तो उसके असंतोष की सीमा नहीं रही.

लेकिन पिताजी दृढ़ रहे. जो कुछ होगा, देखा जायगा. आखिर तो मेरा मां-जाया भाई है. उसका कुटुम्ब भी बड़ा है. हमारे तो एक ही लड़का है.’ और सदा की भांति आश्वासन देने लगे– “चार हाथ का स्वामी जब देने लगेगा तो हम दो हाथों से सम्भाल कैसे सकेंगे? और चारों हाथों से वह लेने लगेगा तो हम दो हाथों से बचा कैसे सकेंगे?”

मातृ-प्रधान और पितृ-प्रधान वृत्तियों का यह सनातन विरोध है. त्रियों को पिता और संतान प्रिय होती है; पुरुष को कुल प्रिय होता है. एक अपने जने हुओं को देखती है, दूसरा अपनी मां के जने हुओं को नहीं भुला सकता. त्री वृत्ति को कुचलकर पुरुष-वृत्ति की स्थापना के सिद्धांत पर सम्मिलित कुटुम्ब की रचना हुई है. परिणामस्वरूप त्री की कुचली हुई वृत्ति बाहर आने का प्रयत्न करती हुई तथा अस्वाभाविक विरोध उत्पन्न करती हुई चली जाती है– अश्रुधारा प्रवाहित करती हुई; हृदय और जीवन के टुकड़े करती हुई. जब तक इस विरोध का शमन नहीं होता तब तक कुटुम्ब सुखी नहीं रहता.

घर का बंटवारा हुआ. मां ने कहा– “चलो, किसी दूसरे मुहल्ले में, कोई अच्छा-पूरा घर लेकर रहें. पिताजी ने साफ़ इन्कार कर दिया. मुन्शी का टीला छोड़कर जाऊं? ईश्वर ने मुझे अच्छी स्थिति दी है तो क्या किशनदास मुन्शी की कीर्ति को बढ़ाने के बदले घटाऊं? और अपने भाइयों से मिलने आना हो तो क्या पगड़ी पहनकर आऊं? नहीं. हवेली का अगला भाग– बैठक, दालान, तीसरी मंजिल- कोने का भाग- पिताजी ने रखा. महादेवजी कौन लें? पिताजी ने मांग लिए, “मेरे कुल देव हैं; टीले के अधिष्ठता हैं!”

उन्होंने सुख का अनुभव किया– वे टीले के स्वामित्व और गौरव के धनी बने.

लेकिन बंटवारा पुरानी रीति से हुआ. लड़ाई-झगड़े के लिए जितनी अधिक गुंजाइश रखी जा सकती थी उतनी रखी हुई. यह दरवाज़ा सबका, यह टंकी सबकी, लेकिन उस दालान में यह जाय, वह न जाय.

ज़मीनों का बंटवारा हुआ. अकेले बड़े काका को ही ज़मीनों का हाल मालूम था, इसलिए उन्होंने स्वयं ही चार भाग किये. “बराबर हिस्से?” “हां. क्या मैंने कभी भाइयों के साथ कपट किया है?” चारों भागों की चार चिट्ठियां हुई. मध्यस्थ की देख-रेख में चिट्ठियां चंद्रशेखर महादेव के आगे डाली गयी. बड़े काका के छोटे लड़के अधुभाई को ईश्वरीय अंश समझकर उसके द्वारा चिट्ठियां उठवायी गयी और इस प्रकार ज़मीनों का बंटवारा हुआ. पंचायतनामा लिखा गया.

दो-चार दिन में बात खुली और रुखीबा को मालूम हुई. बड़े काका ने चार भाग किये. पहला उपजाऊ, मंहगी और अच्छी आयवाली ज़मीन का; और चौथा, बिल्कुल दूर-दूर और पथरीली, ऐसी ज़मीन का जिसका न तो कहीं पता चलता था न जिसका नम्बर ही मिलता था. फिर पहला बड़े काका को, दूसरा पिताजी को, तीसरा रामभाई काका को और चौथा चंदा काका को मिला था.

पंचायतनामा लिखा गया– भाग हो गये.

विग्रह का तीसरा अंक आरम्भ हुआ. पंचायतनामे के अनुसार मिल्कियत और वस्तुओं का बंटवारा करना शेष रहा.

क्या यह दरवाज़ा बंद होगा? होगा– नहीं होगा. एक बंद करता, दूसरा ताला तोड़ता. सब लड़ने चले. तूतू-मैंमैं और गाली-गलौज हुई.

क्या इस चबूतरे पर पाखाना बनेगा? बनेगा– नहीं बनेगा. एक बनाता दूसरा खोद डालता. पुलिस में रिपोर्ट की जाती. सिपाही आते. ज़मीन ली जाती. रुखीबा सिपाहियों पर गर्म पानी डालती.

टंकी में से पानी कैसे लिया जायगा? घड़ा किसका? रस्सी किसकी? पहले कौन लेगा? कुटुम्बी ही ले सकेंगे कि नौकर भी?

झगड़ा– फसाद– दरवाज़ों और खिड़कियों का खुलना तथा बंद होना- गाली-गालौज– रोना-पीटना– यह रोज का काम था.

दूसरा प्रश्न आया. जाति का मुखिया कौन हो? पंचायत का हिसाब क्यों न दिया जाय? ठाकुर (नरभेराम के वैरी शंभुराम ठाकुर के वंशज) तो टीले की मुखियागीरी को मिटाने पर तुले थे. उन्होंने यह बात उठायी. घर-घर भाइयों, सास-बहुओं, बहनों और भाइयों के बीच बैर बंधा. कौन किससे पक्ष का– फरसु मुन्शी के या माणक मुन्शी के? बड़े काका को कौन-पा सकता था? किसकी मजाल थी कि उनके सामने उनसे हिसाब मांगता?

आज के आदमी को पंचायत का अर्थ समझने में देर लगेगी. कोई साधारण-सी भी बात हो. किसी बड़े आदमी को किसी से कुछ शिकायत हो कि एक-दो वृद्ध बड़े काका से मिलते या वे उनको बुलाते. दोपहर को आदमी घूमता– “सब भाई दीया-जले भृगुभास्कर के मंदिर में इकट्ठे हों. आज रात को पंचायत होने वाली है…”

एक बार किसी ने कुछ किया– क्या, यह याद नहीं. बड़े काका ने खबर भिजवायी. एक मुहल्ले ने दूसरे मुहल्ले से लड़ना शुरू किया. चर्चा चली. ‘यह मुखिया-सा… कौन है? …जाति तो गंगा का प्रवाह है’ ‘…आज देखना! अधुभाई सरकार और माणक भाई दोनों गांव से आये हैं. समुभाई मधुभाई ठाकुर बड़ौंदे से आने वाले हैं. आज अवश्य मार-पीट होगी.’ ‘…अरे, इस बहरे की क्या बिसात है? पचास वर्ष से पंचायत का हिसाब लिये बैठा है.’ ‘…अरे, रहने दे, रहने दे! तूने आजकल के माणक मुन्शी को नहीं देखा. दिमाग में जो कुछ फितूर है सो सब निकल जायगा?’

रात होते ही नये मंदिर के चबूतरे पर ठठोली करने वाले आने लगे. नाटक की भांति सीटियां बजने लगीं. रास्ते पर जवानों की टोलियां फिरने लगीं.

दस बजते ही अनेक वृद्ध आकर आसपास के चबूतरों पर बैठ गये. नये मंदिर में दरियां बिछायी गयी. दीप जलाये गये. ठठोली करने वालों ने घंटे बजाये और बकरे की बोली बोल पार्वती को रिझाने का प्रयत्न आरम्भ किया.

बारह बजे. पिताजी अधुभाई काका के पास जाकर बैठे. हमारे पक्ष के नेता भी आकर बैठे. ‘जब फरसुभाई जाय तब जाना.’ बड़े काका के यहां उनके पक्ष के नेता आये.

मां, बहनें और मैं कांपते हृदय से यह सब देखने के लिए मंदिर के सामने पड़ने वाली बैठक की खिड़की में बैठे.

एक बजा. बड़े काका अपने चेलों को साथ लेकर बाहर निकले. हमें सुनाने के लिए वे ज़ोर से कह रहे थे– “देखता हूं कि किसने अपनी मां का दूध पिया है, जो मेरे सामने बोले.”

हम सुन सकें, इतनी धीमी आवाज़ में मां ने कहा– “तुमने और दूसरे किसने?”

अधुभाई सरकार रसाले के साथ उतरे. सबसे आगे वालसीट के दो दीये थे. पीछे मोरार था, हाथ में पीकदान लिये. उसके पीछे सरकार– पगड़ी और अंगरखे में, कंधे पर सफेद शाल डाले हुए (पंचायत के समय टीले के मुन्शी मुखियागीरी के रोब में कोट नहीं पहनते थे), साथ में पिताजी, माधुभाई ठाकुर आदि. पीछे कोदर-ऊंचा, मोटा-ताजा, हाथ में पान की डिबिया, तकिया और मसनद लिये.

दोनों पक्ष पहुंच गये यह जानकर रास्ते में खड़े हुए और चबूतरे पर बैठे हुए भार्गव नये मंदिर में दौड़े. महादेवजी के सामने बनायी हुई बैठक के आसपास युवक बड़े हुए; दरी पर तीस-चालीसेक ‘पगड़ियां’ बैठीं. बीच में एक ही तकिया था– उस पर बड़े काका बैठे. कोदर दौड़ा, पास ही गद्दी बिछाकर तकिया रखा और उस पर सरकार बैठे. पास ही पिताजी बैठे, शंभुराम कोतवाल की प्रतिष्ठा के धनी जमुभाई और माधुभाई ठाकुर भी पास बैठे.

बड़े काका तीव्र दृष्टि से सबको देखने लगे. सब शांत हो गये.

“लड़को, बैठ जाओ!” सरकार ने आज्ञा दी.

“अब कहो,” बड़े काका ज़ोर से अधिकारी स्वर में बोले– “क्या कहना चाहते हो?”

“पंचायत हिसाब मांगती है,” पुत्र ने बड़े काका के कान में मंत्र फूंका.

“लड़के,” फरसु मुन्शी विकराल रूप में गरजे– “किसका लड़का है? बिना पगड़ी पहने आया है और बोलता है? जा अपने बाबा से कह कि वह पगड़ी दिलावे, उसके बाद आना. जाति की मुखियागीरी करने आया है– क्या मुंह लेकर?”

‘पगड़ी पहनकर आ’ ‘अपमान… पंचायत में बोलता है’, ‘अभी दूध के दांत भी तो उखड़े नहीं हैं’, ‘फरसु मुन्शी का दुश्मन है’, ‘अरे, चार बेटों का बाप है’, ‘चुप रह’– ‘चुप रह’– ‘हो, हो, हो.’ चीख-पुकार मची. पीछे से लड़कों ने सीटियां बजायीं. अधुभाई काका गरजे. ‘क्या हम किसी से कमज़ोर हैं?’ वे खड़े होने को हुए.

“फरसु मुन्शी ने पंचायत का अपमान किया है,” हमारे दल का एक लम्बा-तगड़ा मास्टर खड़ा होकर ज़ोर-से बोला.

“बैठ! बैठ!” तिरस्कार से बड़े काका ने कहा– “बड़ा आया अपमान वाला! सारी   सारी जाति को तंग कर डाला है.”

अधुभाई काका ने कहा– “मास्टर, नहीं बैठोगे?”

“क्यों, माणकभाई के दल में रहकर बहुत घमंड हो गया दीखता है?” बड़े काका ने व्यंग्य किया.

अधुभाई काका ने आस्तीन चढ़ाई. बड़े काका ने हाथ में डंडा लिया. भाई लड़ पड़े. सब एक साथ बोल उठे– “क्या समझते हो? –रहने दो- मुखिया होगा अपने घर का! किसी का अन्नदाता थोड़े ही है! …शांति रखो. …हे भाई क्या तुम्हीं यह शोभा देता है? …फरसु मुन्शी के बाप की भी चिंता नहीं है! …अधुभाई सो गये. …माणक मुन्शी पैसेवाला है तो अपने लिए– मारो मारो– हर-हर महादेव…”

किसी ने बीच में ही दीपकों को ज़मीन पर गिरा दिया. हो-हो होने लगी.

लोग हाथपाई पर आ गये. लड़के बकरे की बोली बोलने लगे. कादेर और मोरार सरकार से चिपट गये. बड़े काका अपने लड़कों को सम्भालने लगे.

पंचायत भंग हो गयी. जो जिससे पीटा गया, पीट लिया. मास्टर प्याऊ में घुस गये. एक भाई मंदिर के ढोल को फाड़कर उसी में छिप गये. दूसरे ने भांग की तरंग में डंका लेकर शंकर जगाने के उद्देश्य से उस भाई के सर पर ढोल बजाया. एक मज़ाक करनेवाले ने जूतों के जोड़े लेकर कुंए में डाल दिये. शिवजी के सभी घंटे बजने लगे. ‘हर हर महादेव’ की ध्वनि गूंजती रही. बड़े काका बाहर आये, कादेर और मोरार ने सरकार को उठा लिया. पिताजी भी बाहर आये.

सवेरे देखा तो लालटेन के शीशे के टुकड़े, सिमटी हुई दरी और फटा हुआ ढोल अक्रांत रणभूमि में पड़े थे.

दूसरे दिन फूट पड़ गयी. हमारी भाषा में फरसु मुन्शी ने कड़ा खनखनाया; किसी अपने आदमी की मां या दादी की तेरहवीं या बरसी करने का बहाना लेकर बड़े काका ने दावत दी और हमारे दल के लोगों को निमंत्रण नहीं दिया. यह देखकर तुरंत अधुमाई काका और पिताजी मिले और इधर भी कड़ा खमकाया गया. नया चिट्ठा तैयार किया गया और अपने दल के लोगों को निमंत्रण दिया गया. लड़कियों का ससुराल जाना रुका; बहुओं का पीहर जाना रुका; भाइयों ने आपस में अबोला साधा; बहनों ने एक-दूसरे से सम्बंध-विच्छेद किया.

भार्गवों की मुट्ठी-भर जाति के दो दल हो गये. धर्मशाला में आमने-सामने जाति की दो पंगत-बैठी. लड्डू, खीर, श्रीखंड, जलेबी और मट्ठा का मज़ा लिया गया. एक-से-एक स्वादिष्ट मिठाइयां बनीं और उनकी प्रशंसा के पुल बांधे गये. दोनों ने अपने को एक-दूसरे से बढ़कर दिखाने की चेष्टा की. फरसु भाई मुन्शी की ‘वाहवाह’ हुई; अधुभाई साहब और माणक भाई मुन्शी की पंतग भी संतोषप्रद रही.

कौन कहता है कि ‘मोदकान स्वादंते ब्राह्मणा’ वेदवाक्य नहीं?

बड़ों-से तो बड़े ही वैर साध सकते हैं.

भार्गवों की जाति में अनादि काल-से चली आती हुई एक प्रथा थी– सभी बारातें भृगुभास्करेश्वर के मंदिर के आगे से आया करती थीं; और जिस प्रकार किसान या ज़मीदार की देवी बोलती थी उसी प्रकार भार्गवों की भी बोलती थी. इसलिए जाति में होनेवाले सभी विवाह और जनेऊ लगभग एक ही मुहूर्त में होते थे. परिणाम यह होता था कि टीले और नये मंदिर के बीच आम रास्ते पर दो-तीन घंटे में पूरी जाति की बारातें आती जाती थीं.

इस प्रथा के कारण एक बड़ा-बहुत ही बड़ा- प्रश्न प्रतिवर्ष खड़ा होता. बारातें नये मंदिर के आगे आमने-सामने मिलतीं. जो नये मंदिर की ओर से जाता वह निस्संदेह बड़ा कहा जाता. जब यह बात थी तब ऐसा कौन-सा भार्गव-जाया होगा जो रास्ते की इस ओर को छोड़कर दूसरी ओर से जाता और किसी ने नीचा कहलाता. दो बकरे पहाड़ की संकरी दरार में मिले थे और एक-दूसरे के ऊपर से निकल गये थे; परंतु वे भार्गव नहीं थे! इसका परिणाम यह था कि मंदिर की ओर से ही दो बारातें आमने-सामने आ जातीं. कोई किसी को न जाने देती और घंटों तक मर्द, औरतें, घोड़े, गाड़ियां एक-दूसरे के सामने खड़े रह जाते– मानो दो भैंसे एक दूसरे से सींग अड़ाए, समान शक्ति से ज़ोर लगाते हुए निश्चल हो गये हों. दोनों ओर से ढोल, नगाड़े और तुरहियां ज़ोर-शोर से बजती रहतीं. ऐसे खड़े-खड़े चार घंटे तो मैंने बिताये हैं.

घंटों तक करें क्या, इसकी तरकीब भी चतुर भार्गवों ने सोच ली थी. दोनों ओर के ढोल बजानेवाले आगे आते और ढोल की खाल पर बीच में हनुमान के चिकने सिंदूर से दवन्नी चिपकाई जाती. ढोल बजानेवाले ढोल के किनारे पर डंका मारकर टुम-टुम-टुम ढोल बजाते-नाद तरंग से दवन्नी सरकाने के लिए.

घंटे-दो घंटे में चिपटी हुई दवन्नी खिसकती-खिसकती ढोल के किनारे पर आती और वहां से गिर पड़ती. जिस दल के ढोल बजानेवाले दवन्नी पहले गिराते, वही जीत जाता, जय-घोषणा होती और उसकी बारात नये मंदिर की ओर से निकलती. सब प्रसन्नता से अपना-अपना मार्ग लेते.

यह हनुमान की दवन्नी का ही खेल नहीं था. इसके लिए ढोल कैसा चाहिए, सिंदूर में कितनी चिकनाई चाहिए, टुम-टुम ढंग से होती है या नहीं, इन सब विषयों में निष्णात भार्गव जाति में थे, और मेलबोर्न क्रिकेट क्लब (M.C.C.) जितनी सावधानी से क्रिकेट के नियमों का निर्धारण करती है उतनी ही सावधानी से उसके भी नियम निर्धारित होते.

जाति में फूट पड़ी इसलिए इस प्रथा का आनंद जाता रहा और वैरभाव आया. दो दलों की बारातें संध्या के पांच बज गये मंदिर के आगे इकट्ठी हुईं– आमने-सामने पड़ीं– रुककर खड़ी हुई. एक ने फरसु मुन्शी से कहलाया दूसरी ने अधुमाई साहब से. दोनों कपड़े पहनकर बाहर आये, अपने प्रमुख सहयोगियों को बुलाया. अपने दल के लोगों में जाकर खड़े हो गये. ढोलवालों को वर्दी देने का वचन दिया गया. दो ढोलवाले बीच में आये. दोनों ओर के ‘हनुमान की दवन्नी’ के शात्र-विशारद मदद के लिए आये. दवन्नी चिपकायी गयी– टुम-टुम-टुम शुरू हुई. लोग झुंड बनाकर देखने लगे. दूसरी जाति के लोग भी देखने आये. थकी हुई त्रियां चबूतरे पर बैठीं. टीले से पट्टे लाये गये और रास्ते के बीच में उन पर प्रमुख जन बैठे. दो प्रतिपक्षी बालक वरराजा, मस्तक-से-मस्तक मिलाये, आमने-सामने खड़े घोड़ों पर दुखती कमर से बैठे रहे. …रात होने को आयी परंतु टुम-टुम बंद नहीं हुई. अधिक देर होने पर घर से गरम दूध आया, बाज़ार से मगद के लड्डू आये और रास्ते पर खड़े बारातियों ने क्षुधा तृप्त की. ढोलवालों को पगड़ी-पर-पगड़ी दी गयी और टुम-टुम होती रही.

आधी रात हुई. एक दवन्नी गिरी. “बेईमानी है! बेईमानी है! नहीं मानेंगे!” निष्णातों में मतभेद हुआ. दूसरी दवन्नियां आयीं, दूसरे ढोलों पर चिपकायी गयीं. ढोलवालों के लिए बज़ाज़ों की दूकान खुलवाकर नयी पगड़ियां मंगायी गयीं. समस्त भार्गव देखने के लिए जुड़े. टुम-टुम-टुम की ध्वनि व्योम के उस पार नक्षत्रों में सुनाई दी. सवेरा होने को आ गया, लेकिन वही दृढ़ता, वही ‘न्यायात्पथं प्रविचलंति पंद न धीराः’ भीष्म संकल्प– वही टुम-टुम-टुम केवल वर राजाओं के घोड़े चार पैरों से खड़े-खड़े सो रहे थे. वर राजा झोंका खाकर गिर न जाएं, इसलिए सगे-सम्बंधी उन्हें सहारा देते थे. कोई हिला तक नहीं. किसी का हिलने का विचार तक न था. दातुनें की गयीं, चाय पी गयी, ढोल फूटे और नये आये! उदय होते सूर्यनारायण नये मंदिर के रणांगण में टुम-टुम-टुम का नाद सुनकर विस्मत हुए. ये भार्गव नहीं, इसलिए इसका रहस्य कहां से समझ सकते हैं!

सवेरे फज़ामियां काका आये. वे फौजदार थे. साथ में पुलिस के आदमी थे. “फरसु भाईब अधुभाई साहब! यह क्या? बहुत हो गया.” “अरे, जो मैं यहां से हटूं तो मूंछ मुड़ा डांलू!” “अरे, जो मैं हटूं तो नरभेराम मुन्शी का लड़का नहीं!” प्रतिपक्षी कहते– “मर भले ही जाएं पर हटेंगे नहीं!” मानो यह हल्दीघाटी का युद्ध था!

सवेरे फैज़ामियां ने हाथ में चाबुक लिया और इससे पहले कि किसी को मालूम पड़े वर राजाओं के दोनों घोड़ों में एक-एक फटकारा. एक उछलकर इस ओर मुड़ा और दूसार उछलकर दूसरी ओर. हो-हल्ला मचा. टुम-टुम रुका. त्रियां सभी घबरा गयी. “सा…बडा!” फैज़ामियां ने गालियां खायीं. “मैं तो बड़ा हूं ही. उसमें नया क्या है?” उसने हंसकर कहा.

लेकिन घोड़े एक-दूसरे को पार कर गये और इस प्रकार दोनों की टेक रह गयी. बारातें अपने-अपने रास्ते गयीं. दोनों दलों ने अपनी विजय मान ली.

गत युग के लोग अभिमान और पाखंड में कैसे थे, इसकी कल्पना करने बैठें तो आज तो वह भी असमर्थ हो जाएगी!

(क्रमशः)

 अप्रैल   2013 

 

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