आधे रास्ते (छठवीं क़िस्त)

न्हीं दिनों मैंने डय़ूमा के  ‘थ्री मस्केटीयर्स’ आदि उपन्यास पढ़ने शुरू किये और मेरी आंखों के आगे नयी सृष्टि निर्मित होने लगी. सांस लेने की परवाह किये बिना मैं इन उपन्यासों में खो गया. दार्तान्य, अरथोस मिलाडी, व्राजिलोन और दला विलिमेर आदि के जीवन से मैंने बार-बार परिचय प्राप्त किया. लेकिन इस नयी सृष्टि की खोज को मैं गुप्त न रख सका. यदि कहा न जाय तो स्वर्ग का देखना भी किस काम का!

बहुत सबेरे दलपतराम के साथ घूमने जाते समय मैं ड्यूमा की इन सभी कथाओं को जैसे मैं समझता और जैसे मुझे वे याद होतीं वैसे ही कह सुनाता.

रात को भी बहुत देर तक इनका ही पारायण होता. मां, बहनें या भानजे कहानियां सुनने के लिए तैयार रहते ही थे. उन्हें भी मैं सभी कहानियां रस के साथ सुनाता. कहीं मैं भूल जाता या मुझे ऐसा मालूम पड़ता कि सुननेवालों को रस नहीं आ रहा है तो मैं उनमें कुछ अपनी ओर से भी मिला देता. इन कथाओं को कहते और अपने श्रोतावृंद को सुनाते हुए मुझे तनिक भी थकान नहीं होती थी.

बाद में तो ड्यूमा की सृष्टि मेरी ही हो गयी. 1923 में मैंने लुक, वेरसाई और फोंटेन्ब्लो देखे- लेकिन एक अपरिचित प्रेक्षक की भांति नहीं, वरन् उसी प्रकार जैसे कोई बहुत वर्षों के बाद बाहर से आने वाला व्यक्ति अपने घरों को देखता है. इन सभी  उच्च प्रासादों और उद्यानों में तो मैं अनेक बार घूमा था. ड्यूमा द्वारा सृजित मारगोट से लगाकर नेपोलियन तक के स्वजनों को इनमें घूमते हुए मैं अपनी कल्पना की आंखों से कभी का देख चुका था.

ड्यूमा मेरे लिए एक उपन्यासकार नहीं, कल्पना सृष्टि का विधाता है, उसके ऋण को मैंने कभी अस्वीकार नहीं किया. मैंने ड्यूमा की कथाओं का अनुवाद किया है, उसकी कला का अनुकरण किया है, आदि आक्षेप मेरे ऊपर लगाये गये हैं और इन आक्षेपों में निहित सत्य को मैंने सदैव स्वीकार किया है.

उपन्यास लिखने की कला में ड्यूमा मेरा गुरु है. नया चित्रकार अपने गुरु के अमर चित्रों की रेखाओं को हृदयंगम करके चित्रकारी सीखता है. नया कवि किसी महाकवि की रसमयता और शब्द प्रयोग को दृष्टि में रखकर काव्य-रचना करता है. इसी प्रकार ड्यूमा की कला से स्वरूप मिला, तेज मिला, प्रेरणा मिली. मैंने निश्चयपूर्वक न तो उसकी कृतियों का अनुवाद किया है और न उसके पात्र या कथावस्तु का अनुकरण किया है, लेकिन तो भी ड्यूमा की कला का प्रभाव मेरी कृतियों में से गया नहीं है.

कड़ी-से-कड़ी कसौटी लीजिए. कथा वस्तु की रोचकता, संगठन या विविधता का मापदंड स्थिर कीजिए, पात्रों के वैविध्य और सजीवता को कला का अंग समझिए, संवाद कौशल, सचोटता और नाटकीयता को साहित्य का मुख्य तत्त्व मानिए, प्रसंग योजना और अद्भुतता को उपन्यास का प्राण ठहराइए तो ड्यूमा की कला किसी भी साहित्य महारथी की कला से हेठी न ठहरेगी. निरंतर रस पैदा करने की शक्ति-जो कथा का प्राण है- को यदि मापदंड माना जाय तो विश्व-साहित्य में कथा सम्राट का मुकुट ड्यूमा को ही पहनाना पड़ेगा. यदि कोई इतना भी मानता है कि ऐसे  साहित्य महारथी की कला की परमज्योति से अपने घर का दीपक जलाकर मैंने गुजराती साहित्य को तनिक भी प्रकाश दिया है तो मैं अपने श्रम को सफल समझूंगा.

सन् 1900 के बाद टीले की शान बढ़ी. पिताजी डिप्टी कलक्टर होकर घर आये. अधुभाई काका भी डाकोर से रिटायर होकर लौटे.

सबेरे-शाम बड़े-बड़े आदमी मिलने आने लगे. म्यूनिसिपैलिटी ने सड़कों की सफाई कर लालटेनों में तेल डालना शुरू कर दिया. नौकर, रसोइया और गवैयों की दौड़-धूप होने लगी. बड़े काका और बूआ चुप हो गये.

इतने में ही छप्पनियां अकाल आया. बागरा ताल्लुका में नेकल आ विचित्र रूप धारणा किया. वह पिताजी के हलके में था, इसलिए उन्हें बड़ी दौड़-धूप करनी पड़ी.

उस समय का मुझे एक ही दृश्य याद है…

एक बार मैं पिताजी के साथ गाड़ी में आ रहा था. रास्ते में कुछ पड़ा हुआ था. पिताजी ने कहा- ‘कनु, मेरी गोदी में मुंह छिपा ले.’

‘क्यों पिताजी?’

‘तुम्हारे देखने योग्य नहीं.’

‘मैं आंखें मीचे लेता हूं,’ कहकर मैंने आंखों पर हाथ रख लिये, परंतु मन न माना इसलिए अंगुलियों को थोड़ा चौड़ा करके यह देखने का प्रयत्न किया कि वह क्या वस्तु है.

हमारी गाड़ी के आगे रास्ते में दो-चार मुर्दे पड़े थे. पहले तो समझा नहीं, परंतु जब गाड़ी उन्हें बचाकर आगे निकली तो मैंने पीछे देखा. …एक त्री का शव रास्ते में पड़ा था और उसके हाथ में कुछ था. पहले जो बात मेरी समझ में नहीं आयी थी वही गांव में जाकर मेरी समझ में तब आयी जब पिताजी ने पुलिस के दीवान को उन शवों के हटाने का हुक्म दिया. मां ने मरते समय अपने बालक के शव द्वारा भूख मिटाने का प्रयत्न किया था.

चारों ओर लोग ‘अकाल’ ‘अकाल’ चिल्ला रहे थे, परंतु मैंने जो अकाल का भयंकर स्वरूप देखा था वह बहुत दिनों तक मेरी आंखों से दूर नहीं हुआ.

पिताजी दिन-रात अकाल से लोगों को बचाने के काम में लगे रहते. कभी-कभी वे सवेरा होने से पहले ही घोड़े पर चले जाते. कितनी ही बार मां मुझे सुलाकर बारह या दो बजे तक चिंतातुर उनके आने की बाट देखती रहती.

एक दिन पिताजी बुखार लेकर आये. वे रात को देर से आये थे और आंखों में सूजन थी. दूसरे दिन बुखार बढ़ा, सूजन छाती पर आयी और वे बेहोश होने लगे. उन्हें किसी की छूत लग गयी थी. डाक्टरों पर डाक्टर आये, परंतु कोई लाभ नहीं हुआ और कोई न तो रोग का पता लगा सका और न उपाय ही बता सका. हमारी चिंता की सीमा न थी.

अंत में सिविल सर्जन ने इस रोग को रतवा-एरीसपेलिस-का नाम दिया. पिताजी तो बेहोश पड़े थे. कभी-कभी सन्निपात में वे कुछ बड़बड़ाते थे. सर्जन ने ऑपरेशन किया. बांयें कान के पास बड़ा-सा चीरा लगाया और मवाद निकाला. थोड़े दिन बाद दूसरी ओर चीरा लगाया. पिताजी महीनों तक जीवन और मरण के बीच झूलते रहे.

माणिक मुन्शी मृत्यु के किनारे पड़े थे. अंग्रेज़ी और देशी हाकिम तथा गांव और जाति के जान-पहचान के आदमी आते थे. सबको ऐसा लगता था कि वे आज या कल चल बसेंगे. मां, बहनें और मैं थर-थर कांपते थे.

एक दिन शाम को तो ऐसा लगा कि पिताजी आज की रात पार नहीं कर सकते. मां बैठी-बैठी आंसू बहा रही थी. मैं एक ओर बैठा-बैठा घुटा जा रहा था. लकड़ी टेकते हुए अपाहिज बड़े काका वर्षों का वैर भुलाकर छोटे भाई का मुंह देखने आये. बड़े काका जैसे-तैसे कुरसी पर बैठे और बेहोश पिताजी की ओर देखने लगे. बिना कुछ बोले हुए उन्होंने मुझे पास बुलाया; मैं घबराता हुआ गया और पास जाकर खड़ा हो गया. उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा, …और सिसकी भरकर रोने लगे. अनुभवी और ज़माना देखे हुए वे वृद्ध बड़े काका स्वभाव छोड़कर उस समय स्नेह-उर्मियों से पवित्र हो गये.

कुछ समय बीता और जाति की त्रियां आने लगीं. भयंकर रुखीबा धीरे-से आयी, एक कोने में बिना बोले बैठी और चली गयी. उसके हृदय में क्या हो रहा था यह कौन कह सकता है.

रात हुई. मैंने भयंकर क्रंदन सुना. वह क्या है, यह जानने से पहले ही मेरी बड़ी बहनें मंदिर में चली गयी. महादेव जी के आगे मस्तक झुकाये मेरी मां उनसे प्रार्थना कर रही थी कि वे उसे पति से पहले इस संसार से उठा लें.

वह भयंकर रात थी. मेरी बहनें एक-एक करके महादेवजी के आगे जाकर विनती कर आयीं कि ‘पिताजी को बचाकर उनके बदले हमें ले लो.’

हम बैठक में पिताजी के पास बैठे रहे. वे बेहोश पड़े हुए सन्निपात में कुछ बड़बड़ा रहे थे. मुझे लगा कि महादेवजी पिताजी को ले लेना चाहते हैं और मां तथा बहनों के बदले उन्हें जिलाना नहीं चाहते. लेकिन यदि मुझे लेकर पिताजी को जिला दें तो! मुझे चंद्रशेखर में पूरी श्रद्धा थी और मेरा विश्वास था कि वे मेरी विनती को अस्वीकार नहीं करेंगे. मैं धीरे-से मंदिर में गया. अंडी के तेल का दीया जल रहा था. मैं पिताजी को बचाने की इच्छा से सदा शिवकवच का पाठ करता था. इस समय मैंने फिर वह पाठ किया और माथा ज़मीन पर टेककर प्रार्थना की- ‘भगवान! यदि चाहो तो मुझे ले लो पर मेरे पिताजी को बचाओ?’

चंद्रशेखर उदार हृदय के थे. उन्होंने न हम में से किसी को लिया और न पिताजी को ही लिया.

पिताजी अच्छे हो गये, परंतु अपने जीवन पर से उनका विश्वास उठ गया और उनकी इच्छा हुई कि अपने एकमात्र पुत्र का विवाह कर दें.

मैं तेरह वर्ष का था और हाल ही में मैट्रिक में आया था. मेरी होने वाली पत्नी नौ वर्ष की थी पर पांच वर्ष की दिखाई देती थी.

मुझे विवाह करना अच्छा नहीं लग रहा था. एक तो यह बात थी कि मैंने एक बालसखी के साथ विवाह करने का निश्चय किया था और दूसरे, मेरी होने वाली पत्नी उम्र और कद में बहुत छोटी थी. लेकिन दोनों में से एक भी बात ऐसी न थी जो कही जा सकती. कारण, मैं पिताजी की इच्छा का सदा आदर करता था.

घर रंगा गया, चंदोवा ताना गया, नौबत बजने लगी, हंडे और झाड़-फानूस जलने लगे, संध्या और प्रभाती गाये जाने लगे. इसी समय विक्टोरिया की मृत्यु हुई थी, इसलिए वेश्या का नृत्य स्थगित रखा गया.

लग्न का मुहूर्त शाम का था. झंगा, पगड़ी और दुपट्टा पहनकर, घोड़े पर चढ़कर, तलवार कंधे पर रखकर, शुभ शकुनों के बीच गाते-बजाते मैं जैसे वैरी जीतने के लिए निकला.

मेरी भावी पत्नी लग्न के समय के कपड़े पहनकर मेरे सामने आकर बैठी. ‘शुभ लग्न सावधान’ बोला गया और हमारा हस्तमिलाप हुआ. रात को एक बजे मैं जुलूस के साथ पत्नी लेकर घर की ओर चला.

जिस रास्ते से जुलूस गुज़रा उस पर स्थान-स्थान पर आतिशबाज़ी छोड़ी गयी. मैं पालकी में हारा-थका, जैसे-तैसे सिर की पगड़ी को सम्भालता, पान चबाता बैठा था. मेरी धर्मपत्नी तो जुलूस के आरम्भ से ही झोंके खा रही थी. उसके साथ बात करने की लालसा मन में ही रह गयी. जब जुलूस समाप्त हुआ तो वह खर्राटे भरकर सो रही थी.

मां के जीवन में यह समय निश्चय ही सुख का था. दो विधवा लड़कियां भी अपनी विपत्ति भूलने लगी थीं; उनके लड़के भी मां के हाथों ही पल रहे थे; तीसरी लड़की अपनी ससुराल में सुखी थी; सबसे पीछे के लड़के का विवाह हो गया था; इसलिए मां को अपने राजा जैसे पति के साथ आराम से बैठने का अवसर मिला.

मां का हिसाब लिखा जाता रहा. रामस्तवराज स्तोत्र बोला जाता रहा. निराश्रित लड़कियों के जीवन में रस-संचार के लिए कहानियां लिखने, रूमाल काढ़ने और चित्र अंकित करने का काम भी चलता रहा.

इस समय मैं मां के निकट आया. रात को पिताजी खाना खाकर ऊपर जाते. बाद में बर्तन मंजते जाते और खट-खट होती रहती. उस समय मैं दिन-भर के अपने अनुभवों को कहता और मां तथा बहनें उन्हें सुनतीं. मैं उनसे भूमिति के सिद्धांतों, आठवें हेनरी की त्रियों, अफ्रीका की नदियों आदि नये सीखे हुए विषयों के सम्बंध में बातें करता. मां में अपूर्व श्रोता की कला थी. मंद-मंद हंसकर सवाल पूछतीं, मेरे जवाब देने के प्रयत्नों को बिना अधीर हुए सफल बनाने की चेष्टा करतीं और मैं जो कुछ कहता उसे सहृदयता से समझने का प्रयत्न करतीं. महाभारत और रामायण की कथाएं उन्हें ज़बानी याद थीं. इसलिए कभी उनके प्रसंगों को सुनातीं और कभी याद किये हुए आख्यानों में से कुछ कह देतीं.

अपने साक्षात पितामह चंद्रशेखर महादेव की भक्ति हमारी बातचीत का ऐसा विषय था जो कभी समाप्त ही नहीं होता था. करसनदास मुनशी ने उसे भक्ति-भाव से स्थापित किया था; निरभेराम मुनशी ने उसे अपने हाथों पूजा था, उसके लिए टीले की टेक और संस्कार स्थिर रहते थे. पिताजी 1874 से प्रति श्रावण मास में उसकी रुद्री कराते थे. उनकी कृपा से मैं पैदा हुआ था. उनको अपने हिस्से में लेने के लिए पिताजी ने बड़ा भारी श्रम किया था. पिताजी ने उनका उद्धार किया था. साथ ही उन्होंने बिना उनके दर्शन किये भोजन न करने का व्रत लिया था.

चंद्रशेखर की भक्ति करने और कराने में मां को बड़ा आनंद आता था. पिताजी ने सवा लाख बेलपत्रों द्वारा विधिपूर्वक महादेवजी की पूजा करायी. मेरी एक बहन ने एक वर्ष तक सांथिया पूरने का व्रत लिया. मैं भी संध्या समय शिवकवच का पाठ करने लगा और यह क्रम डेढ़ वर्ष तक चला. मैं स्वयं रुद्री कर सकूं, इसके लिए मैंने दलपतराम-से सस्वर पुरुषसूक्त का पाठ करना सीखा.

हमारे चंद्रशेखर का लिंग पूर्णिमा को गौरवर्ण का हो जाता है और अमावस्या को श्याम वर्ण का बन जाता है, यह हमारे कुटुम्ब की मान्यता थी. यह मान्यता सच है या नहीं, इस बात की जांच का हमने स्नान-ध्यान करके अनेक बार प्रयत्न किया था और हमें यह विश्वास हो गया था कि यह मान्यता सच है.

मैं शिवकवच पढ़ता, रुद्री करता, महादेवजी के आगे हृदय खोलकर रखता. ‘जय सोमनाथ’ की नायिका चौला की शिव भक्ति के बीज मेरे इन संस्कारों में निहित जान पड़ते हैं.

मैंने श्रद्धा और अश्रद्धा की अनेक श्रेणियां पार की हैं और इस आधार पर मैं स्पष्ट रूप से यह कह सकता हूं कि इस प्रकार की किसी जीवित सामुदायिक भक्ति के बिना परिवार के लोगों की उमंगों का शुद्धीकरण और उन के व्यक्तित्व का अन्योन्याश्रित विकास सम्भव नहीं है.

पूर्वजों द्वारा प्रचलित इस मान्यता के विरुद्ध मैंने सजग विद्रोह किया. मेरी डायरी में एक स्थान पर टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में लिखा है-

‘भड़ौंच हाई स्कूल के हेड मास्टर सी. एन. कॉन्ट्रेक्टर ने ‘रिफर्मेशन’ (यूरोपीय धार्मिक पुनरुत्थान) पर एक सुंदर भाषण दिया. उसका मेरे विचारों पर भारी प्रभाव पड़ा. मैं रात-भर चिंतन करता रहा. मैं कुछ-कुछ रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय के अनुसार चलता था. ईश्वर तो किसी भी भाषा में प्रार्थना सुन सकता है. उसे संस्कृत ही क्यों चाहिए? अब मैं संस्कृत में संध्या के स्थान पर गुजराती में संध्या करूंगा.’

जैसे ही यह नया दृष्टिकोण मेरे मस्तिष्क में आया वैसे ही मैंने मां से इसकी चर्चा की. उसने स्वीकार किया कि मेरी इस नयी बात में भी तथ्य है. मैंने एक संस्कृत जानने वाले की सहायता से संध्या का गुजराती अनुवाद कर डाला. मैं रोज़ उसे पढ़कर सुनाता. उसके कहने से मैंने ‘रामस्तव राज स्तोत्र’ का भी जैसा मुझे आता था वैसा अनुवाद किया.

थोड़े दिन तक यह अनुवाद की हवा चली. लेकिन मैट्रिक में खगोल विद्या भी पढ़ाई जाती थी. इस कारण गुजराती में सूर्य को अर्ध्य देने में कठिनाइयां उपस्थित हुई. मां ने भोलानाथ साराभाई की ‘ईश्वर प्रार्थना’ की एक पुरानी पुस्तक निकाली. बहुत दिन पहले उसने अहमदाबाद में जो कुछ प्रार्थनाएं याद की थीं उन्हें गाकर सुनाया. मेरी बहनों को भी कुछ प्रार्थनाएं आती थीं.

मेरी इस डायरी से थोड़े दिन बाद की मेरी मनोदशा का पता चलता है-

‘संध्या का स्वांग मुझे कब तक करना पड़ेगा? इसमें कहा गया है कि सूर्य धर्म, अर्थ और मोक्ष के लिए तेज देता है और खगोल विद्या कहती है कि सूर्य एक ज्वलंत नक्षत्र है. स्थूल पदार्थ का उपकार मानने में कोई तुक नहीं. मुझे तो इसके भी स्रष्टा निरंजन निराकार की पूजा करनी चाहिए.’

कुछ महीने बाद की मेरी डायरी के शब्द हैं-

‘आज निश्चय किया कि नैतिक बल संजोना है और नीति के अनुकूल चलना है. ‘प्राणाघातान्निवृत्तिः’ वाले श्लोक के मर्म को हृदयंगम कर उसी के अनुकूल जीवन बनाना है.’

मैंने संध्या, शिवकवच और रुद्री छोड़ दिये और मैट्रिक की परीक्षा देने अहमदाबाद गया तो ‘ईश्वर प्रार्थना माला’ ले आया. इस समस्त विकास में मां ने मुझे पूरी-पूरी सहायता दी थी. वह हिंदू संस्कृति के समान थी. जहां तक मौलिक सिद्धांत बने रह सकें वहां तक वह सभी परिवर्तनों को स्वीकार कर सकती थी.

पिताजी की भक्ति भी हम सबको एक सूत्र में बांध लेती. मां घर की व्यवस्था करती और सबकी देखभाल करती, परंतु पिताजी तो देवता थे; उन्हें रिझाना और उनके प्रति पूज्य भाव रखना हमारा प्रमुख कर्तव्य था. इस धर्म को मां सिखाती थी, परंतु अपने लाक्षणिक ढंग से-आचरण द्वारा. वह स्वयं सती है या हमें पितृभक्त होना चाहिए, ऐसा न तो उसने किसी दिन कहा और न कहलवाया. परंतु पिताजी की परिचर्या करना ही उसके ध्यान का पहला विषय था.

हम यदि किसी बात के लिए मां के पास आज्ञा लेने के लिए जाते तो एक ही जवाब मिलता- ‘पिताजी से पूछ देखना.’ यह दूसरी बात कि फिर पिताजी चाहे वही करते जो मां कहती. हमें ताड़ना मिलती तो केवल इतनी ही कि ‘पिताजी को यह पसंद नहीं.’ या ‘पिताजी क्या कहेंगे?’ हमें नहलाना-धुलाना होता या हमसे कोई काम कराना होता तो भी वही उपाय- ‘उठो, अभी पिताजी आते होंगे?’ हममें से कोई बीमार होता तो भी यही आश्वासन- ‘पिताजी आयेंगे तो सिर दर्द मिट जाएगा.’

इस प्रकार मां की पितृभक्ति सृजनात्मक थी. उसके द्वारा उसने अभेद्य कुटुम्ब जाल रचा था. इस सृष्टि में रहते-रहते हमने पितृभक्ति के पाठ पढ़े.

पिताजी शरीर से मोटे और ठिगने थे. उनका रंग गोरा और गुलाबी था. उनके मुख पर सदैव राज्य सत्ता के तेज को व्यक्त करने वाला गौरव झलका करता था. उनकी आंखें सदा डरातीं. उनके पास आते ही उन्हें देखकर भय लगता. उनके तेजपूर्ण शरीर पर स्वच्छ और ढंग से पहने हुए कपड़े सदा शोभित होते रहते थे. वे जहां जाते वहां  अपना प्रभाव छोड़ आते थे.

उनका स्वभाव उग्र था. यह समझना मुश्किल था कि वे कब और किस कारण गुस्सा हो जाएंगे. वे जब गुस्से में होते तो उनकी आंखों से चिनगारियां निकलने लगतीं, मुंह लाल हो जाता और उनकी प्रचंड आवाज़ से दीवारें कांपने लगतीं. एक दिन नये मंदिर के आगे एक कथावाचक पंडित कथा बांच रहे थे. उस समय पिताजी और मैं तीसरी मंजिल के छज्जे पर बैठे कथा सुन रहे थे. तभी नीचे रास्ते पर किसी लड़के ने कुछ ऊधम किया- क्या किया यह याद नहीं. इससे पिताजी गुस्सा हुए, खड़े हुए और खूंटी से हंटर उतार कर नये मंदिर के आगे पहुंचे और उस ऊधमी लड़के की खूब खबर ली.

साधारणतः पिताजी जो कुछ कहते उसके विरुद्ध किसी से एक अक्षर भी नहीं कहा जाता. हां, मां ही कभी-कभी उन्हें धीरे-से समझा सकती थी. कोई सामने पड़ता तो उसे अपने उग्र प्रताप से निष्प्रभ करने की  अपनी वृत्ति को वे रोक नहीं सकते थे. जिनके साथ अच्छा सम्बंध होता उनके साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार करते. न तो उन्हें किसी को खुश करना आता था और न उन्हें यह पसंद ही था.

वे जैसे उग्र थे वैसे ही साहसी भी थे. वे घोड़े पर सवारी करना जानते थे; बंदूक और तलवार चला सकते थे. काम पड़ने पर पंद्रह मील तक चल सकते थे. कितने ही वर्ष तक उन्होंने बीमारी का नाम भी नहीं जाना था.

उनका हृदय शीशे की तरह साफ़ था. उनके क्रोध के उफ़ान को शांत होने में देर नहीं लगती थीं. उनकी निष्कपटता अव्यावहारिक थी. कोई पास आता तो वे झट सारी बात साफ़-साफ़ कह देते. कपट, धोखेबाजी और झूठ से उन्हें घृणा थी. किसी तिकड़मी से यदि उन्हें अकेले काम पड़ता तो वे झट उसके चक्कर में फंस जाते. कोई सफ़ाई से बात करता तो ठगे भी जाते. परंतु ऐसे अवसरों पर मां घर बैठे-बैठे सब बातें जान लेती और सब कुछ ठीक करने का प्रयत्न करती. बहुत बार मां पिताजी से विनती करती कि जाति की पंचायत में प्रतिपक्षी से कुछ अधिक न कह देना. लेकिन उन पर इसका तनिक भी असर न होता. वे विरोधी से सब कुछ कह देते और पूछते- ‘क्या मैंने चोरी की है, जो चुप रहूं?’

उनकी ईमानदारी संदेह के परे की वस्तु थी. उस युग में लोकमत का बल नहीं था और अधिकारी को राजा के समान माना जाता था. अनुचित लाभ उठाने के अवसर उन्हें बहुत-से मिले थे. खर्चीले स्वभाव के होने से वे रुपया भी अधिक नहीं बचा सके. इतना होने पर भी कभी उनका मन विचारों में भी विचलित हुआ हो, यह मैंने नहीं जाना. वे बार-बार अपने पुराने सूत्र को दुहराते- ‘जब चार हाथ का स्वामी देगा तो दो हाथों से सम्भाला भी न जा सकेगा और जब वह लेना चाहेगा तो दो हाथ कितना बचा पावेंगे?’

उनका हृदय बड़ा कोमल था. वह बहुत हंसते-हंसाते न थे, परंतु मधुर विनोद और गौरवपूर्ण प्रसन्नता उनकी बातों की प्रमुख विशेषताएं थीं. उनके समय और शिक्षक को देखते हुए वे बहुत अच्छी गुजराती और अंग्रेज़ी लिखते और बोलते थे.

पिताजी और माताजी का दाम्पत्य-जीवन आदर्श था. उन दोनों के जैसा विश्वास और स्नेह मैंने उस युग के पति-पत्नियों में नहीं देखा. पिताजी कमाकर लाते और मां घर की व्यवस्था करती. पिताजी घर आते और सारे दिन की सुख-दुख की बातें करने लगते. मां सब कुछ व्यवस्था कर लेती, परंतु पिताजी की आज्ञा बिना उस पर अमल न करती. पढ़ने या बाहरी कामों में जो कुछ आता उसे पिताजी मां से कहते और वह अंग्रेज़ी कहानी से लेकर जेल के काम-धंधे तक प्रत्येक वस्तु में रस लेती. प्रत्येक सांसारिक कार्य को करती मां, पर उसका यश देती पिताजी को. पिताजी भी सब काम करते थे पर बिना मां से पूछे शायद ही करते हों. यदि उनसे कुछ काम बिगड़ जाता था तो मां एक शब्द भी कहे बिना उसका दोष अपने ऊपर ले लेती थी. पिताजी से हम प्रेम भी अधिक करते थे. यदि उन्हें तेज़ बुखार आ जाता और वे घर में पैर रखते तो ऐसा लगता जैसे बुखार उतर गया हो.

मैंने चिरकाल तक उनके साथ बैठकर भोजन करने में आनंद का अनुभव किया. पिताजी शायद ही कभी हमसे नाराज़ होते थे. मां भी हमारे लिए पिताजी के डर को छोड़कर दूसरे किसी भी शत्र का उपयोग नहीं करती थी.

इस सब में व्याप्त कला दोनों में से किसकी थी- मां की, पिताजी की या दोनों की, यह कहा नहीं जा सकता. मां को छोड़कर पिताजी का कोई मित्र नहीं था और मां की कोई सहेली है, यह मेरी जानकारी में नहीं. दोनों एक-दूसरे को छोड़कर किसी की सहायता नहीं मांगते थे और परवाह भी नहीं करते थे.

भड़ौंच के हाईस्कूल के असिस्टेंट मास्टर उत्तमराम मुझमें अधिक रुचि लेते थे. उनमें अनेक प्रकार की विचित्रताएं भरी थीं, तो भी उनका जीवन एक प्रकार से उल्लेखनीय था. अपने स्वभावगत क्षोभ को जीतने का सतत प्रयास जैसे उनमें मूर्तिमान हो गया था.

वे हमारी जाति के आरम्भिक ग्रेज्यूएटों में से एक थे. पढ़ने के दिनों में यह धर्मचुस्त और रुढ़िवादी विद्यार्थी अपने पाठ याद करके तुरंत पास के लक्ष्मीनारायण के मंदिर में जाते और वहां देवता के निकट हाथ जोड़कर याद किए हुए पाठ को सुना जाते. साथ ही नित्य प्रति ऐसी प्रार्थना करते कि वे कक्षा में प्रथम आवें और अन्य विद्यार्थी उनसे पीछे रहें.

उनकी बहुत-सी आदतें अत्यधिक क्षोभ के कारण बनी थीं. वे चलते थे- सदा सड़क के बाईं ओर के किनारे पर-पानी के प्रवाह की भांति; मानो बहे जा रहे हों. वे बोलते भी बड़ी तेज़ी से थे. कक्षा में लड़कों को सज़ा देनी होती तो दाएं हाथ से अपने बाएं कान की लौर (कान के नीचे का भाग) खींचते हुए शब्द-प्रवाह बहाते और प्रति दो शब्दों के बाद ‘ले भाई ले’ कहते. जब वे किसी पर नाराज़ होते तो उसकी ओर न देखकर दरवाज़े के बाहर देखते रहते.

अध्यापन की दृष्टि से वे अत्यंत भले, मेहनती और लगे रहने वाले थे. लेकिन लड़के इनके कारण तौबा करते थे. इतने पर भी हमारी जाति के कितने ही शैतान लड़के उनको परेशान करने में कोई कसर नहीं रखते थे. मैंने सुना था कि चौमासे के दिनों में एक बार लड़कों ने उनकी मेज़ की दराज़ में मेंढक बंद कर दिया था.

एक बार वे भारतवर्ष का इतिहास पढ़ा रहे थे-

द हुमायूं रिकवर्ड एंड बाबर सिकंड एंड डाइड

एक लड़के ने ‘सिकंड’ शब्द सुनकर मज़ाक में कहा- ‘श्रीखंड’

दूसरे ने कहा- ‘करेले का साग.’

तीसरे ने कहा- ‘रमास की दाल.’

मैंने भी कुछ कहा था पर वह क्या था, यह याद नहीं.

मास्टर ने दरवाज़े के बाहर देखते हुए अपने कान की लौर पकड़ी और डांटते हुए बोले, ‘ले भाई ले, वह (वे हेडमास्टर को सदैव ‘वह’ कहते) आवेगा तो तुम्हारी हड्डियां तोड़ डालेगा.’

शाम को मैं लड़कों के साथ घर आता था और मास्टर सड़क से तीर की भांति निकल जाते थे. मुझे देखकर उन्होंने बुलाया और कहा, ‘ले भाई ले, कन्हैया, तू मेरे घर आना.’

मैं उनके घर गया. “ले भाई ले’ कन्हैया, तू बैठ, एक बात कहूं. ले भाई ले, तू तो अच्छा लड़का है और समझदार भी है. वे सब तो जानवर जैसे हो गये हैं. ले भाई ले, तेरा उनके साथ मिलना मुझे पसंद नहीं. ले भाई ले, सच कहता हूं, मुझे पसंद नहीं.” और उनके कान की लौर लम्बी खिंचती गयी.

‘मास्टर, अब जो कुछ हुआ सो हुआ. अब नहीं होगा.’

‘ले भाई ले, ऐसे नहीं चल सकता. अभी परीक्षा में पांच महीने हैं. मेरे पास आकर बैठा कर. अब जा. ले भाई ले, तुझे तो पास होना है- इसी वर्ष.’

‘मास्टर साहब, भार्गवों के लड़के तो पहले वर्ष पास होते नहीं.’

‘ले भाई ले, यह बात झूठ है, बिल्कुल झूठ. तू इन लड़कों का साथ छोड़ दे. तुझे मेरी कसम.’

परिणाम यह हुआ कि वे बहुधा संध्या समय मंदिर में दर्शन करके हमारे घर के सामने आते और बाहर से ‘कन्हैया’ की आवाज़ लगाकर मुझे ले जाते. वे मुझे पढ़ाते तो नहीं थे, परंतु इस बात की देखभाल रखते थे कि मैं क्या पढ़ता हूं.

मुझमें पास होने की शक्ति है और मुझमें बुद्धि है, यह विचार हृदय की गहराई में छिपा था. उसे इस मास्टर ने प्रकट कर दिया. आत्म-बल पैदा करने वाले शिक्षक से बड़ा दूसरा शिक्षक कौन हो सकता है?

मैं घबराया हुआ मैट्रिक की परीक्षा देने अहमदाबाद गया. परीक्षा में निबंध आया- ‘यौर फेवरेट पासटाइम’ न मुझे क्रिकेट आती थी, न फुटबॉल और न पतंग उड़ाना. जो वास्तव में था वह लिखा- ‘रीडिंग नॉवेल’

उत्तमराम मास्टर की बात सच निकली. भार्गव लड़कों की परम्परा तोड़कर मैं पहले ही वर्ष पास हो गया. 

(क्रमशः)

जुलाई   2013 

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