अलविदा अन्ना

बचपन गाथा

   ♦  सूर्यबाला   >   

यह लम्बी संस्मरणनुमा कहानी बाल-मन को समझने-समझाने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.
प्रस्तुत है इस कथा के कुछ सम्पादित अंश.

एयरपोर्ट पर बाहर निकलते ही बर्फीली हवाओं ने धावा बोल दिया. अठारह घंटे प्लेन की यात्रा के बाद ठिठुरते हुए हम अपने तुड़े-मुड़े घुटने सीधे कर ही रहे थे कि बेटा भागता

हुआ पहुंचा. हमारे गले लगा और अपने साथ लाये जैकेटों, दस्तानों से हमें जल्दी-जल्दी ढांप-ढूंप, सूटकेसों सहित कार में जमा कर अपनी मरून माजदा हांक दी.

आधे शहर तक, सूत की माला सी बिखरी बर्फ, बिलेरिका (कस्बे) पहुंचने तक, बेटे के घर का पूरा लॉन ढांप चुकी थी.

अंदर दाखिल होने के साथ ही हमारी सबसे ज्यादा उतावली साढ़े चार साल की अन्ना को लेकर थी, जो अभी स्कूल से किसी भी क्षण लौटने वाली थी.

‘ठीक कितने बजे आती है अन्ना?’ हमारा साझा सवाल था.

‘बस, टाइम हो गया है, स्कूल की एक टीचर, मिस मेरी उसे यहां छोड़ती हुई अपने घर चली जाती हैं.’

अनायास मैंने चोर नज़रों से भांपा, माहौल में कुछ सकपकाहट-सी है.

जैसे-जैसे हमारी उतावली बढ़ रही थी और अन्ना के आने की घड़ी पास आती जा रही थी, बेटे-बहू के चेहरे की रंगत थोड़ी उतरती-सी महसूस हो रही थी.

असल में अन्ना के मिजाज, हाज़िरजवाबी और सामनेवाले के नाक, कान, काटकर हाथ में धर देने वाली कारस्तानियों के इतने किस्से पिछले दिनों हिंदुस्तान पहुंच चुके थे कि हम ‘तेरा क्या होगा कालिया’ किस्म की आशंकाओं के बीच डूब-उतरा रहे थे.

‘लो, आ गयी कार… मैं ‘ड्राइव-वे’ से उसे लेकर आता हूं.’ …हमारे उत्साहपूर्वक उठने के उपक्रम को ठंडा करता बेटा जल्दी से निकल गया और… वह घड़ी आ गयी. …दरवाजा भड़ाक से खुला और साक्षात ‘बैंडिट-क्वीन’ बनी अन्ना बर्फानी झोंकों के साथ बेतहाशा भागती हुई अंदर दाखिल हो गयी. सिर से पैर तक रंगीन फुलनों वाली स्नो-कैप, दबीज दस्तानों और जैकेट से लैस, पूरी एस्किमो बनी हुई. पीछे-पीछे लंच बॉक्स और बैग पकड़े आज्ञाकारी अनुचर-सा पिता. अन्ना ने एक उड़ती-सी नज़र सामने सोफे पर बैठे हम ‘नाचीज़ो’ पर डाली. (हमारे आने की भनक तो उसे थी ही.) फिर फुरती से जान-बूझकर हमारी अनदेखी करती, अपना जैकेट इस तरह उतारने लगी, जैसे वह बेहद व्यस्त है और हमारा अस्तित्व उसके लिए कोई खास मतलब नहीं रखता.

बेटे ने गला साफ़ कर सावधान, मृदु आवाज़ में कहा, ‘अन्ना! देखो दादा-दादी आये हैं, पैर छुओ.’

जवाब में, अब तक ऊपर जाने वाली सीढ़ी पर बैठ गयी अन्ना ने अपने दाहिने पैर का जूता बेपरवाही से झटकारा और बिना हमारी तरफ देखे दूसरे पैर का जूता निकालने लगी.

बेटे को यह बेअदबी खली-

‘अन्ना।-! नमस्ते करते हैं न दादा दानी को!’

अन्ना एक सख्त ‘हुम’ के साथ पिता की अनसुनी करती अब जैकेट उतार रही थी.

मां ने पिता की बेचारगी महसूस की. निधि आगे आयी- ‘अन्ना! तुम कितना तो पूछती थीं दादा-दादी को- और अब पास भी नहीं जा रहीं! जाओ बेटे!’

मुझे साफ-साफ महसूस हो रहा था कि अन्ना के माता-पिता बीच धार डूब रहे हैं. तक्षण, त्वरित निर्णय ले मैं उठ खड़ी हुई- ‘कोई बात नहीं, दादी खुद आयी जाती है न अन्ना के पास’, और एक तरह से जान हथेली पर लिये मैं आगे बढ़ी. पास पहुंची और उसके माथे पर बेहद आहिस्ते से एक सावधान चुम्बन कर लिया जाना, जैसे उस क्षण का महान घटित था. सबने अंदर-अंदर राहत की सांस ली.

अब चेहरे पर आयी नरमी और मुस्कान को बड़ी कुशलता से दबाती, वह दबंग आवाज़ में घोषणा कर रही थी कि कपड़े बदलकर वह रोज़ की तरह अपनी मनपसंद ‘कार्टून-स्ट्रिप’, ‘क्लिफर्ड’ (एक पिल्ले की नटखट कारस्तानियां) देखना पसंद करेगी. अविलम्ब वह चैनल लगा दिया जाए. और इसके साथ ही गुरूर से भरी हमें दिखा-दिखाकर, अपने जूते, जैकेट, दस्ताने उठाये, उन्हें क्लॉजेट में रखने जाने लगी. मैंने जैकेट थामने के लिए हाथ बढ़ाया तो उसने और ज़ोर से दबा ली. और इठलाते हुए यह दिखाने की कोशिश की मुझे किसी मदद की ज़रूरत नहीं, मैं अपने काम खुद कर लेती हूं. बेशक मेरी आंखों में आये प्रशंसा भाव से संतुष्ट लगी वह.

मदद? नहीं लेनी है किसी से. मदद लेना सबसे निकृष्ट आदत है. ‘हेल्प’ कीजिए, ‘हेल्प’ लीजिए नहीं. स्कूल और बड़ों द्वारा बच्चों में आत्मविश्वास सहेजने का सबसे कारगर तरीका. बेटा हंसता है, बच्चों को दी जाने वाली इस ट्रेनिंग से सबसे ज्यादा भला बड़ों का ही होता है न! सबसे ज्यादा टीचरों और अभिभावकों का ही.

मेरा ध्यान पूरी तरह इस पर था कि स्कूल से भूखी-प्यासी आयी बच्ची को कुछ खिलाया-पिलाया कब जाएगा? उससे कोई पूछ ही नहीं रहा. वह भले हमारी अनदेखी करे, हम तो नहीं कर सकते न! बड़ों की दुनिया में उसकी माकूल उपस्थिति सही तरीके से महसूसी जानी चाहिए. शायद हमारी अधीरता से तंग आकर हमें बताया गया कि अब उसे खाना होगा, वह ‘स्वयं’ मांग लेगी. आप लोगों को जबरदस्ती नहीं करनी है.

बहरहाल हिंदुस्तान के सबसे आधुनिक और ग्लैमरस शहर मुम्बई से गये हम तथाकथित मॉडर्न पति-पत्नी सकपकाए, हतबुद्धि से बैठे थे.

और ‘यहां’ एक-दो दिन नहीं, पूरे चार महीने बिताने थे. उफ, मुड़े-तुड़े घुटनों ने ‘लैंडिंग’ भी की तो कहां? पानी की न सही, बर्फीली सतह की इस छोटी-सी मगरी से वैर करके कहां जाएंगे हम? कैसे रहेंगे इस घर में जहां एकछत्र इसका तानाशाही आधिपत्य है.

अचानक मेरे अंदर से आवाज़ आयी- भिड़ंत-टक्कर… और हमने मन-ही-मन, मन मारकर ही सही, परिस्थितियों से भिड़ने के लिए कमर कस ली. मैंने उपाय निकाला- क्यों न इसके साथ दोस्ती गांठने की कोशिश की जाए…

अगले दिन हम उसके साथ बैठ गये. बैठने से पहले भूमिका बनायी कि ‘क्लिफर्ड डॉगी’ वाला कार्टून तो हमें भी बड़ा अच्छा लगता है. अन्ना चाहे तो हम भी उसके साथ बैठकर देखना चाहेंगे. उसने गम्भीरता से सिर हिलाकर स्वीकृति दे दी, जैसे कोई नामी सर्जन अपने साथ ऑपरेशन में शिरकत करने के लिए किसी जूनियर डॉक्टर को सहमति दे रहा हो.

हमारी बातें भी सम्भाल-सम्भालकर, आधी इंग्लिश, आधी हिंदी में हो रही थीं. इंग्लिश इसलिए कि भई हम भी मुंह में जुबान रखते हैं (अंग्रेज़ी की)… और हिंदी  इसलिए कि बेटे का सख्त निर्देश है कि अन्ना से हिंदी में ही बातचीत की जाए.

‘कार्टून देखने के दौरान जब एक बार क्लिफर्ड (कुत्ता) गिर गया तो हम पति-पत्नी बरबस हंस पड़े, लेकिन अगले पल सन्न रह गये. लड़की तक्षण यों पलटी जैसे- हम कुछ नागवार कर गुजरे हों. फिर हमें सीधी आंखों देखते हुए बोली- ‘दैट्स नॉट फनी.’ और वापस कार्टून देखने लगी.

थोड़ी देर और बीती. इस बार क्लिफर्ड के साथ खेलते बच्चों में एक ने दूसरे को छकाया. हंसी फिर छूट गयी. सकपकाये भी. लड़की सचमुच फिर खीझी और अपनी नन्हीं हथेलियों से सोफे पर सख्ती से धप्पा मारते हुए बिफरी-

‘हे गाइज! दैट्स नॉट फनी.’

हमारे अति शिष्ट सम्भ्रांत कुटुम्ब में पले सदाचारी बेटे की यह उद्दंड लड़की शिष्टता की सारी सीमाएं पार कर रही थी और हमारे मुंह सिले हुए थे.

मां ने नरमी-सख्ती के बीच की अनुशासित मुद्रा अपनाई और समझाने की कोशिश की-

‘अन्ना! दादा-दादी से इस तरह नहीं बोलते… यु शुड बिहेव योर सेल्फ.’

आश्चर्य, बगैर ज़रा भी डरे-सहमे, वस्तुस्थिति स्पष्ट करने के से निर्भीक लेकिन आवेग रहित भाव से वह बोली- ‘लेकिन दादा-दादी को भी ‘पुअर क्लिर्ड’ के लुढ़कने पर हंसना नहीं चाहिए था. मैं उन्हें सिर्फ यही बताने की कोशिश कर रही थी.’

मां ने फिर समझाने की कोशिश की- ‘ऐक्चुअली… बड़े लोगों से ऐसे नहीं बोलना चाहिए.’ ‘ओ. के…. लेकिन बड़े लोगों को भी ‘पुअर डॉगीज’ और बच्चों पर नहीं हंसना चाहिए न.’

अन्ना के शब्दों में किसी तरह का अपराध-बोध, डर या सहमियत बिलकुल नहीं थी, बल्कि एक गलत चीज़ को दुरुस्त करने का पुख्ता तर्क था. मां से ज्यादा आत्मविश्वास भी. थोड़ी ही दूर बैठे हुए और न सुनने का अभिनय करते हुए भी हमारा पूरा ध्यान उसी तरफ था. जिस इत्मीनान से वह अपनी बात पर डटी थी, उससे उसे गलत साबित करने की कोई सूरत दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही थी. पिछली पीढ़ी के हिंदुस्तानी बच्चों की तरह मां-बाप, दादा-दादी जैसे ‘ओहदों’ का बल पूरी तरह निस्तेज हो चुका था. सबसे महत्त्वपूर्ण, अन्ना वही कर रही थी, जो उसे बताया और सिखाया गया था. अर्थात किसी की असहायता, निरीहता पर हंसना शिष्टाचार के विरुद्ध है. हर बात-बेबात पर हंसते रहना भी बेतुकी बात है. दूसरे, ‘छोटे’ होने का अर्थ, कमअक्ल और नादान होना नहीं है. तुम्हें भी अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है. तुम्हारे प्रति किसी का भी व्यवहार असम्मानजक नहीं होना चाहिए. तुम्हें उसके प्रतिरोध का पूरा अधिकार है. शारीरिक प्रताड़ना ही नहीं, तुम्हें चिढ़ाने, तुम पर हंसने और मानसिक उत्पीड़न जैसी क्रियाएं भी आपत्तिजनक एवं तुम्हारे अपमान की प्रतीक हैं. डराने-धमकाने या मारने-पीटने का तो सवाल ही नहीं. माता-पिता भी अगर कुछ ऐसा-वैसा कहते हैं, तो बेखटके 
‘नाइन-वन-वन’ पर फोन कर तुम बच्चे भी पुलिस और प्रशासन से ‘सुरक्षा’ और ‘मदद’ का अनुरोध कर सकते हो.

ऐसा नहीं कि ये सारी बातें हमारी पढ़ी-सुनी नहीं थीं. लेकिन यहां दिखते उसके व्यावहारिक पक्ष पर हम हतप्रभ थे. संस्कृतियों के टकराव की यह विस्फोटक परिणति थी. ‘एटीकेटों के क्लैशों’ की भी. हम अन्ना को यह समझा ही नहीं सकते थे कि हमारी हंसी उपहासी और ‘इंसल्टिंग’ नहीं है. यह हमारी मुक्त, उन्मुक्त प्रकृति और जुड़ावों भरी संस्कृति की प्रतीक है बस.

 ओह! तो इसीलिए भारतीय माता-पिता पूरब और पश्चिम के बीच तालमेल बिठाने में एड़ी से चोटी तक लथपथ हैं.

लेकिन हमें फिलहाल सिर्फ अन्ना से मतलब था. हम इतनी आसानी से अपने अधिकार छोड़ने और घुटने टेकने को तैयार नहीं थे. कुछ अपनी आदतों से भी मजबूर. लाख रोकते-न-रोकते थोड़ी बहुत सीखें, नसीहतें अन्ना को दे ही डालती. शायद दूसरे या तीसरे सप्ताह की बात है. मैं उसे माता-पिता की अनुपस्थिति में दूध-सीरियल (दलिया) खाने का सही तरीका (बिना लापरवाही से इधर-उधर छलकाए) बता रही थी कि उसने बेहद ठंडे और दो-टूक लहजे में मुझे बड़े इत्मीनान से समझाया-

‘यू आर नॉट सपोस्ड टू टीच मी एनीथिंग’- ‘ओनली टीचर कैन टीच मी’- साथ ही मेरी सकपकाई मुद्रा को लक्ष्य कर अपनी बात को और ज्यादा स्पष्ट करते हुए बोली- ‘इन द स्कूल टीचर… इन द हाउस पेरेंटस- ओनली दे कैन टीच-यू आर नॉट माई टीचर’- (और ‘पेरेंट्स’ होने का तो सवाल ही नहीं.)

मैं सही मायने में औंधी गिरी थी. लेकिन जैसे ईश्वरीय प्रेरणा से ही अगले क्षण धूल झाड़कर उठ खड़ी हुई और पूरे आत्म-विश्वास के साथ मैंने अपने आपको उससे कहते पाया-

‘बट अन्ना! आयम योर ग्रैंडमदर… मैंने तुम्हारे पापा को भी टीच किया है, जब वे तुम्हारे जितने थे. शायद तुम्हें ये बात बाद में बतायी जाएगी कि स्कूल में टीचर और घर में मम्मी-पापा के साथ नाना-नानी और दादा-दादी भी बच्चों को ‘टीच’ कर सकते हैं.’

आश्चर्य! मेरी आशा के विपरीत उसके चेहरे पर एक सर्वथा नयी बात जानने का संतोष दिखा. मेरी बातों की ‘रीजनिंग’ से भी वह प्रभावित लगी. सबसे ज्यादा इस सत्य के उद्घाटन से कि उसे ‘टीच’ कर सकने वाले पिता को भी मैंने ही छुटपन में सिखाया, बताया.

फिर सहसा जैसे कुछ याद आ जाए, वह पूछ बैठी- ‘इसका मतलब, यू नो एवरी थिंग?’

अपनी कामयाबी पर संतुष्ट, मैंने तुरंत हामी भर दी, जबकि उसका प्रश्न इससे ज्यादा अर्थपूर्ण था. पिछले दिनों में ही कई बार दरवाजे की बेल और सेफ्टी अलार्म से लेकर रसोई, बाथरूम तक के सारे उपकरणों की जानकारी बेटे-बहू से लेते हुए उसने मुझे देखा था. लेकिन चूंकि मेरी ‘येस’ वजनदार लगी थी, उसने दुबारा ‘ओ. के.’ कहकर बात समाप्त कर दी.

अगली दोपहर नहा-धो, बालों में अपनी पसंद की क्लिपें लगवाकर वह मेरे पास आयी. मेरे द्वारा क्लिप पर बने फूल की प्रशंसा सुन उसका नाम जानने के लिए वह कम्प्यूटर वाले कमरे में दौड़ गयी, क्योंकि यही फूल उसकी मनपसंद ‘डोरा’ (कार्टून) में भी है. लेकिन चूंकि कम्प्यूटर का स्विच उसके कद से ज्यादा ऊंचा था, अतः उसने बड़े अधिकार से दादी को बुलाया और कम्प्यूटर पर लगे दो-तीन स्विचों को क्रम से ऑन करने का अनुरोध करने लगी. नया देश, नयी जगह और तमाम सारी स्विचें. मुझे हिचकते देख, अन्ना अपनी नन्हीं उंगलियों से ‘ये वाली नहीं’, ‘वो वाली’ का इशारा करती, मुझे समझाने की कोशिश करती रही. हर कोशिश के बाद उसकी बढ़ती बेसब्री देख मैंने हथियार डालते हुए कहा, ‘ठहरो बेटे, मैं तुम्हारे दादा को बुलाए लेती हूं.’

मेरा कहना था कि बगैर एक पल भी चूके, जैसी मेरी हां में हां मिलाती बड़ी समझदारी से अन्ना बोली- ‘आय नो, यू डोंट नो ऑल दीज थिंग्स.’ और बिना एक पल भी नष्ट किये, दादा को बुलाने दौड़ पड़ी.

लेकिन ऐसा कहते हुए न उसके स्वर में उपहास था, न चिढ़ाने या मजा लेने जैसा भाव. सिर्फ अपने लगाये अनुमान के सही निकलने का संतोष.

अब वह अपनी चमकती बिल्लौरी आंखें कम्प्यूटर पर टिकाये बड़े मनोयोग से ‘डोरा’ देख रही थी और मैं दुबारा स्तब्ध, कोशिश करके जमायी गयी अपनी साख की अन्ना द्वारा उड़ा दी गयी धज्जियां बटोर रही थी.

ऐसा अक्सर होता. दिन भर की गतिविधियां और हमारे आपसी संवादों के बीच उसका आत्मविश्वास और तर्क उम्र की तुलना में कहीं ज्यादा ठहरता, जबकि मेरा ज्ञान और समझदारी अधूरी और बचकानी साबित हो जाती.

अगली ही शाम खाना खाते हुए आपसी बातचीत में हमारी आवाज़ें थोड़ी तेज़ हुई नहीं कि कुछ ही दूर सीढ़ियों पर बैठी नल-दमयंती की कहानी के चित्र देखते-देखते (अभी पढ़ना कहां आता) वह सहज भाव से बेधड़क टोक देती-

‘हे गाइज! यू आर टॉकिंग लाउडली, आयम गेटिंग डिस्टर्बड’- (आप लोग ज्यादा जोर से बातें कर रहे हैं, मैं डिस्टर्ब हो रही हूं.) तब कानों की लरें लहक उठती हैं. माता-पिता चुप. फिर से ‘गाइज’. …कोई स्पष्टीकरण देने के बदले चुपचाप सॉरी कहकर आवाज़ धीमी कर ली जाती है, क्योंकि ध्वन्यार्थ तो यही है कि बड़ा हो या छोटा, हर किसी के ‘स्पेस’ और सुविधा का ध्यान दूसरों को रखना चाहिए.

लेकिन मैं भी इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थी. मेरे अंदर की प्रयोगशाला अन्ना को लेकर लगातार एक के बाद एक प्रयोग किए जा रही थी. जैसे एक दिन, इसी तरह किसी बात पर हमें हंसते देखकर जब उसने टोका तो उस समय ‘सॉरी’ कहने के थोड़ी देर बाद मैं उसके कमरे में गयी. थोड़ी देर अन्ना के साथ खेलते हुए मैंने उससे इंग्लिश में कहा- अन्ना! एक बात जानती हो? जब हम हंसते हैं, स्माइल करते हैं न तो बहुत ‘प्रिटी’ दिखते हैं…

उसने कुतूहल से मेरी ओर देखा तो मैंने कबर्ड पर लगे शीशे की ओर उसका चेहरा घुमाते हुए कहा, ‘तुम खुद स्माइल करके देख लो, तुम कितनी ‘प्रिटी’ लगती हो- तब तुम्हें दादी की बात पर विश्वास आयेगा.’

अपनी चुलबुली आंखें शीशे की ओर उठाते हुए वह सचमुच शरमाते हुए मुस्करा दी. मैंने पूछा, ‘बताओ, अच्छी लग रही हो न तुम?’

‘येस’- वह दुबारा सिर हिलाकर मुस्कराई-

त्री-शोभा और सौंदर्य के अंतरराष्ट्रीय प्रतिमान अपने नाम दर्ज कराती वह अपने अधबने-जू (चिड़ियाघर) को पूरा करने भाग गयी. लेकिन अपना ‘स्माइली’ चेहरा उसे सचमुच भा गया था. इसीलिए दूसरे दिन स्कूल से लौटते ही मुझे बताया गया- ‘दादी! आय टोल्ड माय टीचर, मिस लिजा, व्हेन वी स्माइल, वी लुक प्रिटी… मिस लिजा सेड- ‘यस’.

इस कामयाबी ने मुझे तिनके का सहारा दिया, बल्कि उससे कहीं ज्यादा. हिम्मत बढ़ी और उस देश, उस घर में अपनी स्थिति ज्यादा निरापद, ज्यादा सुदृढ़ होती महसूस हुई. अपने आपसे अपेक्षाएं भी बढ़ीं, आत्म-विश्वास भी. अब अन्ना की दृष्टि में हमें देखकर ‘एक कोई भी’ जैसा उपेक्षा भाव नहीं होता. उसकी जगह सचमुच के दादा-दादी होते, जो उसके गुस्से और शरारतों से लेकर खिलौनों तक की दुनिया में बराबरी से शरीक थे, जो घर में ‘बा’ (घरेलू व्यवस्थापिका) के होने के बावजूद उसे ज्यादा प्यार से खिलाते- पिलाते, उसके नाज-नखरे उठाते और कभी-कभी मम्मी-पापा के बीच से उसे थोड़ी छूट भी दिला देते. दोपहर और रात में सोने से पहले दुनिया-जहान की ढेरमढेर कहानियां सुनाते. पहले उसके चेहरे पर बना रहने वाला सपाट भाव अब गायब था.

इतना ही नहीं, अब तक वह हमारे हलके-फुलके भारतीय चुटकुले समझने और उन पर मजे लेकर हंसने लगी थी. छोटी कविताएं और कई आसान शायरी भी उसे कंठस्थ हो गयी थीं.

शब्द और संगीत के प्रति अन्ना के लगाव के महसूसकर मेरी कल्पना को पंख लग गये. अब मैं कभी भी जब अन्ना आस-पास होती, किसी गीत की तरह, ‘शांताकारं भुजंग शयनम्’ या ‘नीलांबुजं श्यामलं कोमलांगम्’ जैसे श्लोकों को सस्वर गुनगुनाने लगी. अन्ना अपने खेल या चित्रों वाली पुस्तक से सिर उठा, विस्मित-सी मेरी तरफ देखती और वापस अपने खेल में लग जाती. इसके ठीक तीन-चार दिन बाद जब मैं रात में अन्ना को सुलाने पहुंची तो मुझे सचमुच अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, अन्ना कह रही थी- ‘दादी! क्या आप वो ‘सांग्स’ गाकर मुझे सुला सकती हैं, जो आप दिन में गा रही थीं!’ फिर तो यह हर दिन का क्रम बन गया. और इसके कुछ ही दिनों बाद मेरा आकाश धरती पर उतर आया, जब अन्ना ने हाव-भाव और शुद्ध उच्चारण के साथ दोनों श्लोकों का सस्वर पाठ कर सुननेवालों को विमुग्ध कर दिया.

मैं साफ-साफ अन्ना के अंदर पसरती संस्कृतियों की यह बेदखली महसूस कर रही थी. वही भाषा और उन्हीं लोगों के बीच रहने पर भी अन्ना उनसे अलहदा है, यह वह समझती है लेकिन अजीब विडम्बना है कि न उसे उस संस्कृति से अलगाया जा सकती है, न उसी के भरोसे छोड़ा जा सकता है, क्योंकि अपनी जातीय चेतना, इतिहास और विरासतों से छूटा बचपन, कभी अपना समुचित विकास नहीं कर पाता. हम चाहकर भी बहुत ज्यादा जोड़-घटा नहीं सकते. यह जानते-बूझते भी खिलंदड़ी और जिज्ञासु अन्ना, बचपन की जिस प्रश्नाकुलता से गुज़र रही थी, उसे लेकर मैं तरह-तरह की योजनाएं और प्रयोग आजमाने से बाज नहीं आती. द्वंद्व यह भी कि शुरूआत आखिर किस छोर से की जाए? क्योंकि बेशक हमें स्वीकार लिया था अन्ना ने, लेकिन चीज़ों को लेने और सोचने के उसके तरीके हमसे बहुत अलग थे. हिंदी बोलने पर ज़ोर देने वाली बात पर भी वह बिगड़कर कहती- ‘हवाइ शुड स्पीक हिंदी?’

(निस्संदेह अब हमारे आने के बाद, कम-से-कम यह वाजिब तर्क अन्ना की समझ में आ गया कि दादी-दादा हिंदी बोलते हैं, इसलिए.)

अंग्रेज़ी शब्दों के सही उच्चारण के लिए अन्ना, हमें तो हमें, अपने माता-पिता को भी नहीं बख्शती.

स्वयं हमारे लिए भी हिंदी-अंग्रेज़ी के बीच की शंटिंग के साथ-साथ यह सावधानी बरतनी आवश्यक थी. अमेरिकन ‘एटीकेट’ से जुड़े ‘डूज’ और ‘डोंट्स’ भी इसलिए याद रखने पड़ते, जिससे साढ़े चार वर्ष की अन्ना को हमारी वजह से अपनी अमेरिकन सहेलियों ‘हैली’ और ‘एन’ के सामने झेंप और हीनता न महसूस हो.

इसी अन्ना के बीच से हम और ज्यादा निखरी, तराशी और सुलझी हुई अन्ना पा  सकें, क्योंकि उसकी आत्मविश्वास से कही गयी बातें, स्पष्टवादिता और तर्कशक्ति हमें निरुत्तर कर देने के बावजूद चमत्कृत और गर्वित भी करती थी.

चमत्कृत हम, उसकी शर्तें मानते चले गये. मैंने उसकी दिनचर्या के साथ अपने को घुला-मिला दिया. वह सोत्साह मुझे अपने उन खेलों में भी शरीक करने लगी जो दिलचस्प होने के साथ-साथ मज़ेदार और कल्पनाशीलता से भरे होते.

कभी भी अचानक धूमकेतु सी एंट्री लेती और एक कुशल निर्देशक की तरह घोषणा कर देती- ‘दादी! नॉउ वी विल प्ले ‘स्लीपिंग-ब्यूटी’ …दादा ‘प्रिंस चार्मिंग’ होंगे और मैं ‘अरुरा’… स्लीपिंग-ब्यूटी… नहीं, मैं प्रिंस चार्मिंग नहीं बन सकती! कहा न, मुझे बस गर्ल बनाया है. …दादी! आपकी ‘राइटिंग’ कब तक खत्म होगी? …मुझे सिंड्रेला वाला प्ले करना है… आप पहले ‘स्टेप मदर’ हो जाइए- बाद में ‘फेरी मदर’ …आप मैजिक-बांड घुमाकर सिंड्रेला के लिए कैरेज (रथ) तैयार करेंगी… और मैं सिंड्रेला बनूंगी, ये रहे मेरे ‘ग्लास सैंडल्स’. वह बच्चों के फैंसी-ड्रेस वाले चमचमाते सैंडल्स दिखाते हुए कहती है.

मैं जानबूझकर असमर्थता जताती हूं- ‘लेकिन अन्ना! मैं ‘कैरेज’ (रथ) भला कैसे बना सकती हूं.’

‘ओफ्फोह! प्रिंटेड… (स्वांग करिये) देखिए, ऐसे…’ वह हाथ में पकड़ी ‘स्टार’ वाली छोटी स्टिक घुमाते हुए कहती है- ‘समझ गयीं? नाउ, स्टार्ट… अरे दादा को बुलाइए- उन्हें ‘प्रिंस चार्मिंग, बनना है न!’

हंसी का फौव्वारा छूट पड़ने को होता, लेकिन हमें अपने चेहरों पर इसका आभास भी लाये बिना, पूरी गम्भीरता बरतनी होती; क्योंकि अन्ना तब तक अभिनय में डूबकर अपने पात्र के साथ तद्रूप हो गयी होती.

इतनी छोटी होने के बावजूद अन्ना खुद अपनी मरजी, अपने मूड के मुताबिक काम करती है. अकसर हमारे कुछ कहने-पूछने पर दो-टूक ‘नो-थैंक्यू’ या ‘आई डोंट वांट.’ …मुझे ‘यह’ करना है और ‘यह’ नहीं करना है के नाम पर एक तरह से दिनचर्या के नाम पर अन्ना की ही मनमानी चल रही थी. थोड़ी अनुशासन की लगाम कसनी ज़रूरी है. दूसरों के समय, काम और ‘स्पेस’ के महत्त्व को भी रेखांकित करना है. दादी की स्पेस, दादी के ज़रूरी काम! आखिर कब समझेगी अन्ना! इसलिए दरवाजा बंद कर हफ्तों से छूटे कागज, नोट्स चारों तरफ फैला इत्मीनान से बैठ गयी.

अपेक्षाकृत आसान चीज़ों पर कलम चलाना शुरू कर दिया. बमुश्किल पांचवें पैराग्राफ तक पहुंची थी कि दरवाजे पर  अधिकारपूर्ण थपकी पड़ी- इतनी तेज़ कि सोता हुआ आदमी भी ‘सोते रहने’ का झूठ नहीं बोल सकता, और ऐसी थाप माता-पिता के दरवाजे पर तो हर्गिज नहीं दी जा सकती थी- मैंने कागज़ एक तरफ खिसकाकर दरवाजा खोला तो सामने अन्ना थी- आंखों में रोष, उलाहना और धमकी एक साथ- ‘दादी! मैं कितनी देर से आपका इंतज़ार कर रही थी कि दादी कहां गयी! आपको पता है, हम अपने प्ले के लिए कितने लेट हो रहे हैं! और अब तो मेरा दुद्धू पीने का भी टाइम हो गया है.’

उससे ज्यादा अपनी नज़रों में अपराधिनी हो आयी मेरी मुद्रा को उसने पहचाना, नरम हो आयी- ‘इट्स ओ. के… कोई बात नहीं. मैं दुद्धू पीती-पीती फ्लफी-फ्लफी’ खेलती हूं. आई मीन मैं और आप. ओफ्फोह ‘फ्लफी’ को नहीं जानतीं आप? द क्यूट लिटिल पपी-बट, शी इज अ गर्ल पपी. …नाउ, (अब) आयम ‘नॉट’ अन्ना. आयम फ्लफी. आप मुझे अन्ना नहीं, ‘फ्लफी’ बुलाएंगी. लेकिन मैं गर्ल डॉगी हूं- बॉय डॉगी नहीं, समझीं आप!

सहसा वह थोड़े डपटने के अंदाज़ में फुसफुसाती है- ‘दादी! आपको फ्लफी को पैट करना चाहिए. ‘पेट्स (पालतू जंतुओं)’ को ‘पैट’ (पुचकारते) करते हैं.’

उसके आदेश पर फौरन अन्ना की पीठ सहलाते हुए मैं ‘फ्लफी डार्लिंग’ वगैरह भुनभुनाने लगती हूं. जवाब में वह मेरे अभिनय से खुश होकर पिल्लों की तरह कान खुजाकर खुशी जाहिर करती है.

लेकिन यह क्या-अन्ना! तो एक छलांग- सी मार नीचे उतरी और फर्श पर मेज के बीचोबीच पैर सिकोड़कर पिल्लों की तरह बैठ गयी.

परेशान, हलकान मैंने पुकारा- अन्ना! सॉरी, फ्लफी! अपना दुद्धू पिओ बेटे… फिनिश इट. मैं बुरी तरह ऊब-थक रही थी कि वह दुबारा फुसफुसाकर मुझे डांटती हुई बोली- ‘शः! दादी! बोलो मत, फ्लफी को नींद आ रही है!’ कहते हुए पिल्लों के अंदाज़ में बैठी उसने झप से आंखें मूंद लीं. नींद! मैं चौंकने से ज्यादा, रुआंसी हो आयी, लेकिन यहां दूध जो रखा है अन्ना, सॉरी, फ्लफी के पीने के लिए.

‘ओ… दादी, अब तो फ्लफी जगने के बाद ही दुद्धू पीएगी. आप पुचकारकर खिलाएंगी न! तो ‘फ्लफी’ बिस्किट, कुकीज भी उछल-उछल कर खाएगी, कूं-कूं भी करेगी… लेकिन अभी नाइट है. फ्लफी सो रही है. उसे डिस्टर्ब मत करो.’

मेरे हाथों के तोते उड़ गये.

और वह हाथ-पांव सिकोड़, एकदम पिल्लों की तरह ही नकली नींद में सो गयी. लेकिन ओठों पर स्लीपिंग ब्यूटी वाली निश्छल और शरारती मुस्कान कायम थी.

आंखें बंद किये हुए भी अन्ना अंदाज़ रही है, उसे विश्वास है, दादी अपनी भूमिका में खड़ी उतरेंगी. ‘चीटिंग’ नहीं करेंगी. मैं यही कोशिश करती हूं.

अर्थात जो कुछ वह कहती है, जो कुछ वह चाहती है, जिसमें उसे खुशी मिलती है. लेकिन यह गलत है कि खुशी सिर्फ उसे मिलती है या सिर्फ मैं ही उसके लिए त्याग जैसा कुछ करती हूं. दरअसल, यह हम वयस्कों की सबसे बचकानी सोच है कि हम बच्चों को शिक्षा ज्ञान से समृद्ध करते हैं. हम तो उनके सामने बासी, घिसे-पिटे विचारों, संस्कारों और संहिताओं की जूठन डालकर उसे उठाने के लिए उन्हें बाध्य करते हैं. जबकि बच्चे हमें इस स्वार्थ, दम्भ, चालाकियों भरी दुनिया से दूर, अपनी करामाती, कल्पनाओं वाली मुक्त, उन्मुक्त दुनिया में ले चलने के लिए ठुनकते हैं, ज़िंद करते हैं. अन्ना के हठ, इन्हीं भ्रमों से मुझे निवृत्त कर रहे हैं. समृद्ध कर रही है, वह मेरे बंजर मैदानों में हरी-भरी फसल-सी लहलहाती हुई. तंद्रा टूटती है. आंखें मुलमुलाती, अन्ना फुसफसा रही है- ‘दादी! फ्लफी सो गयी, उसे ब्लैंकी ओढ़ा दीजिए. मुस्कराती मैं उस पर अपनी चुन्नी डालकर ‘बा’ से दूध का ‘बोल’ ढकने को कह उसके उठने का इंतज़ार करने लगती हूं.

पैंसठ की उम्र में पांच साल की यह खिलंदड़ी, शोख लड़की, अपनी उंगलियों पर नचा रही है मुझे.

एक बात और, खुद उसे भी अब हमारी दुनिया आकर्षित करने लगी है. काफी पास से, कुतूहल और उत्कंठा से देखने लगी है वह अब इस वाली दुनिया को. अनजाने इस पर गर्व भी महसूस करने लगी है. क्या मैं समझती नहीं!

पिछले सप्ताह ही अपनी नयी अमेरिकी सहेली ‘लिज’ के आने पर, सीढ़ियों से उसे ऊपर ले जाती हुई अन्ना, हमें दिखाकर  एक पल को ठहरी- ‘दे आर माय दादा-दादी, लिज! ग्रैंड पेरेट्स. वी टच देयर फीट. बट ‘यू’ कैन डू जस्ट नमस्ते.’

वह शायद चौबीस मार्च की सुबह थी. होली के एक दिन पहले! हलके बर्फ/स्नो के फाहों से पेड़-पौधे पूरी तरह ढक गये थे. लॉन, डेक, घर की छत की ढलान, सब सफेद… होली पर इतनी सफेदी! बरदाश्त नहीं हो रही थी. ठंड और बढ़ी है. रात का तापमान माइनस चार-पांच के बीच. मैं बेसब्री से सोचे जा रही हूं कि इसमें आखिर कैसे मनेगी, बच्चों से कहूंगी, थोड़ी हलदी ही मल दो एक दूसरे के चेहरों पर और बची हुई बाहर फैली बर्फ की चादर पर छिड़क दो. मन बेहद उदास हो आया.

अगले दिन अपना देश बहुत याद आया- बचपन से अब तक हर शहर, हर घर की यादों के बरक्स ही खेली जा रही थी होली. तभी सूझा- ठीक, क्यों न आज अन्ना को होलिका और प्रह्लाद की कहानी सुनाकर होली मना ली जाए! आखिर इस तरह खाली-खाली होली कैसे बीत जाने दी जाए! बुलाया, तो वो अपनी सारी ‘बार्बीज’ को जू दिखाने ले जा रही थी. बाद में फुरसत से आयी. मैंने कहा- ‘आज दादी तुम्हें होली स्टोरी सुनाती हैं.’ छूटते ही बोली- ‘आइ नो. मैं जानती हूं, हिरण्यकशियुप की न! मैंने ‘दशावतार’ में पढ़ी है. हिरण्यकशियुप वाट अ बैड ‘गाइ’. वेरी बैड ‘गाई’ नॉट लाइक हनुमान और जटायु. मैंने गणेश और कुबेर की भी स्टोरीज पढ़ी हैं. राम और किशनजी की भी.’

‘तो तुम्हें सबसे अच्छा कौन लगता है?’

‘सबसे अच्छी तो मुझे सीता, उर्वशी, शकुंतला और सत्यभामा लगती है…’

मुझे ज़ोर की हंसी छूटी. उसने घूरकर मुझे देखा. मैंने तक्षण सम्भाला. वह आश्वस्त होकर बताने लगी- ‘मुझे बैड गाइ रावण बहुत खराब लगता है- वह सीताजी को उठा ले गया था न- बट जटायु वाज अ नोबुल गाइ. ही ट्राइड टु हेल्प सीता- ऐंड हनुमानजी वाज वे।-।-।-री ब्रेव-अच्छा दादी वो कौन सा माउंटेन था, जिस पर हनुमान ने रेस्ट किया था… आपको पता है हैली हनुमान को हनीमन कहती है और मंकी गॉड भी कहती है और कहती है, वी डोंट वरशिप मंकी गॉड्स… वी डोंट वरशिप योर गॉड्स-दे आर ब्लू गॉड्स, डार्क ‘स्किन गॉड्स.’

‘कोई बात नहीं- तुम कह दिया करो कि सभी गॉड्स अच्छे होते हैं और हम सभी को सिर झुकाते हैं.’

‘येस! देयर आर सो मैनी गॉड्स, हंड्रेड्स थाउजेंड्स ऑफ गॉड्स, वी हैव गॉट (हां, हमारे पास कितने सारे भगवान हैं.) …जैसे किशनजी… और राम भी तो कितने अच्छे हैं… बट, आई लाइक सीता…

उन साढ़े पांच महीनों में अन्ना को सुनाई जाने वाली कहानियों का सिलसिला रामायण, महाभारत, ध्रुव, प्रह्लाद, अरेबियन नाइट, हातिमताई से शुरू होकर ‘शेखचिल्ली’ से होता हुआ ‘कबरी बिल्ली’, (प्रायश्चित्त) ‘ईदगाह’, ‘हार की जीत’ और ‘साइकिल की सवारी’ तक आ गया था. सुनते हुए उसे लगता, कहानियां रुकनी नहीं चाहिए, चलती रहनी चाहिए. वह नाश्ता करती रहे, कहानी चलती रहे, खाना खाती रहे, कहानी चलती रहे. सोते हुए तो खैर इस धारावाहिक की कई किश्तें एक साथ पूरी करनी होतीं.

एक बार उसकी डॉक्टर मां ‘कॉल’ पर थी. (हॉस्पिटल की लम्बी अनिवार्य ड्यूटी) और उसे बुखार था. शरीर में भले दम न हो, लेकिन मस्तिष्क तो ओवर ऐक्टिव. लेटे-लेटे भला कितना खेल सकती थी. मैं भी एक-दो कहानियां सुनाकर थक गयी थी. उसे शायद लगा, मैं थकान की वजह से उसे कोई बुक पकड़ाकर खिसक न जाऊं और मम्मी के जल्दी आने के तो कोई आसार नहीं. अचानक बोली, ‘आप टायर्ड हो गयीं हैं न! …तो मैं आपको स्टोरी सुनाती हूं. आपको पता है, देयर वाज अ किंग… मींस अ किंग डैड… ऐंड अ क्वीन मदर… उनकी एक प्रिंसेस थी, प्रिटी प्रिंसेस… विद लां।-।-ग हेयर… ऐंड रोजी चीक, ऐंड डार्क आइज… ऐंड हर नेम वाज शकुंतला…’

‘लेकिन अन्ना, शकुंतला तो कण्व ऋषि के आश्रम…’

‘दादी! ये मेरी बनायी स्टोरी है- दुष्यंतवाली नहीं. हां तो सुनिए! शकुंतला यानी प्रिंसेस के पास एक तितली थी- उसके पंखों पर हरी, लाल, नीली, पीली बुंदकियां थीं- तितली कभी भी गर्ल हो जाती थी… (जब उसे प्रिंसेस के साथ खेलना होता था…) एक बार क्वीन और किंग पैलेस की पार्टी में थे. घूमते-घूमते एक राक्षस आ गया. उसने तितली को पकड़ लिया. तितली रोने लगी. प्रिंसेस शकुंतला ने राक्षस के हाथ पर ब्रेव अर्जुन की तरह तीर चला दिया. राक्षस हाथ खुजाने लगा. तितली फुर्र से उड़कर अपनी फ्रेंड शकुंतला के पास आ गयी. तितली बहुत खुश हुई. उसने शकुंतला को अपने जैसे दो पंख दिये. दोनों आसमान में उड़ने लगीं? …बीच-बीच में एक और राक्षस, स्ट्रॉबेरी आइस्क्रीम, जांबवान और प्रिंस चार्मिंग भी मनमाने तौर पर आते-जाते रहे. ऊबने के बावजूद रोकने-टोकने की गुंजाइश थी ही नहीं, सिर्फ सुनते जाना था- इसलिए मैं चेहरे पर उत्साह बनाए हुए थी. अचानक अन्ना कहानी सुनाने के बीच बोली- ‘आपको पता है, मैं आपको इतनी लां।-ग और अच्छी कहानी क्यों सुना रही हूं? क्योंकि आप मेरे साथ खेलती हैं, बिकॉज यू प्ले विद मी.’

अब तक शायद मुझे भी अन्ना के साथ खेलने की लत पड़ चुकी थी. कहीं-न-कहीं मेरा अवचेतन उसके बुलाने का इंतज़ार करता.

पैंसठ की मैं बेहद खुश थी कि ‘पांच’ की अन्ना ने मुझे अपनी दुनिया में बराबरी का हकदार बनाया है. इस समय भी चौथाई कमरे के घेरे में उसका फार्म हाउस सजा हुआ था, जिसे वह अंतिम तरतीब देने में व्यस्त थी. चारों तरफ खिलौने के ही छोटे-छोटे हरे-भरे पेड़ों, गुफाओं (केव्स), पौंड्स, तालाब, बावड़ी, कॉटेज और अलग-अलग घेरों के बीच, शेर, बंदर, भालू, चिंपाजी, कंगारू, जेब्राओं की पूरी पलटन… हंसती, मुसकराती मछलियां तो थीं ही, इन दिनों अन्ना की सबसे ज्यादा फेवरिट, दर्जनों रंगों की ‘रेनबो पोनीज’ भी थीं. मनभावन रंगों के हज़ारों शेड्स में मिलने वाली ये ‘घोड़ियां’ बच्चों के अमेरिकी बाज़ार की नयी ट्रिक थी, जो इन दिनों बिक्री के नये कीर्तिमान स्थापित कर रही थीं. तरह-तरह की इंद्रधनुषी पूंछों, रेशमी बालों, हेयर क्लिपों, बैंडों और रिबनों से सजी इन ‘पोनीज’ की हेयर स्टाइलें बनाने तक के उपकरण बाज़ार में मौजूद थे. इसलिए सारे टॉय-स्टोरों में बच्चे इन दिनों अलग-अलग रंग शेड्स और नामों की पोनीज, ढूंढ़ने, इकट्ठा करने और अपने ‘सेट’ बनाने के दीवाने थे.

यूं दैत्यों, राक्षसों और ‘बैड गाइज’ की भी भरमार थी अन्ना की इस दुनिया में;  लेकिन वे ज्यादा देर तक उसकी दुनिया में टिक नहीं पाते थे. उनका नाश करने की सारी ‘ट्रिकें’ उसने ‘अमर चित्र’ कथा देख-देखकर रट डाली थी. इसलिए जीत हमेशा गुड और ‘नोबल गाइज’ की होती थी. दैत्यों का विनाश भी स्वयं नहीं करती थी, बल्कि काल्पनिक बहादुर चरित्रों से करवाती थी; क्योंकि वास्तविक जीवन में अन्ना चाहे जितनी गुस्सैल, जिद्दी और मारामारी करनेवाली रही हो, खेलों के दौरान हमेशा अतिशय, विनम्र, मृदु और मुसकराती हुई अन्ना ही नज़र आती थी. सबसे ज्यादा उसे सीता बनकर अशोक-वाटिका में बैठना, रावण द्वारा हरण किये जाने पर एक-एक आभूषण निकालकर फेंकते जाना और राम से रावण को मरवाकर, मुसकराते हुए राम के साथ सिंहासन पर बैठना पसंद था. चूंकि कृष्ण-लीला में राधा या गोपियों वाली भूमिका ज्यादा ऐक्शन-पैक्ड नहीं होती थी, इसलिए कभी-कभार सत्यभामा बनकर कृष्ण के साथ चौपड़ या लूडो खेल लिया करती थी. मक्खन चुरानेवाला प्रसंग एक तो थेफ्ट (चोरी) से जुड़ा था, दूसरे उसके लिए ग्वाल-बाल (बॉय) बनना पड़ता, जो उसके उसूलों के खिलाफ़ था.

बेशक कृष्ण के फ्रेंड सुदामा का आगमन उसे विह्वल कर जाता था. दौड़ी-दौड़ी जाकर वह खुद ही बाथरूम से प्लास्टिक का छोटा टब उठा लाती. पूरी गम्भीरता से सुदामा की मलहम पट्टी में कृष्ण को सहयोग देती. जितना सिखाया बताया गया रहता, उससे कहीं ज्यादा लम्बे और मौलिक संवाद बोलती, जैसे-जब कृष्ण बनी दादी, सुदामा बने दादा के पैरों के कांटे निकालने के संवाद बोल रही होती, तो दयार्द्र अन्ना दौड़-दौड़कर कृष्ण को डिटॉल, ‘बैंड-एड’ लाने और लगाने का सुझाव देती रहती. उनकी आंखों में अपार करुणा होती. ‘पुअर हंग्री सुदामा’ को काजू कतली, केक ब्राउनी, कुकीज ला-लाकर खिलाती और कृष्ण से उसे, रूबी, डाइमंड वगैरह देकर अपने ‘चैरट’ पर उनके लिए बनवाये नये पैलेस (महल) में भिजवाने के लिए कहती.

लेकिन जाते हुए सुदामा को हाथ हिलाने के बाद कृष्ण से कहती- ‘कृष्ण! तुम्हारे फ्रेंड सुदामा तो चले गये. अब चलो किसी ‘बॉल’ में डांस के लिए चला जाए.’

एक बार तो उनके संवाद की मौलिकता ने पूरे घर को हैरतअंगेज हंसी से धराशायी ही कर दिया. हुआ यह कि हर बार सत्यभामा बनी अन्ना देखती कि थोड़ा-सा ‘पोहा’ (चावल) लाने के बावजूद सुदामा ‘नहीं-नहीं’ करते हुए मना कर रहे हैं. कृष्ण धोखे से ही उनकी पोटली खींचकर सत्यभामा के सामने रख रहे हैं.

अन्ना ने मन-ही-मन निर्णय लिया और नाटक का समापन कुछ अलग तरह से कर दिया. वह इस तरह कि सुदामा के जाने के बाद आपसे आप कृष्ण से बोली- ‘जानते हो कृष्ण! मैं भी तुम्हारे लिए एक प्रेजेंट लायी हूं, ठहरो, तुम्हें दिखाती हूं. और देखो, मैं तुम्हारे फ्रेंड सुदामा की तरह झूठ भी
नहीं बोलती.’

सुदामा की अपनी अच्छी भेंट देने में हिचकिचाहट वाली बात को झूठ बोलना समझ लेना और बड़ों द्वारा सिखाये एटीकेट को ट्रंपकार्ड की तरह इस्तेमाल कर लेने वाली बात पर जहां हम चकित थे, वहीं अन्ना अपने सच बोलने पर बड़ों द्वारा ‘गुड जॉब’ जैसी शाबाशी की अपेक्षा करती हमारी तरफ देख रही थी. सुदामा के पैरों में लगी चोट, खरोंचें, कांटों आदि से तो वह करुणा विगलित थी, लेकिन निर्धनता, भूख और गरीबी को वह कैसे महसूस करती?

स्कूल से कोई होमवर्क नहीं मिलता. मिलता भी तो बहुत हलका, दो बिंदुओं, रेखाओं का मिलाने या रंग भरने जैसा. रूखे-सूखे अक्षर ज्ञान की जगह चित्र पहेलियां. माता-पिता पर कोई बोझ नहीं. लेकिन घर पर हिंदी सिखाने का दायित्व तो हिंदुस्तानी अभिभावकों का बनता ही था. खड़ी, आड़ी पाई वाली अभ्यास-पुस्तिका भी भारत से मंगायी जा चुकी थी.

ज़रूरी था, अन्ना की दिलचस्पी वाले कुछ ऐसे शब्द तलाशना, जो छोटे हों, लिखने में आसान हों और अन्ना को खुश करने वाले हों. और तक्षण सूझ भी गया. नाना- यूं नाना से ज्यादा मन ‘दादा’ के लिए लालायित था, लेकिन फिर ठहरकर सोचा, घर की सारी व्यवस्था देखने वाली गुजराती महिला ‘मीना बेन’, अर्थात बच्चों की ‘बा’ से क्यों न शुरू किया जाए! मात्र एक अक्षर का शब्द.

तक्षण निश्चय लिया, लेकिन यह भी मालूम था कि इस महादेश में किसी भी चीज़ या काम के साथ ‘फन’ और ‘एक्साइटमेंट’ जैसे शब्द अवश्य जुड़े होने चाहिए. सो उस लिहाज से भी शुरुआत ‘हिट’ रही. भूमिका कुछ इस तरह बनायी- ‘तुम्हें मालूम है अन्ना! तुम ‘बा’ लिख सकती हो?’ ‘यू कैन हैव लॉट्स ऑफ फन’ …उसने कौतूहल से आंखें झपकाईं- ‘कैसे?’ …‘वेरी इजी-लाओ स्लेट… एक लेटी लाइन, एक खड़ी लाइन और उसकी बगल में एक ‘बॉल, और इस बॉल को बीच से डिवाइड कर दो- अब यह तुमने ‘बा’ लिख लिया.’

‘इज इट?’ उसने झटपट लिखा और खुशी से उछलती, दोनों हाथों से स्लेट लिये, चपातियां सेंकती ‘बा’ के पास पहुंच गयी… ‘बा।-।-।-! देखिए- मैंने आपका नाम लिखा है ‘बा’. फिर तो ‘बा’ की खुशी और तारीफों की बौछार ने उसे फिरकनी बना दिया. देखते-देखते स्ट्रेट लाइन में ‘टैप’ यानी ‘नल’ लगा देने से बने ‘नाना’ बॉस्टन आ गये- और अगर ‘नाना’ को चुन्नी उढ़ा दी जाए… (विच इज क्वाइट फन्नी नो ?) तो ‘नानी’ भी बन जाएगी. पहले दिन अपनी इस उपलब्धि से वह ऐसी किलकती फिरी कि बिहारी का दोहा- ‘बौरी लौ दौरी फिरै, अंगना, अंगना माहिं’ याद आ गया.

फिर तो सीखने और सिखानेवाले के हौसले ने वह स्पीड पकड़ी कि हफ्ते भर के अंदर ‘बा’ के बाद बुआ और पापा के बाद ‘फूफा’ आसान हो गये. लेकिन ये तो चौके-छक्के थे, सेंचुरी तो तब बनी, जब सातवें दिन ही अन्ना अपने सबसे मनपसंद हिंदी गाने की पहली पंक्ति लिख गयी. गाना था- ‘ईचक दाना, बीचक दाना, दाने ऊपर दाना.’ पूरी पंक्ति में एक बड़ी ‘ई और एक ए’ की मात्रा छोड़कर ‘नाना’, ‘पापा’ की तरह ही. अर्थात सिद्धांत की एकरसता को तोड़ते हुए बिना जरा भी रट्टा मारे, अन्ना मौका पाते ही चाचा, मामा, काका, नाना-सबके साथ चुन्नी उढ़ा-उढ़ाकर ‘टू-इन-वन’ का खेल खेलने लगी. बेशक ‘दादा-दादी’ और ‘मौसा-मौसी’ इस क्यू में सबसे पीछे थे.

पुत्र और पुत्र-वधु तो निहाल थे ही, मैं स्वयं अनायस ही मिली इस चमत्कारिक उपलब्धि पर चकित थी.

अन्ना में मात्र जिज्ञासा और उत्कंठा ही नहीं थी, पूरे धैर्य से दृश्यों के विस्तार और गहराई में जाने की रुचि भी थी. यही उत्कंठा, धैर्य और तृप्ति का भाव उसके चेहरे पर ‘साइकिल की सवारी’, ‘कबरी बिल्ली’ (प्रायश्चित्त) ‘ईदगाह’ और ‘हार की जीत’ जैसी कहानियां सुनते वक्त होता. कहानी के उतार-चढ़ाव के साथ बोलती उसकी मुख-मुद्राएं स्पष्ट कर देतीं कि एक-एक शब्द का भाव, रस, पूरी सम्पूर्णता में ग्रहण कर रही है वह.

मुझे उसकी हंसी भी अब ज्यादा खुली-खुली, उन्मुक्त-सी लगती. ज़िंदादिल खिलखिलाहटों से भरपूर, एक ‘पूरी अन्ना’ अब जाकर मुझे मिली थी.

यह वापस मिली अन्ना एक तरफ जहां सड़कछाप शायरी में निष्णात थी, वहीं दूसरी तरफ ‘झांसी की रानी’ कविता की ओजपूर्ण पंक्तियों से होती हुई, ‘कस्तूरी तिलकम, ललाट पटले, वक्षस्थले कौत्सुभम्’ तक चली जाती थी. बच्चों की मजेदार कविताओं और गीतों की तो दीवानी थी वह.

कविताओं से उनका रिश्ता टूटने न पाए, रुचि बनी रहे, इसलिए आठ-दस मिनट की अंताक्षरी भी कर ली जाती थी. अंताक्षरी में ‘ब’ से गिराते ही वह पूरे जोश-खरोश से शुरू हो जाती-

बुंदेले हरबोलो के मुख हमने सुनी कहानी थी

खूब लड़ी मरदानी वह तो झांसी वाली रानी थी

सुननेवाले ताज्जुब करते। उन दिनों भारतीय परिवारों के बीच ‘अन्ना की हिंदी’ चर्चा का विषय बन गयी थी.

मुझे याद है, प्रेमचंद की ‘परीक्षा’ कहानी का वह प्रसंग, जहां देवगढ़ के दीवान, सरदार सुजान सिंह रियासत के लिए नया दीवान चुनने के लिए बूढ़े किसान का वेश धारण कर, अपनी बैलगाड़ी कच्ची सड़क पर फंसा देते हैं और दीवान के पद के लिए उसी युवक को चुनते हैं, जो बूढ़े किसान बने सुजान सिंह की फंसी बैलगाड़ी निकालने में मदद करता है. अन्ना पूरे औत्सुक्य से एक-एक शब्द ध्यान से सुनती- ‘बैलगाड़ी’, ‘बैल’, ‘दीवान’ आदि का मतलब समझती और अंत में दयालु, उदार युवक के ‘दीवान’ बनने की खुशी उसके सर्वांग में छलकने लगती. उत्तेजना का आलम यह था कि बाद में दूसरी-तीसरी बार कहानी सुनते हुए- वह बूढ़े किसान की फंसी बैलगाड़ी का प्रसंग आते ही अपने को रोक न पाती और बरबस कह पड़ती- ‘वे किसान सरदार सुजान सिंह ही थे… ‘प्रिटें।-ह’ कर रहे थे न!’

ये कहानियां उसके बालमन की अभिन्न सहचरी बन गयी थीं. अकसर खाने-नाश्ते की मेज पर अपने माता-पिता से अनुमति लेने की कोशिश करती कि क्या वह इस दौरान भी कहानियां सुन सकती है? क्या हर दिन सुबह नाश्ते की मेज पर स्टोरी-सेशन नहीं किया जा सकता? वह प्रॉमिस करती है कि अपना दूध-दलिया समय पर खत्म करेगी और खाते हुए चम्मच से प्लेट भी नहीं बजाएगी.

अपने जिज्ञासु, कौतुकी संसार से बड़ी सहजता से इन कहानियों को सहेज रही थी वह; बल्कि इनके प्रति आकर्षण का स्थान अब सम्मोहन ने ले लिया था. बड़ी सहजता से उसके एक ओर यदि सिंड्रेला, स्नो-व्हाइट और स्लीपिंग ब्यूटी थी, तो दूसरी तरफ सत्यव्रती राजा हरिश्चंद्र से लेकर बाबा भारती, सीता, सत्यभामा, शकुंतला, रामू की बहू और हामिद के चिमटे वाली दुनिया. बहुत विस्तृत था उसका मानस-लोक. इन सारी कहानियों का पूरा नेपथ्य और परिवेश अब उसका जाना-पहचाना था. अर्थात समाज-देश अब पूरी भव्यता से प्रविष्ट हो चुका था, अन्ना में.

एक तरह से यह ठीक भी था; क्योंकि अब मेरी वापसी भी नज़दीक थी. स्वदेश लौटने की खुशी बेशक थी, लेकिन अन्ना को छोड़कर जाने का दुःख उससे कम नहीं था. संतोष था तो सिर्फ यह कि जितना कुछ बन पड़ा, अन्ना को देकर और बहुत ज्यादा पाकर वापस जा रही थी.

शायद उन्हीं दिनों न्यूयॉर्क में ‘शब्द-स्टार’ टी. वी. चैनल चलानेवाले अशोक व्यासजी का फोन आया. चैनल के लिए वह मेरी कहानी, व्यंग्य तथा साक्षात्कार रिकार्ड करना चाहते थे. स्टूडियो पहुंची तो देखा, पीछे-पीछे पति और अन्ना भी चले आ रहे हैं. पता चला-इनके मम्मी-पापा को तो कुछ काम था, लेकिन उन्हें दादी की स्टोरी सुनने का मन था.

अन्ना के विषय में अशोक व्यास को बताने की इच्छा तो हुई, लेकिन संकोचवश टाल गयी. लेकिन तभी उनकी पत्नी शैलाजी को अन्ना से बतियाते देख मेरा उत्साह जागा- ‘अन्ना! जरा आंटी से पूछो उन्हें’ ‘शांताकारम्…’ आता है?’

अन्ना ने पूछा तो मेरा इशारा समझकर, बराबरी के अंदाज़ में उन्होंने कहा, ‘मुझे तो नहीं आता, तुझे आता है?’

अन्ना ने स्वीकृति में गरदन मटकाई, तो उन्होंने दुबारा पूछा, ‘…पूरा आता है? जरा सुना तो.’

और अन्ना सस्वर हाव-भाव के साथ शुरू हो गयी. श्लोक की दो पंक्तियां पूरा होने तक अशोकजी पिछले कमरे से बाहर आते दिखे. वहीं-के-वहीं खड़े चुपचाप सुनते रहे, फिर मुसकराते हुए मुझसे अनुमति लेने के अंदाज़ में बोले-

‘आप से पहले अन्ना के श्लोकों की रिकार्डिंग कर लूं?’

और अन्ना वैसी-की-वैसी स्टूडियो में खड़ी कर दी गयी. सामने कैमरा लाइट और लाइट के पीछे मैं. जिससे वह मुझे देखते हुए पूरे श्लोक सुना ले जाए.

अपनी कहानी ‘कागज की नावें’, ‘चांदी के बाल’ पढ़ने बैठी तो बैकग्राउंड में डालने के फिए अशोकजी ने कई चित्र दिखाए. कोई भी चित्र कहानी कथा से मेल खाते नहीं दिखे, तो अचानक अशोकजी को सूझा- ‘कागज के नावों’ के प्रतीक रूप तो हडसन नदी वाली बोट्स, जहाज हैं ही चित्र में और चूंकि नायिका फ्लैश बैक में अपने बचपन में जाती है, अतः क्यों न नदी और नावों के बीच अन्ना को फ्रीज कर दें!

एक दिन में जीवन के दो अलभ्य क्षण मेरी मुट्ठी में आ गये.

न्यूयॉर्क से बोस्टन लौटने के बाद सूटकेस बंधने शुरू हुए तो अन्ना ने भांपा- ‘दादी! आप और दादा पैकिंग क्यों कर रहे हैं?’

बताना पड़ा- ‘अब हम इंडिया जाएंगे
न बेटे!’

‘क्यों।-।- दादी?…मत जाओ-यहीं रहो न!’

कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन आवाज़ गले में रूंधी रह गयी.

मैंने खुद को सम्भालकर जवाब देने के लिए तैयार कर लिया- नयी कहानियां लाने जा रही हूं.’

अन्ना खुश नहीं हुई. जाने क्या समझी! चुपचाप चली गयी.

मालूम था, अगली बार जब तक वापस अमेरिका आएंगे, अन्ना भी यह अन्ना कहां रहेगी! बदल चुकी होगी. नदी की बदलती धारा की तरह. कहां रह सकेगी भला ऐसी-की-ऐसी. बिसर-भूल जाएगी पांच वर्ष की उम्रवाली नटखटी स्मृतियां… फिर भी आश्वस्त थी मैं. बहुत कुछ न सही, कुछ-न-कुछ अन्ना के पास बचा अवश्य रह जाएगा, इस समय खंड का… जीवन भर… किसी-न-किसी रूप में…

ब्रिटिश एयरवेज का विमान जब दो घंटों के लिए लंदन में रुका तो बेटे-बहू का फोन आया. बहू बोली, ‘लीजिए, अन्ना से बात कर लीजिए.’

‘हेलो बेटा.’

उधर से आवाज़ आयी-

‘दादी! आप लंडन से वापस आ जाओ. …आ जाओ दादी!’

अपने आपको सम्भाल स्थिर-संयत आवाज़ में कहा-

‘हम इंडिया जाकर जल्दी से वापसी का टिकट ले लेंगे बेटे! तब आएंगे फिर.’

लेकिन मन में कहा- मैं तो वापस आ जाऊंगी अन्ना, लेकिन तुम अब मुझे वापस नहीं मिलने वाली फिर कभी, इसलिए अलविदा, अन्ना! बा।-।-य!

(जनवरी 2014)

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