अंधेरे से पार आती स्त्री

♦  मधु कांकरिया  >

एक बार वैज्ञानिकों ने एक आविष्कार किया. उन्होंने दो मेढक लिये और दो पात्र लिये. दोनों पात्रों में पानी भरा था. एक पात्र में उन्होंने तापमान काफी ज्यादा रखा. दूसरे पात्र में उन्होंने जल का तापमान सामान्य रखा. अब उन्होंने पहले मेढक को सामान्य से ऊंचे तापमान वाले पात्र में डाला. वह मेढक एकदम से उछल कर बाहर आ गया और भाग खड़ा हुआ. वैज्ञानिकों का उद्देश्य था मेढक को जीवित भी रखना और उसकी उछल कर भाग खड़े होने की सामर्थ्य पर भी बंदिश लगाना. तो इस बार उन्होंने पात्र का तापमान सामान्य ही रहने दिया और मेढक को उसमें डाल दिया. फिर धीरे-धीरे वे पात्र का तापमान बढ़ाने लगे. पात्र का तापमान इतनी धीमी गति से बढ़ाया गया कि मेढक को कुछ अहसास ही नहीं हुआ. मेढक तापमान के साथ अनुकूलित होता गया. जैसे जैसे मेढक अनुकूलित होता गया, तापमान को और अधिक बढ़ाया जाने लगा. एक सीमा के बाद मेढक की प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे खत्म हो गयी. तापमान लगातार बढ़ता रहा. एक दिन मेढक की प्रतिरोधक ताकत जवाब दे गयी और वह मर गया.

क्या स्त्री का सच भी इसी के आस पास नहीं रहा है?

उसे हमेशा से दूसरे पात्र में रखा जाता और धीरे-धीरे उसकी सोच, उसके वजूद उसके ‘स्व’ और उसकी आत्मा का इस प्रकार पुरुष हितों में अनुकूल कर दिया गया कि उसकी अपनी सोच और अपना ‘स्व’ ही मर गया. सदियों तक सफलतापूर्वक चलता रहा यह प्रयोग. हां, इस बीच यह भी हुआ कि मीरा, गार्गी, पंडिता रामाबाई जैसी इक्की-दुक्की महिलाओं ने सूंघ लिया पुरुष सत्ता के इस धोखे को और उछलकर बाहर निकल आयीं और अपने ‘स्व’ के भाव के अनुकूल जीवन जीया. वर्ना यह कैसे सम्भव था कि सदियों तक महिला उसी प्रकार सोचती रहीं जैसा पुरुष उससे सोचवाता रहा. बिना प्रतिरोध के चिता में कूदती रही या वैधव्य की दारुण यंत्रणा भोगती रही. पुरुष को रिझाने के चक्कर में अपने पावों को कपड़े से बांध कर रखती रही. आज भी ढेर सारी ऐसी महिलाएं मिल जाएंगी जिनका पुरुष मूल्यों में समाजीकरण हो गया है यानी वे देह से महिला हैं, लेकिन सोच में सत्तर प्रतिशत पुरुष हैं!

ऐसी ही एक बुर्काधारी महिला से मिली मैं मुम्बई से सत्तर किलोमीटर दूर लौहगढ़ में. मैं धूल-धक्कड़ में लिथड़ी दुर्गम चढ़ाई चढ़ रही थी. मेरे साथ वह भी चढ़ रही थी. उसके साथ उसका एक छोटा बेटा भी था. एक हाथ से बेटे को संभाले और दूसरे  हाथ से बुरके को उठाये बड़ी मुश्किल से वह सीढ़ियां चढ़ पा रही थी. बीच-बीच में बच्चा हाथ छुड़ा के इधर-उधर भाग रहा था. बच्चे को पकड़ने में उसका काला बुरका हाथ से छूटकर धूल-माटी में लिथड़ लिथड़ कर बुरी तरह गंदा हो रहा था. मैंने बच्चे को नियंत्रण में रखने में उसकी मदद की. बातचीत करते-करते हम चढ़ने लगे. मालूम हुआ कि वह बी.ए. पास थी. इस बीच बच्चा एक बार फिर उसका हाथ छुड़ा कर भागा. एक बार फिर बुरके का निचला सिरा उसके हाथ से छूटा. इस बार हिम्मत कर मैंने कहा कि आप बुरका क्यों पहनती हैं? उतार फेंकिए इसे. नकाब तो आपने यूं भी उठाया हुआ ही है.

उसने जबाब दिया ‘बुरका मुझे पसंद है इसलिए बुरका मैंने डाला हुआ है और रही बात नकाब की तो घर नज़दीक आते ही मैं उसे भी डाल लूंगी.’ टके-सा जबाब देकर वह आगे निकल गयी. मैं सोचती रही कि उसने ऐसा क्यों कहा कि बुरका मुझे पसंद है. यदि वह कहती कि परिवार या समाज के दबाव में उसे यह पहनना पड़ रहा है तो भी बात समझ में आती.

लुकाच ने कहा है कि जो सत्तावर्ग है उसकी कामयाबी का राज यह है कि अपनी सोच को सर्वहारा में प्रतिष्ठित करने में कामयाब हो जाता है. सदियों की इस लम्बी यात्रा में सत्ता वर्ग (पुरुष) ने भी स्त्री पर यह कामयाबी हासिल कर ली है. इसलिए, देखिए, कई बार दहेज का मामला हो या बेटी की ‘ऑनर किलिंग’ का, या फिर अपने ही परिवार की महिलाओं के पर कतरने का, स्त्रीयां बढ़-चढ़ कर पुरुष का साथ देती दिखाई देती हैं.

पश्चिम बंगाल में बलात्कार पीड़ित महिला के लिए इंसाफ मांगती जनता को ममता बनर्जी ने सरकार के खिलाफ़ षडयंत्र बताया. एक और बलात्कार के लिए उन्होंने कहा कि बलात्कार इसलिए हो रहे हैं कि अब लड़के और लड़कियां खुलकर ज्यादा मिल रहे हैं. राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य आशा मिरने ने भी कहा है कि बलात्कार की वजह महिलाओं के कपड़े और व्यवहार हैं. निर्भया को रात को ग्यारह बजे घर से बाहर निकलने की क्या ज़रूरत थी? ऐसा स्त्री विरोधी वक्तव्य देकर क्या उन्होंने अपनी इसी पुरुष निर्मित मानसिकता का परिचय नहीं दिया?

लेकिन अब फिज़ा बदल रही है. पुरुष सत्ता के ये सारे किले ढह रहे हैं. सदियों के अंधेरे से बाहर निकल कर अपने ‘स्व’ और स्वाभिमान की रक्षा के लिए वह निर्भय होकर सड़क पर उतर आयी है. अपने पंख और डैनों की ताकत को पहचान लिया है उसने. उसके पास हौसला और आत्म विश्वास की पूंजी आ चुकी है. अपनी मूल सत्ता में वापस लौट चुकी है वह. इसलिए आज स्त्री होने का अर्थ है- सृजन, प्रकृति, आत्म-सम्मान और सम्पूर्णता. इसलिए स्त्री आज अपने लिए सत्ता की हिस्सेदारी हासिल करने में ही नहीं वरन् समाज को अधिक से अधिक वापस लौटाने में भी सबसे आगे है.

राजस्थान के राजसमंद जिले में उपली ओदेन पंचायत की उप-प्रमुख राखी पानीवाला सुबह चार बजे उठकर खुले में शौच की विवशता के खिलाफ़ महिलाओं को संगठित कर रही हैं. उनका वादा है कि साल के अंत तक 50% से ज्यादा घरों को शौचालय मिल जाएंगे. एक स्थानीय कॉर्पोरेट की सहायता से वे यह सब करेंगी. वे कहती हैं कि यह बिडम्बना ही है कि यहां एक तरफ महिलाएं पर्दा करती हैं और दूसरी तरफ वे खुले में शौच करने को मजबूर हैं.

त्याग और सेवा की मूर्ति मदर टेरेसा के बारे में सब जानते हैं, पर शायद ही कोई जानता हो कि जिस समय ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया तो उनके बारह पुरुष शिष्यों में कोई भी उनके साथ नहीं था, सब जान बचाने की कोशिश में भाग खड़े हुए थे. अंतिम समय में उनके साथ थी सिर्फ तीन महिलाएं… मेगदलीन, मेरी और मेरी की बहन. ये तीनों महिलाएं भी ईशू के खास चुने हुए शिष्यों में नहीं थीं, पर संकट के समय वे ही साथ थीं.

नारी की इस निष्ठा को पुरुष उसकी त्याग-भावना से नहीं जोड़ता, उसने इसे नारी की नियति मान लिया है. नारी की इस विशेषता को विवशता के रूप में देखने वाली पुरुष-मानसिकता के खिलाफ़ आवाज़ तो उठनी ही थी. उठी भी. आज की नारी यह आवाज़ भी उठा रही है और अपने अस्तित्व की सार्थकता भी सिद्ध कर रही है. यह बदलाव अंधेरों के मिटने का संकेत दे रहा है. आवश्यकता इस प्रक्रिया  को तेज़ करने की है. 

(मार्च 2014)

1 comment for “अंधेरे से पार आती स्त्री

  1. pankak bharti
    September 21, 2017 at 1:14 pm

    Vimarsh ko Kitano se bahar nikal Kar soch me laane ki jarurat hai

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