कविताएं कई बार  – ललित मंगोत्तरा

डोगरी कविताएं कई बार मन में आती है कविता फुर्र से फिर उड़ जाती है कविता पकड़ने का यत्न करो तो उंगलियों के पोर कविता के आर-पार होकर आपस में मिल जाते हैं पर कविता फिर भी पकड़ में नहीं…

शब्द अपने अर्थ पाने को आतुर  –    श्रीराम परिहार

ललित-निबंध आंख खुली तो पुष्प को अभ्यर्थना की मुद्रा में पाया. द्वार पर खड़ी गाय आशीर्वाद देती-सी लगी. सूर्य प्राची से निकला और असंख्य स्रोतों से ऊर्जा का वर्णन होने लगा. पक्षियों के पंखों पर आकाश उतर आया. नदी सकपकाकर…

बारह फकीरों का कम्बल  –   काका कालेलकर

चिंतन कौन जाने किस तरह, किंतु दुनिया के सभी धर्म हमारे देश में आ पहुंचे हैं और वे किसी को सुख से रहने नहीं देते. अब इन धर्मों का हम करेंगे क्या? यह प्रश्न अनेक लोगों के मन में समय-समय…

असहमति और स्वतंत्रता  –   अमर्त्य सेन

दृष्टिकोण बाइस अगस्त, 1934 की बात है. तब मैं एक साल का भी नहीं हुआ था. मेरे चाचा ज्योतिर्मय सेनगुप्ता ने बर्दवान जेल से मेरे पिता को एक चिट्ठी भेजी थी. उन्होंने मेरा हाल-चाल पूछा था और मेरे ‘अमर्त्य’ नाम…

युद्ध  –   लुइजी पिराण्डेलो

नोबेल-कथा 28 जून, 1867 को गिरगरेन्टी, सिसिला में जन्मे पिराण्डेलो ने सोलह वर्ष की अल्प अवस्था में ही कविता लिखना शुरू कर दिया था. बाद में ये गद्य की ओर मुड़े और इनकी पहली पुस्तक ‘लव विदाउट लव’ सन् 1893…

नीलू  –   शरणकुमार लिंबाले

दलित-कथा मेरी वेदनाओं से लदी देह पिघलने लगी थी. मेरी देह के दो आंसू बन गये. मेरे पदचाप अग्निशामक वाहक की तरह सिसक रहे थे. मैं बस्ती की दिशा में बढ़ रहा था. आवाज़ की दूरी पर भीमनगर था. इस…